Women Empowerment Seminar

राष्ट्रीय बालिका दिवस एवं महिला सशक्तिकरण संगोष्ठी

24 जनवरी को राष्ट्रीय बालिका दिवस के शुभ अवसर पर जिलाधिकारी डॉक्टर मोनिका को मुख्य अतिथि के तौर पर “बालिका शिक्षा एवं महिला सशक्तिकरण संगोष्ठी” कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया।

यह कार्यक्रम जिले के उच्च प्रतिष्ठित पदों पर तैनात महिलाओं द्वारा सामूहिक रूप से कराया जा रहा था। इस कार्यक्रम में प्रत्येक विभाग की दो-दो महिलाओं को, जो बालिका शिक्षा एवं महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर रही थी.. को भी सम्मानित करने का फैसला लिया गया।

मुख्य अतिथि महोदय डॉ मोनिका की गरिमामय उपस्थिति में कार्यक्रम शुरू किया गया। मंच पर पहुंचकर महिला वक्ताओं ने बोलना शुरू किया।

पहली वक्ता:- इस पुरुष प्रधान समाज में हम महिलाओं की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है। हमें कदम-कदम पर लोगों की बुरी नजरों का सामना करना पड़ता है।

पुरुष हमारा शोषण करते हैं। हमें किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ने नहीं देना चाहते। वे चाहते हैं कि महिला सिर्फ घरों में कैद रहे, बाहर न निकले। वह हमें सिर्फ उपभोग की वस्तु मानते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है।

इतनी परेशानियों, प्रतिबंधों के बावजूद हम महिलाएं हार ना मानते हुए, हर क्षेत्र में अपना हक प्राप्त कर रहे हैं, हर क्षेत्र में सफलता के झंडे गाड़ रहे हैं और आगे भी गाड़ेंगे, मुझे ऐसा विश्वास है।”
सभी ने खूब तालियां बजायीं।

दूसरी वक्ता:- हर नियम, कानून सिर्फ महिलाओं को लेकर है। पुरुष कहीं भी आजाद घूमता रहे, उसे कोई रोकने वाला, कहने सुनने वाला नहीं होता। इसके बावजूद अगर हम रात को थोड़ा भी देर से घर पहुंचे तो हम पर चरित्रहीन का ठप्पा लगाया जाता है, शक की निगाहों से देखा जाता है।

जब तक यह भेदभाव पुरुष व महिला में रहेगा, हमारा बालिका दिवस मनाने का कोई औचित्य नहीं है।” सभी महिलाओं ने सहमति में सिर हिलाया।

तीसरी वक्ता:- हम महिलाओं को हर युग में परीक्षा का सामना करना पड़ा है। उदाहरण के तौर पर राम युग में सीता की अग्नि परीक्षा ली गई जबकि परीक्षा राम की भी ली जा सकती थी।

देखा जा सकता था कि उन्होंने गैर स्त्री को हाथ लगाया है या नहीं। परंतु सीता को ही चरित्रता और पवित्रता की परीक्षा देनी पड़ी। भगवान राम के काल में भी महिलाओं की ऐसी स्थिति थी फिर कलयुग की तो बात ही क्या करें? यहां तो सती प्रथा के अंतर्गत पति की मृत्यु के बाद महिला को पति की चिता के साथ जिंदा जला दिया जाता था।

पुरुष के बिना स्त्री के जीवन का कोई महत्व नहीं है यह माना जाता था। उस महिला की चीख पुकारें कोई सुन ना ले, इसके लिए जोर-जोर से ढोल नगाड़े बजाए जाते थे।

उसकी आवाज दबा दी जाती थी। देखा जाए तो अब महिलाओं की स्थिति काफी बेहतर है। उसको वोट व समानता का हर क्षेत्र में अधिकार है। धीरे-धीरे पुरानी रूढ़िवादि परम्पराएं, प्रतिबंध कमजोर पड़ते जा रहें हैं। वह दिन दूर नहीं जब महिला पूरी तरह से आजाद होगी और निडर होकर, हर जगह, हर क्षेत्र में सफलता के झंडे गाड़ेगी।” सभी ने तालियां बजाकर वक्ता का उत्साहवर्धन किया।

चौथी महिला वक्ता:- इतिहास गवाह है, जब-जब महिलाओं के साथ अत्याचार हुआ है, उसके दुष्परिणाम समाज को भोगने पड़े हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण महाभारत है, जहां द्रौपदी को परिवार के सम्मानित लोगों, बुजुर्गों, गुरुओं के सामने भरी सभा में निर्वस्त्र किया गया और अंजाम देखिये क्या हुआ? कौरवों का सत्यानाश हो गया।

भीष्म पितामह जैसे गुरु जी भी मारे गए। रावण किसी भी मामले में राम से काम नहीं था, लेकिन उसने सीता का हरण किया, फलस्वरुप उसका साम्राज्य नष्ट हुआ और वह भी अपने पूरे कुनबे के साथ मारा गया। राम रावण में अगर अंतर था तो सोच का था, मानसिकता का था।

रावण की पत्नी सबसे सुंदर स्त्री थी लेकिन उसके बाद भी रावण सीता के पीछे पड़ा। यह उसकी घटिया मानसिकता को दिखाता है। अपनी पत्नी मंदोदरी को छोड़कर उसने सीता को गलत निगाह से देखा और उसका हरण किया। देखा जाए तो रावण से बड़ा विद्वान, पंडित कोई नहीं था।

जब तक महिलाओं को लेकर पुरुषों की मानसिकता व सोच ना बदलेगी, दिक्कतें आती रहेंगीं। हमें यह सोच बदलने का काम अपने घर से शुरू करना होगा.. अपने बच्चों में भेदभाव बंद करके, दोनों को समान अधिकार देकर, समान शिक्षा देकर। तभी आने वाले समय में.. सही मायनों में महिला सशक्तिकरण हो पाएगा।”
सभी ने वक्ता के विचारों की प्रशंसा की।

पांचवी वक्ता:- मुझे लगता है कि औरत ही औरत की सबसे बड़ी दुश्मन है। वे एक दूसरे की तरक्की बर्दाश्त नहीं कर पाती हैं। महिला ही सबसे ज्यादा शोक लड़की पैदा होने का मनाती हैं। उनको लगता है कि बेटा ही वंश को आगे बढ़ायेगा, इसलिए बेटा अनिवार्य रूप से होना चाहिए।

चाहे इसके लिए हमारी जान ही क्यों ना चली जाए? मैं कहती हूँ कि जितना ध्यान, प्यार, अपनापन बेटियां हमें देती हैं, उतना बेटे नहीं दे पाते और जितना काम बेटियां करती हैं, बेटे उसके मुकाबले कुछ भी नहीं करते। आपको एक ग्लास पानी तक नहीं पिला सकते। बेटियों को पराया धन माना जाता है।

कहते हैं कि बेटी एक दिन घर छोड़कर चली जाएगी। इसलिए इसको ज्यादा मत पढ़ाओ और शादी करके विदा कर दो। मैं कहती हूँ कि आज के समय में बेटे भी पराया धन हो गए हैं।

नौकरी/रोजगार पाने के बाद… अपने मां-बाप को बेसहारा छोड़कर, दूर देश में या बड़े-बड़े शहरों में बस जाते हैं और फिर कभी लौटकर नहीं आते। मेरी तीन बेटियां हैं। तीनों पर मुझे नाज है। मेरी तीनों बेटियां हर क्षेत्र में नाम कमा रही हैं, सफलता के झंडे गाड़ रही हैं।

मुझे बेटा ना होने का अफसोस नहीं है। मुझे अपनी बेटियों पर नाज़ है। मैं हर जन्म में अपनी उन्हीं तीन बेटियों को पाना चाहूंगी। मेरी बात आपको अजीब लगेगी लेकिन सच है। मैंने देखा है कि सबसे अधिक लिंग परीक्षण महिलाएं ही करवाती हैं। जांच में अगर भ्रूण लड़की का होता है तो गर्भपात करवा देती हैं।

हमें खुद महिला होकर एक महिला भ्रूण की हत्या करवाना कहाँ तक सही है? यह गलत है, पाप है। इसकी सजा देर सवेर भगवान हमें हमारे बच्चों के माध्यम से ही देते हैं। सब को जीने का अधिकार है। बेटियां बोझ नहीं होती बल्कि लक्ष्मी, सरस्वती का रूप होती हैं। बेटियों के पैदा होने पर जब खुशियां मनाई जाएंगी.. तभी राष्ट्रीय बालिका दिवस के मायने होंगे।” सभी ने मिली जुली प्रतिक्रिया व्यक्त की।

मुख्य अतिथि महोदया को जरूरी काम से निकलना था, उनकी कॉल आ गई थी। इसलिए बाकी वक्ताओं को रोका गया और डॉक्टर मोनिका को बालिका दिवस पर अपने विचार रखने हेतु आमंत्रित किया गया। जिलाधिकारी महोदया ने बोलना शुरू किया:-

“यह मेरे लिए खुशी की बात है कि आपने मुझे इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया। इसके लिए इस कार्यक्रम से जुड़े सभी लोगों का हार्दिक धन्यवाद और आभार। जहां तक बालिका शिक्षा एवं महिला सशक्तिकरण की बात है, मैं इसको दूसरी नजर से देखती हूँ।

मुझे लगता है कि आज अगर मैं इस प्रतिष्ठित पद पर पहुंच पाई हूँ या लड़कियों की रोल मॉडल बनी हूँ तो इसका सारा श्रेय मैं अपने पिता, भाई और पति को देती हूँ।

आपको मेरी बात अजीब लग रही होगी, लेकिन सच यही है। आप सोच रहे होंगे कि बालिका दिवस पर यह पुरुषों की बात क्यों? आज अगर हम सब यहां इकट्ठे होकर महिला सशक्तिकरण या बालिका शिक्षा की बात कर पा रहे हैं तो इसके पीछे कोई ना कोई पुरुष ही है।

आज अगर हम सब कामयाब हैं तो कहीं ना कहीं उस कामयाबी के पीछे किसी पुरुष का हाथ जरूर होगा। हम कहते सुनते आए हैं कि हर कामयाब पुरुष के पीछे एक महिला का हाथ होता है, लेकिन हर कामयाब महिला के पीछे भी कोई ना कोई पुरुष खड़ा रहता है।

यह पुरुष ही है जो अपने परिवार के, महिलाओं के, समाज के ताने सुनता है लेकिन अपनी बेटी, पत्नी, बहू को आगे बढ़ने के, कामयाबी के अवसर प्रदान करता है। हमें खुले आकाश में उड़ने के लिए पंख देता है। हम सपने देख पाते हैं और उनकी मदद से पूरे कर पाते हैं।

मुझे याद है कि मेरे परिवार में मेरे पिता ने मुझे कामयाब बनाने के लिए अपने भाइयों का, परिवार का, समाज का विरोध सहा। उन्होंने किसी की भी परवाह किए बिना मुझे पढ़ाया, उच्च शिक्षा दी, कोचिंग करवाई। सब चाहते थे कि मेरी जल्द से जल्द शादी कर दी जाए। मुझे घर से विदा कर दिया जाए।

लेकिन मेरे पिता ने मेरी इच्छाओं का मान रखा। मेरी बातों को सुना, मेरी ढाल बनकर सामने आए। उन्होंने मुझे सपने देखना सिखाया और उनको पूरा करने में मेरी मदद की। इसके लिए उन्हें समाज के बहुत से ताने सुनने पड़े।
मेरा भाई मेरा बॉडीगार्ड बनकर मेरे साथ कोचिंग करने जाता था।

उसके साथ मैं खुद को सुरक्षित महसूस करती थी। उसका भी मुझे बहुत सहयोग मिला। कहीं ना कहीं मुझे अपने भाई के पीछे-पीछे आगे बढ़ने का मौका मिला। उसने मेरे लिए आगे बढ़ने के रास्ते खोले। उसने मेरा हौसला, मनोबल बढ़ाया। कदम कदम पर प्रेरक का काम किया।

आज अगर मैं इतने बड़े प्रतिष्ठित पद पर होकर अपने सब काम, हर जिम्मेदारी का अच्छे से निर्वाह कर पा रही हूँ तो उसके पीछे मेरे पति हैं। वे मेरा बहुत ध्यान रखते हैं। उनका मुझ पर अटूट विश्वास है। हर काम में, हर फैसले में वह मेरे साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं।

सब लोग मेरे पिता से कहते थे कि बेटियों को इतना ज्यादा पढ़ाओगे तो काबिल दूल्हा कहाँ से लाओगे? दहेज कहाँ से दोगे? उस वक़्त मैंने अपने पिता से कहा था कि मैं बिना दहेज की शादी करूंगी, लेकिन मेरी पढ़ाई मत रोको। ऐसा इंसान ढूढ़ना आसान नहीं था जो बिना दहेज की शादी करे।

इस प्रथा को तोड़े लेकिन ईश्वर की कृपा देखिए। मेरा जीवन साथी मुझे इतना अच्छा मिला है कि मैं उनकी जितनी तारीफ करूं कम है। उनकी सोच बिल्कुल मेरी तरह है। मेरे पति ने बिना दहेज की शादी की।

मेरी शादी को 10 वर्ष हो गए हैं। मेरे एक बेटा और एक बेटी है। उनकी भी मैं दहेज मुक्त शादी करूंगी। हालांकि बहुत बार मुझे अपने ससुराल वालों से जैसे-सास, ननंद आदि से दहेज न लेकर आने के ताने सुनने को मिल ही जाते हैं.. लेकिन इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।

हर परिस्थिति में मेरे पति मेरे साथ रहते हैं, मेरा हौसला बढ़ाते हैं। मेरी आपसे विनती है कि आप अपनी बेटी को शिक्षा जरूर दें, उसको काबिल जरूर बनाएं। ऐसा करने से आपको उसके दहेज की चिंता ना रहेगी। भेदभाव कम करने में शिक्षा सबसे सशक्त माध्यम है। इसके बिना सब कुछ बेकार है।

अंत में, मैं बस इतना कहना चाहूंगी- सही मायने में राष्ट्रीय बालिका दिवस और नारी सशक्तिकरण तभी माना जायेगा जब महिला, महिला को अपना दुश्मन नहीं.. दोस्त समझेगी, भ्रूण हत्या नहीं करवाएगी, बेटी को बेटों के समान पढ़ने के अवसर प्रदान करवाएगी, बेटे-बेटी में भेदभाव नहीं करेगी, दोनों को समान महत्व देगी, बेटियों के सपने पूरे करने में मदद करेगी, उनको पराया धन नहीं मानेगी, दहेज प्रथा का विरोध करेगी, बहू-बेटी में अंतर नहीं करेगी, अपने बेटे को लड़कियों का सम्मान करना सिखाएगी, लड़की को लेकर चली आ रही मानसिकता को बदलने में मदद करेगी… तभी सदियों से चली आ रही प्रथाएं बदलेंगीं।

लड़कियों के प्रति सोच बदलेगी, फिर महिला को कोई गलत निगाह से ना देख पाएगा, महिला हर जगह सम्मान की हकदार होगी। आओ, हम सब मिलकर यह शपथ लें कि इस सब की शुरुआत हम अपने घर से, अपने बच्चों से, अपने परिवार से करेंगे। तभी हमारा यहां इकट्ठे होकर राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाना सफल हो सकेगा। धन्यवाद!”

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा

यह भी पढ़ें :-

Similar Posts

  • श्राद्ध तर्पण | Shradh Tarpan

    आलेख श्राद्ध तर्पण मुख्य रूप से गृहस्थ द्वारा किए जाने वाले ब्रम्ह यज्ञ, देव यज्ञ , पितृ यज्ञ, अतिथि यज्ञ तथा बलिवैश्व यज्ञ में पितृ यज्ञ के अंतर्गत आता है। पितृ यज्ञ जीवित माता-पिता, आचार्य, विद्वान मनुष्य आदि की सेवा है। इस यज्ञ के श्राद्ध तर्पण दो भाग हैं। श्राद्ध तर्पण मृतक का नहीं बल्कि…

  • नमो नारायण – गुरु जी | Namo Narayan

    सौम्य से दिखते चेहरों के बीच एक अनकहा दर्द हृदय में छुपाए रिसेप्शन पर आने जाने वालों को मधुर मुस्कानों से सबका स्वागत करती है । पहली बार जब उन्होंने मुझे देखा तो पहचान नहीं होने के कारण अपनी उसी स्टाइल में पूछा – ” आपको किसी से मिलना है क्या? इंक्वारी के लिए आए…

  • जिंदगी की लघु कहानी

    जीवन में जिंदगी जीना उतना आसान भी नहीं है हर एक मोड़ पर नाना तरह की चुनौतियां, सुरसा की तरह मुंह खोल खड़ी रहती है। जीवन को चलते-चलते राहों में हर किसी से सामना करनी पड़ती है। कभी आंधी, तूफान, सुनामी जैसा लहरों से भी सामना जिंदगी को ,हर पल एक नया जंग, नया संघर्ष…

  • सकूँ

    विभु एक 15 वर्षीय लड़का था, जो अपने परिवार के साथ एक छोटे से शहर में रहता था। वह एक अच्छा लड़का था, जो हमेशा दूसरों की मदद करने के लिए तैयार रहता था। एक दिन, विभु ने अपने पिता से कहा कि वह नदी के किनारे घूमने जाना चाहता है। उसके पिता ने उसे…

  • कल्लू की इंसानियत | Hindi Kahani

    कल्लू की इंसानियत ( Kallu ki insaniyat ) इक पड़ोसी ने दूसरे पड़ोसी से कहा ये जो नया पड़ोसी कल्लू आया है एकदम खराब है यह अच्छा इंसान नहीं है, यह सुनकर दूसरे पड़ोसी ने तीसरे से कहा ये जो नया पड़ोसी आया है बहुत खराब है । तीसरे ने चौथे से कहा, चौथे ने…

  • विनोद कश्यप शर्मा की ग़ज़लें | Vinod Kashyap Sharma Poetry

    सावन तेरी बाहों में प्यारे सावनतूने दी है दस्तकअपनी प्यारी -प्यारीबादलों की बूंदों सेतेरी ठण्डी-ठण्डी हवाएं, काली घटाएंदे रही हैं मस्तीदिखती है तेरी अद्भुत मायाआ जाता है मौसम में यौवनदिल लेता है हिल्लौरेंबादलों की गरज की मीठी-मीठी आवाज़ेंहर लेती है मुझ जैसे प्रेमी का दिलमुस्कुराती है हरियाली।फूटतीं हैं वृक्षों पर कोंपलें, खिलखिलाते हैं कुसुम,गर्मी में…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *