जमाने में मेरा हाल | Zamane mein mera haal

जमाने में मेरा हाल

( Zamane mein mera haal )

 

बदजात जमाने से मेरा हाल न पूछों
जो जानना हो कुछ मेरे पास तुम आओ
मैं बेहतर बताऊंगा दूसरे से यार न पूछों
मैं चलता चला जाऊंगा फिर ठहर नही पाऊंगा
दूसरे से मेरी मंजिल को मेरे यार न पूछो
बदजात जमाने से मेरा हाल न पूछों
मैं रह के तेरे संग दिल मे भरता था मैं रंग
जो जानना हो रंग मेरे पास तुम आओ
मैं बेहतर बताऊंगा दूसरे से यार न पूछों
डगर डगर मैं जरा ठहर ठहर चला था
मैं क्यों ठहर गया मेरे पास तो आओ
मैं बेहतर बताऊंगा दूसरे से यार न पूछों
बदजात जमाने से मेरा हाल न पूछों

❣️

लेखक : अंकुल त्रिपाठी निराला
(प्रयागराज )

यह भी पढ़ें : –

एक तलाश ऊंचाई छूने की | Ek talash unchai chune ki

Similar Posts

  • कैसा धर्म | Kaisa Dharam

    कैसा धर्म ( Kaisa dharam )    भगवा तो कभी ‌हरा ओढ़ा दिया रंग हीन,उस दयादीन को कैसा कैसा जामा पहना दिया निर्गुण, निराकार को सब ने जाने क्या क्या अपनी मर्जी से आकार दिया सर्व भूत, सर्व व्यापी तुझे हमने कैद कर दीवारों में बांध दिया हे स्रष्टा ,जग केरचयिता तुझको ही सीमाओं से…

  • मां कुष्मांडा | Maa Kushmanda

    मां कुष्मांडा ( Maa Kushmanda )    अष्टभुजी मां कुष्मांडा को सादर कर लीजिए प्रणाम, सृष्टि रचना के समय से ही जग में चलता इनका नाम। सूर्यमंडल के भीतर होता है माता का निवास, किसी अन्य के बस में नहीं है जो वहां कर सके वास। ये देवी ही पूरे ब्रम्हांड की रचना करने वाली,…

  • हुंकार | Hunkar kavita

    हुंकार ( Hunkar )   मातृभूमि  से ब ढ़कर कोई, बात नही होती हैं। हम हिन्दू हैं हिन्दू की कोई, जाति नही होती हैं।   संगम तट पर ढूंढ के देखो, छठ पूजा के घाटों पे, हर हिन्दू में राम मिलेगे,चाहे चौखट या चौबारो पे।   गंगा  गाय  राम  तुलसी  बिन, बात  नही होती है।…

  • Hindi Poetry On Life | Hindi Geet -चलते चलते हुए रुक जाऊं

    चलते चलते हुए रुक जाऊं  (Chalte Chalte Hue Ruk Jaoon )   चलते चलते मैं रुक जाऊं तो तुम मत घबराना मीत   याद हमारी आएगी तो आंसू नहीं बहाना मीत।   हम दोनों का प्यार पुराना पावन निर्मल निश्चल है   हृदय एक है प्राण एक है दोनों में ही मन का बल है…

  • भिखारी | Hindi Poem on Bhikhari

    भिखारी ( Bhikhari )    फटे पुराने कपड़ों में मारे मारे फिरते हैं भिखारी, इस गांव से उस गांव तक इस शहर से उस शहर तक न जाने कहां कहां ? फिरते हैं भिखारी । अपनी भूख मिटाने/गृहस्थी चलाने को न जाने क्या क्या करते हैं भिखारी? हम दो चार पैसे दे- अनमने ढंग से…

  • कहां गए भरत समान भाई | Poem in Hindi on Bharat

    कहां गए भरत समान भाई ( Kahan gaye Bharat saman bhai )   आज कहां गए ऐसे भरत समान भाई, यह भाई की भाई जो होते थें परछाईं। आदर्शों की‌ मिशाल थें वो ऐसे रघुराई महिमा जिनकी तुलसी दास ने सुनाई।। ठुकरा दिया था उन्होंने राज सिंहासन, ऐसे वो राम लखन भरत शत्रुघ्न भाई। यह…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *