वक्त कब करवट बदलें | Waqt Kab

वक्त कब करवट बदलें

( Waqt kab karwat badle ) 

 

वक्त कब करवट बदल ले,
क्या-क्या खेल दिखाता है।
वक्त कहकर नहीं बदलता,
समय चक्र चलता जाता है।

मौसम रंग बदलता रहता,
पल-पल जब मुस्काता है।
कालचक्र के चक्रव्यूह में,
नव परिवर्तन तब आता है।

समय बड़ा बलवान प्यारे,
बदलते किस्मत के तारे।
गुजरा वक्त फिर न आता,
वक्त के आगे कितने हारे।

वक्त वक्त की बात होती,
सुबह से अंधेरी रात होती।
वक्त कहकर नहीं बदलता,
निशा बदलती प्रभात होती।

वक्त पहिया चलता जाता,
इतिहासों में रह जाता है।
वक्त खड़ा होता मानव का,
पग पग सफलता पाता है।

 

कवि : रमाकांत सोनी सुदर्शन

नवलगढ़ जिला झुंझुनू

( राजस्थान )

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