Aise rang bharo

ऐसे रंग भरो | Aise rang bharo | Kavita

ऐसे रंग भरो

( Aise rang bharo )

 

दिक्-दिगंत तक कीर्ति-गंध से सुरभित पवन करो !
दमक उठे जननी का आंचल , ऐसे रंग भरो !!

 

झिलमिल-झिलमिल उड़े गगन में मां का आंचल धानी ।
लिखो समय के वक्षस्थल पर ऐसी अमिट कहानी ।।
ऊर्ध्व भाग में रंग शौर्य का केसरिया लहराये ।
अधोभाग में हरित क्रांति भी श्रम के गीत सुनाये ।।
चलता रहे चक्र उन्नति का , ऐसे जतन करो !
लहक उठे जननी का आंचल , ऐसे रंग भरो !!

 

रंग श्वेत हो श्वेत क्रांति का , बहे दूध की धारा ।
श्वेत चंद्रिका सा चरित्र हो , दमके जीवन सारा ।।
मिटे कालिमा मानव-मन से, स्निग्ध स्नेह से कर दो !
मरुथल से सूने जीवन में , रंग प्यार का भर दो !!
नील गगन से श्याम मेघ बन , झर-झर नित्य झरो !
चहक उठे जननी का आंचल , ऐसे रंग भरो !!

 

देश-धर्म हित शौर्य दिखाये प्रतिदिन वर्दी खाकी ।
मिटे आंतरिक द्वेष भावना , रहे न कटुता बाकी ।।
जन-जन के मस्तक पर दमके देश-प्रेम की लाली ।
गंगा – यमुना – सरयू गायें , गाथा गौरवशाली ।।
सुरभित करने को जग-कानन, बन गुलाब बिखरो !
महक उठे जननी का आंचल , ऐसे रंग भरो !!

 

ओ मानस के चतुर चितेरे ! ऐसा चित्र बना दे !
कभी न छूटे दाग प्रीति का , ऐसा रंग लगा दे !!
मस्तक पर गौरव का कुमकुम,हाथों मेंहदी श्रम की ।
देश – प्रेम में सराबोर हों , टूटें कड़ियां भ्रम की ।।
सत्य – धर्म की उड़े पताका , कटुता दूर करो !
दमक उठे जननी का आंचल , ऐसे रंग भरो !!

 

✍?

 

कवि : नरेंद्र शर्मा “नरेंद्र”

 अलीगढ़ ( उत्तर प्रदेश )

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