Sab kuchh badal gaya ab

सब कुछ बदल गया अब | Kavita sab kuchh badal gaya ab

सब कुछ बदल गया अब

( Sab kuchh badal gaya ab )

 

सब कुछ बदल गया अब तो बदला आलम सारा
कहां गई वो प्रीत पुरानी बहती सद्भावों की धारा

 

दूर देश से चिट्ठी आती पिया परदेश को जाना
पनघट गौरी भरें गगरिया हंस-हंसकर बतलाना

 

बदल गया अब रहन सहन सब शिक्षा कारोबार
आचरण गिरते देखे प्रलोभन वादों का व्यापार

 

मां-बाप को आंख दिखाएं हो गए कैसे संस्कार
फैशन के दीवाने हो रहे देश के भावी कर्णधार

 

लूटमार कालाबाजारी रिश्वतखोरी रग रग छाईं
सुरसा सी महंगाई ने सबकी कमर तोड़ दी भाई

 

बदला है परिवेश सारा जनता और दरबारों में
काली करतूतों का चिठ्ठा छपे रोज अखबारों में

 

विकास बस सड़कों का मकानों का बंटवारा भी
दिल के टुकड़े टुकड़े हुये उजड़ा चमन हमारा भी

 

अपनापन और प्यार बदला रिश्ते नाते बदल गए
खड़ी देहरी राहें तकती वो दिन रातें बदल गए

 

?

कवि : रमाकांत सोनी सुदर्शन

नवलगढ़ जिला झुंझुनू

( राजस्थान )

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