Poem kursi par haq

कुर्सी पर हक | Poem kursi par haq

कुर्सी पर हक

( Kursi par haq )

 

दिल जिगर को तोल रहे, खुद को बाजीगर कहते।
जनभावों संग खेल रहे हैं, मन में खोट पार्ले रहते।

 

वादों प्रलोभन में उलझा, खुद उल्लू सीधा करते।
भ्रमित रहती जनता सारी, वो अपनी जेबें भरते।

 

कलाकार कलाबाजीयां, जादूगरी जिनको आती।
नतमस्तक सारी दुनिया, उनकी चालें चल जाती।

 

दांव पेच और अटकलबाजी, से माहौल बनाते हैं।
दरियादिली दिखाकर वे, जनसेवक कहलाते हैं।

 

दिल दिमाग का खेल है, दिलों पे राज कर सकते।
राजनीति समर दिग्गज, कुर्सी सरताज बन सकते।

 

जिसने जनता के दिलों में, जो तालमेल बैठाया।
कुर्सी पे हक रहा उसी का, वही राज कर पाया।

?

कवि : रमाकांत सोनी सुदर्शन

नवलगढ़ जिला झुंझुनू

( राजस्थान )

यह भी पढ़ें :- 

शिव | Shiva | Chhand

Similar Posts

  • छेंड़ कर | Kavita Chhed Kar

    छेंड़ कर ( Chhed Kar ) छेंड़ कर इस तरह न सताया करो, रूठ जाऊॅ अगर तो मनाया करो, दिल मेरा तेरी यादों की है इक गली, याद बनकर कभी इनमे आया करो। गीत कारों ने नज्में लिखे हैं बहुत, गीत मेरे लिए भी कोई गाया करो, इस तरह से मेरी कट पाएगी नहीं, दर्दे…

  • औरत | Aurat

    औरत ( Aurat )  ( 2 ) औरत फूलों की तरह….नाज़ुक सी होती है, मगर…काँटों को भी पलकों से वो चुनती है, उसके चरित्र की धज्जियां दुनिया उड़ाती है, फिर भी.मोहब्बतों से इसको वो सजाती है, रखी है जिसके पैरों के नीचे ख़ुदा ने जन्नत, उठाके चरित्र पे उँगली भेजते उसपे लानत, चलते हैं उसके…

  • हिन्दी के अन्तर के स्वर

    हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा मान्य किये जाने के लिये १९७५ में लोकसभा में प्रस्तुत प्रस्ताव अमान्य कर दिये जाने के क्षोभ और विरोध में “हिंदी के अंतर के स्वर” शीर्षक रचना लिखी गई।१९७६ में मारीशस के द्वितीय विश्व हिंदी सम्मेलन में यह रचना प्रस्तुत हुई तो यह वहाॅं प्रशंसित और अभिनन्दित हुई।इस रचना के…

  • Hindi kavita | Hindi Diwas Poem -हिंदी हमारी

    हिंदी हमारी ( Hindi Hamari )     तुलसी की वाणी रामायण हैं हिंदी रसखान जी के  दोहे है हिंदी मीरा सा प्रेम कृष्ण नाम है हिंदी भारतेंदु की आत्मा है हिंदी दिनकर जी की शब्दों की ज्वाला है सुमित्रानंदन की वाणी है हिंदी जो शब्द दिलों को छूती है वो मृदुभाषी है हिंदी संस्कार…

  • बरखा | Barakha par Kavita

    बरखा ( Barakha )   छम-छम करती आ पहुंची, फुहार बरखा की। कितनी प्यारी लगती है, झंकार बरखा की।।   हल्की-फुल्की धूप के मंजर थे यहां कल तलक। टपा-टप पङी बूंदे बेशुमार बरखा की।।   पानी का गहना पहने है , खेत, पर्वत, रास्ते। करके श्रृंगार छाई है , बहार बरखा की।।   झींगुर, मोर,…

  • फागुन का रंग | Poem Fagun ka Rang

    “फागुन का रंग” ( Fagun ka Rang )    वर्षा बीती शरद गया, आई बसंत बहार। रंगीला मौसम हुआ ,फागुन का त्योहार।। बूढ़ जवान हरे हुए ,बाल हृदय उमंग । तन मन सब मदमस्त हुआ, चढ़ा फाग का रंग।। मस्तानों की टोली सजी, करे खूब हुड़दंग। नाचे गाए मस्ती में, खूब चढ़ी है भंग।। हाथ…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *