kaalchakra

काल चक्र | kaalchakra

काल चक्र

( kaalchakra ) 

 

मोन हूं शांत हूं,
समय गति का सद्भाव हूं!

रुकता नही कभी समय ,
यह ” काल चक्र ” सदैव ही
कालांतर से निरंतर गतिमान हैं ।।

वह रही समय की धारा,
टूटती तो सिर्फ श्वास हैं,
फिर भी काल खंड रुका नही
यह समय कभी थमा नहीं
बदलता तो बस मधुमास हैं।।

जीवन ने इसको सदेव दर्शाया
पतझड़ से वसंत ऋतु तक
वसंत से फिर पतझड़ आया ,
धीरे धीरे वह रही हो जीवन में
जैसे कोई समय की धारा ।।

हैं काल चक्र जीवन आधार,
शून्य भी ये हैं, स्वरूप हैं यही
अवधि भी ये हैं, विध्वंश यही
कोई रोक सका न इसे ज्ञानी
सब ध्यान भी ये हैं और ज्ञान यही ।।

 

आशी प्रतिभा दुबे (स्वतंत्र लेखिका)
ग्वालियर – मध्य प्रदेश

यह भी पढ़ें :-

कुपित हो रही है यह प्रकृति | Paryavaran par Kavita in Hindi

Similar Posts

  • रेशम धागा पहन कर

    रेशम धागा पहन कर पांच बहनो का भईया सजता धजता आज, रेशमी धागा पहन कर ,करता कितना नाज। बचपन की खुशबू भरी,बिखराए सरस धार, पावन सावन पूर्णिमा,नित रक्षा हो हर काज।।1। रिश्तों का बंधन पावन,छलकाता उर प्यार, कच्चे धागे में दिखता, खुशियॉ अपरम्पार। चावल रोली थाली रख, बहना है तैयार, भईया गेह खुशहाल हो,लगे उमर…

  • दूध का क़र्ज़ | Poem in Hindi on doodh ka karz

     दूध का क़र्ज़ ( Doodh ka karz )      माँ का जगह कोई ले न सकता, दूध का क़र्ज़  उतार ना सकता। माँ ने कितनी ये ठोकर  है खाई, दूध  की लाज  रखना मेंरे भाई।।   न जानें कहां-कहां मन्नत माॅंगी, मंदिर, मस्जिद, चर्च  में  जाती। तू जग में आऐ अर्ज़ ये लगाती, पीड़ा…

  • चलो जीते हैं | Poe Chalo Jeete hainm

    चलो जीते हैं ( Chalo jeete hain )   चलो ज़िन्दगी जिते हैं ज़िन्दगी हर पल निकलता जा रहा है चलो ज़िन्दगी जिते हैं चस्कियाँ काम है ज़िन्दगी के बोतल में चलो पीते हैं कोई चाँद देखा होगा कोई सितारा देखा होगा कोई कोई कई नज़ारा देखा होगा लेकिन कोई बताए मुझे बिन आईने के…

  • विद्यार्थी | Vidyarthi

    विद्यार्थी ( Vidyarthi )    तैयारियां करते रहो इम्तिहानों की दौड़ भी तो लंबी है जिंदगी की और है वक्त बहुत कम जिम्मेदारियों का साथ ही बोझ भी तो है… बिके हुए हैं पर्यवेक्षक भी तिसपर , चिट भी है और की जेब मे आपके हालात का मोल नही यहां प्रतिस्पर्धा के इस जंग मे…

  • गैरों की संगत | Gairon ki Sangat

    गैरों की संगत ( Gairon ki sangat )    ऐ दोस्त, संभल कर चल परख कर चल समझ कर चल क्योंकि गैरों की संगत अपनों को दुश्मन बना देती है।   ऐ दोस्त! समझना बड़ा मुश्किल है किसी के रुप को, पढ़ना बड़ा मुश्किल है बनावटी चेहरों को क्योंकि गुमराह सभी को अंधा बना देती…

  • माँ की उलाहने

    माँ की उलाहने बिटिया जब छोटी थीमॉं के लिए रोती धी,पल भर न बिसारती थीमाँ – माँ रटती रह जाती थी। थोड़ी सी जब आहट पायेचहुओर नजरे दौड़ाये,नयन मिले जब माँ सेदोंनो हृदय पुलकित हो जाये। अब तो बिटिया हुई सयानीआधुनिकता की चढ़ी रवानी,नये तेवर में रहती है अति बुद्धिमानी अपने को,माँ को बुद्धॣ कहती…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *