Poem main usko dhund raha hoon

मैं उसको ढूँढ रहा हूँ | Poem main usko dhund raha hoon

मैं उसको ढूँढ रहा हूँ

( Main usko dhund raha hoon ) 

 

हम सबकी है वो जान,
मेरे प्राणों का वो प्राण ,
मैं उसको ढूँढ रहा हूँ।

 

वो देखो है दिन – रात,
उसकी कोई नहीं है जाति।
उसकी मुट्ठी में संसार,
जरा वो रहता है उस पार,
परिन्दे करते हैं गुणगान,
मैं उसको ढूँढ रहा हूँ।
मेरे प्राणों का वो प्राण,
मैं उसको ढूँढ रहा हूँ।

 

वह कुदरत का है रुप,
बनके आता है वो धूप,
सारी नदी, वही है झरना,
मेरी धरती का वो गहना,
मेरा खेत, वही खलिहान,
मैं उसको ढूँढ रहा हूँ।
मेरे प्राणों का वो प्राण,
मैं उसको ढूँढ रहा हूँ।

 

वो धरती का है आंगन,
मेरा जनम-जनम का साजन,
मेरे सपनों की परछाई,
जैसे मन पर जमी है काई,
उसमें छिपा है सारा जहान,
मैं उसको ढूँढ रहा हूँ।
मेरे प्राणों का वो प्राण ,
मैं उसको ढूँढ रहा हूँ।

 

उसके हाथ सांस की डोर,
उसका ओर न कोई छोर,
अब न दुनिया वो दीवानी,
अब न लोगों में वो पानी,
जब कि गीता वही कुरान,
मैं उसको ढूँढ रहा हूँ।
मेरे प्राणों का वो प्राण,
मैं उसको ढूँढ रहा हूँ।

 

रामकेश एम यादव (कवि, साहित्यकार)
( मुंबई )
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