Ang pradarshan kavita

अंग प्रदर्शन का कोहराम | Kavita

अंग प्रदर्शन का कोहराम

( Ang pradarshan ka kohram )

 

फिल्मी दुनिया वालों ने फैशन चलन चलाया है
फैशन के इस दौर में युवाओं को बहकाया है

 

संस्कार सारे सब भूले हो रही संस्कृति नीलाम है
चारों ओर शोर मचा अंग प्रदर्शन का कोहराम है

 

नदी किनारे बीच सड़क पर अर्धनग्न बालायें हैं
रंग बिरंगी चकाचौंध में घायल मंदिर मालाएं हैं

 

आस्था विश्वास भंवर में डगमग सारा घर ग्राम है
दिखावे की दुनिया में अंग प्रदर्शन का कोहराम है

 

खो गया विश्वास मन का जग हो रहा छलावा है
पश्चिमी सभ्यता का देखो संस्कृति पर धावा है

 

बेढ़ंगे परिधान पहनकर जन घूमते सरेआम है
आबरू सड़कों पर अंग प्रदर्शन का कोहराम है

 

   ?

कवि : रमाकांत सोनी

नवलगढ़ जिला झुंझुनू

( राजस्थान )

यह भी पढ़ें :-

प्रतिशोध | Kavita pratisodh

Similar Posts

  • जीवन की शुरुआत | Jeevan ki Shuruaat

    जीवन की शुरुआत ( Jeevan ki Shuruaat ) हम हरदम ही हारे ज़माना हमेशा हमसे जीत गया, हार जीत के इस खेल को खेलते जीवन बीत गया, सारे दाव-ओ-पेंचों को समझने में उम्र निकल गया, खेल के इख़्तिताम पे तन्हा थे दूर हर मनमीत गया, रिश्तों की उलझी गिरहें सुलझाने में खुद यूँ टूट गए,…

  • मां की वेदना

    मां की वेदना   मां कोख में अपने खून से सींचती रही।   अब तुम बूंद पानी  देने को राजी नहीं।   मां थी भूखी मगर भरपेट खिलाती रही।   अब तुम इक रोटी देने को राजी नहीं।    मां थी जागती रात भर  गोद में सुलाती रही।    अब तुम इक बिस्तर  देने को…

  • कलम की आवाज | Kavita

    कलम की आवाज ( Kalam ki aawaj ) ( मेरी कलम की आवाज सर्वश्रेष्ठ अभिनेता दिलीप साहब जी को समर्पित करती हूं ) “संघर्षों से जूझता रहा मगर हार न मानी, करता रहा कोशिश मगर जुबां पर कभी न आई दर्द की कहानी”। कुल्हाड़ी में लकड़ी का दस्ता न होता तो लकड़ी के काटने का…

  • मांझा | Manjha par kavita

    मांझा ( Manjha )   मान जा रे मान जा रे माँझे अब तो जा मान गर्दन काट उड़ा रहा है क्यों लोगों की जान ? डोर न तेरी टूटती है तू साँसों को तोड़े गर्दन कटी देख बच्चों की माँ बाप सिर फोड़े तलवार है रह म्यान में मत ना सीना तान मान जा…

  • भ्रम | Poem bhram

    भ्रम ( Bhram )   जो गति मेरी वो गति तेरी,जीवन भ्रम की छाया है। नश्वर जग ये मिट जाएगा, नश्वर ही यह काया है।   धन दौलत का मोह ना करना, कर्म ही देखा जाएगा, हरि वन्दन कर राम रमो मन,बाकी सब तो माया है।   यौवन पा कर इतराता हैं, बालक मन से…

  • छांव की तलाश | Chhand chhav ki talaash

    छांव की तलाश ( Chhav ki talaash )   चिलचिलाती धूप में, पंछी पानी को तरसे। गर्मी से व्याकुल फिरे, छांव की तलाश में।   सूख गये नदी नाले, छाया सब ढूंढ रहे। गर्म तवे सी धरती, तप रही आग में।   झुलस रहे हैं सारे, जलती हुई धूप में। ठंडी छांव मिले कहीं, चल…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *