Visthapan ka Dard

विस्थापन का दर्द | Visthapan ka Dard

विस्थापन का दर्द

( Visthapan ka Dard )

विस्थापन का दर्द बहुत ही
पीडादेह होता हैं ..
इस पीड़ा को इस यातना को शब्दों में व्यक्त करना बहुत कठिन होता हैं
अपने लोग ..
अपनी जमीन..
अपनें घर की छत…
बसा बसाया संसार..
युद्ध…
आतंक…
भय…
हिंसा…
मृत्यू के डर के भार से बस थोड़ा-बहुत भार कम होता हैं विस्थापन का….
बहुत दर्दनाक और भयावह होता हैं
विस्थापन का अनुभव..
मन …
परीवार..
समाज…
और कभी कभी राष्ट्र से भी हो जाता हैं विस्थापन…
बहुत पीडादेह होता हैं
यह विस्थापन का दर्द….
दर्द….
विस्थापन का…

Shubhangi  Chauhan

चौहान शुभांगी मगनसिंह
लातूर महाराष्ट्र

यह भी पढ़ें:-

Similar Posts

  • कभी उस शहर कभी इस शहर | kabhi us shahar kabhi is shahar

    कभी उस शहर कभी इस शहर ( Kabhi us shahar kabhi is shahar )   कभी उस शहर कभी इस शहर गरजते, बरसते आखिर कुछ बादल मेरे शहर भी आकर छा ही गये कुछ देर ही सही गरज कर बरस भी गये हवा कि चलो कुछ तल्खी कम हुई खुश्की नम हुई मौसम के बिगड़े…

  • है बहुत कुछ | Kavita Hain Bahot Kuch

    है बहुत कुछ ( Hain Bahot Kuch )   है बहुत कुछ मन में कहने को लेकिन मन में संभाल कर रखा हूं तेरे पास अपना दिल गिरवी मैने देख भाल कर रखा हूं तुम्हें क्या लगती है अंजान में तुम्हें चुना हूं नहीं नहीं मैंने बहुत कुछ देखा फिर तेरे लिए ख्वाब बुना हूं…

  • काल चक्र | kaalchakra

    काल चक्र ( kaalchakra )    मोन हूं शांत हूं, समय गति का सद्भाव हूं! रुकता नही कभी समय , यह ” काल चक्र ” सदैव ही कालांतर से निरंतर गतिमान हैं ।। वह रही समय की धारा, टूटती तो सिर्फ श्वास हैं, फिर भी काल खंड रुका नही यह समय कभी थमा नहीं बदलता…

  • गणेश वंदन | Ganesh Vandana

    गणेश वंदन ( Ganesh Vandana ) ऊँ गं गणपतये सर्व कार्य सिद्धि कुरु कुरु स्वाहा ऊँ……. आज गणपत पधारे है, आज गणपत पधारे द्वार सभी मिलकर दर्शन लो..-2 आज गणपत पधारे द्वार सभी मिलकर दर्शन लो….-2 रिद्धि-सद्धि के दाता कार्तिकेय के भ्राता-2 पार्वती सुत नंदन नमस्तु प्रमोदन् गणनायक गजानंदन सिद्धिविनायक पधारे है-2 आज गणपत पधारे…

  • कुर्सी | Kavita Kursi

    कुर्सी ( Kursi ) पद एवं कुर्सी का मुद्दा देशभक्ति, रोज़ी -रोटी से भारी हो गया ऐसा फ़रमान दिल्ली से जारी हो गया मर चुकी जन सेवा देश सेवा की भावना कुर्सी एवं पद के लिए ओछे हथकंडे घटिया दांव -पेंच कल का जनसेवक कलियुग का जुआरी हो गया वास्तविकता पर जब भी चलाई है…

  • कुर्सी पर हक | Poem kursi par haq

    कुर्सी पर हक ( Kursi par haq )   दिल जिगर को तोल रहे, खुद को बाजीगर कहते। जनभावों संग खेल रहे हैं, मन में खोट पार्ले रहते।   वादों प्रलोभन में उलझा, खुद उल्लू सीधा करते। भ्रमित रहती जनता सारी, वो अपनी जेबें भरते।   कलाकार कलाबाजीयां, जादूगरी जिनको आती। नतमस्तक सारी दुनिया, उनकी…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *