मां के आंगन की मिट्टी

मां के आंगन की मिट्टी | Dr. Preeti Parmar Poetry

मां के आंगन की मिट्टी

( Maan ke aangan ki mitti ) 

 

दो पल के लिए मेरे मन
उस रास्ते से गुजर जाऊं
मां के आंगन की मिट्टी
अपने आंचल में भर लाउ

मां के आंचल की खुशबू
अपनी सांसों में भर लाऊं
आम के पेड़ और झूला
धमाचौकड़ी का मंजर
अपनी आंखों में भर लाऊं

बहनों की खट्टी मीठी
बहस और तकरार
एक थाली में हम सब का
मिलकर खाना बरकरार
सहेलियों की आवाजें
मनके कोने में बसा लाऊं

पिता की डांट फटकार
उनकी आंखो में उमड़ा प्यार
दिल में छुपा कर लेआउ

बैठ कभी किसी कोने में
होले होले सुबक कर
यादें अपनी ताजा बनाऊं

 

डॉ प्रीति सुरेंद्र सिंह परमार
टीकमगढ़ ( मध्य प्रदेश )

यह भी पढ़ें :-

विश्व बाल दिवस | Vishwa bal diwas par kavita

 

Similar Posts

  • मर्यादा की हानि | Poem maryada ki hani

    मर्यादा की हानि ( Maryada ki hani )   मर्यादा में बाधा पड़ी जब आधा राम ने बाली को चोरी से मारा। सुनो रघुनाथ अनाथ क्यूं अंगद पूछत बाली क्या पाप हमारा।।   कौन सी भूल भई सिय से केहीं कारण नाथ ने कानन छोड़ा। जाई समाई गई वसुधा में श्रीराम से नेह का नाता…

  • लोकतंत्र के तानाशाह | Loktantra ke Tanashah

    लोकतंत्र के तानाशाह ( Loktantra ke tanashah )    जमीनें खिसक रहीं, लोकतंत्र के तानाशाहों की ऊर्जस्वित हुए कदम अब, हौसली उड़ान भरने को। दृढ़ संकल्प परम प्रण पद, राष्ट्र धरा सेवा करने को । अहंकार चकनाचूर हुआ, सजगता धार निगाहों की । जमीनें खिसक रहीं, लोकतंत्र के तानाशाहों की ।। विकास प्रगति छद्म रूप,…

  • मेरे पिया फंसे है परदेश | Kavita mere piya phase hain pradesh

    मेरे पिया फंसे है परदेश ( Mere piya phase hain pradesh )      मेरे पिया फंसे है परदेश, वहां से दिया है मुझे निर्देश। बाहर का खाना नही खाना है, भीड़ में बिलकुल नही जाना है।।   कहा है रहना तुम निवास, और रखना प्रभु पर विश्वास। धीरज बिलकुल नही खोना है, सफाई का…

  • रात भर | Kavita Raat Bhar

    रात भर ( Raat Bhar )   आकर भी आप करीब ठहरे नहीं क्यों पल भर बढ़ी धड़कनों में चलती रही हलचल रात भर गुजरती रही रात ,फ़लक लिए निगाहों में सन्नाटा भी चीरता रहा हो मानों मुझे रात भर सो गये होंगे आप बेखबरी की नींद के दामन में खोलते रहे गांठ हम आपकी…

  • चिड़ियों से सीखें | Chidiyon se Sikhen

    चिड़ियों से सीखें चिडियों से सीखे हम वैज्ञानिक युग के विक्षिप्त विकसित कुत्सित मानव प्रेम-प्रीतिकी रीति गीत पेड़ की डाली की महकती चहकती दुनिया बेबस,बंटे,झुलसे,त्रस्त मानव को मुक्ति-मंत्र का संदेश जो हमें देते बहुजन हिताय की नीति बरबस हमें सिखाती द्रोह-भावना को मिटाती पाप,लाभ,लोभ-भोग की परवाह किए बिना सब मिल आशियां बनाते शेखर कुमार श्रीवास्तव…

  • अमरत्व | Amaratva

    अमरत्व ( Amaratva )    माना की बहुत कुछ खो चुका है आपका सालों की मेहनत ,सालों की कमाई बिखर गए हैं , संजते संवरते सपने अपनों की उम्मीदें ..सब कुछ!!! तो क्या!रास्ते यहीं खत्म हो गए हैं !? प्रकृति के विशाल प्रांगण मे खत्म कुछ नही होता दुखी,सुख,उपलब्धियां ,अपने पराए कुछ नही ,कोई नही…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *