गंगा जमुनी संस्कृति | Ganga Jamuni Sanskriti

गंगा – जमुनी संस्कृति!

( Ganga jamuni sanskriti ) 

 

लहू न जम जाए, मिलना चाहता हूँ,
बुलंदियों से नीचे उतरना चाहता हूँ।
घुट रही है दम आजकल के माहौल से,
बिना जंग विश्व देखना चाहता हूँ।

रावणों की आज भी कोई कमी नहीं,
इस तरह की लंका जलाना चाहता हूँ।
भले न जला सको वफाओ का चराग,
गुनाहों से तुम्हें बचाना चाहता हूँ।

जमीं के बिना पहाड़ ठहर नहीं सकता,
अदब करो बड़ों का समझाना चाहता हूँ।
काटो मत हरे पेड़ों को ऐ! जगवालों,
बादल का शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ।

तेरे दिन गुजर गए, मेरे दिन गुजर गए,
किया न तूने फोन बतलाना चाहता हूँ।
सोते हो आसमां में, यहाँ तक ठीक है,
किस मर्ज के हो दवा पूछना चाहता हूँ।

मानों फलदार पेड़ मुल्क है हमारा,
छाया सभी को देना चाहता हूँ।
भड़काओ न लफ्जो से आग डिबेट में,
गंगा-जमुनी संस्कृति बचाना चाहता हूँ।

 

रामकेश एम.यादव (रायल्टी प्राप्त कवि व लेखक),

मुंबई

यह भी पढ़ें :-

https://thesahitya.com/mujra-khaye-ho-chot-dil-pe/

Similar Posts

  • तेरे बिना

    तेरे बिना तू चली गई, मुझे तन्हा छोड़कर,तेरी यादों में हर लम्हा जलता गया।दिल ने अब धड़कना भी छोड़ दिया,बस तेरे जाने के बाद सब ठहरता गया। दीवारों से बातें अब आदत बनी,तेरी परछाईं भी खामोश हुई।अंधेरों में तेरी आहटें खोजूं,पर हर राह अब सूनी हुई। कभी हमसफ़र थे, साथ चले थे,प्यार की राहों में…

  • मां और बाप | Maa aur Baap

    मां और बाप ( Maa aur Baap )   कोन कहता है कि मां जन्नत नहीं होती, पिता की अहमियत मां से कम नहीं होती। दोनों साथ-साथ चले नयी दिशा देते हैं, बच्चों के लिए मां बाप की मन्नत नहीं होती। हर वक्त मां बाप को याद करते हुए आज, हमेशा बोझ रहेगा आपका बिन…

  • मेरे मन का शोर | Mere mann ka shor | Kavita

    मेरे मन का शोर ( Mere mann ka shor )   विचारों की उथल-पुथल उमड़ा मेरे मन का शोर कल्पनाओं ने उड़ान भरी आया भावों का दौर   भावो का ज्वार हिलोरे ले रहा हलचल मची मन में उमंगे उठ रही नित नई साहस भर रहा नस-नस में   प्रचंड भाव प्रवाह मन का तूफान…

  • वेश्याएं | Veshyaen

    वेश्याएं ( Veshyaen )    उनकी गलियों में, दिन के उजाले में जाना, सभ्य समाज को, अच्छा न लगता, इसलिए छद्म वेश में , रात्रि के अंधियारे में , छुप-छुप कर वह जाता है , सुबह दिन के उजाले में, सभ्यता का लबादा ओढ़े , सदाचरण पर भाषण देता, लोग उसे देवता समझ , फूल…

  • मेरे मन का दर्पण | Kavita Mere Man ka Darpan

    मेरे मन का दर्पण ( Mere Man ka Darpan ) मेरे मन के दर्पण मे तस्वीर तुम्हारी है कान्हा, प्रतिपल देखा करती हूं तस्वीर तुम्हारी अय कान्हा, खोली ऑखें तुझको पाया मूॅदी ऑख तुझे ही, कितना भी देखूं तुझको न ऑखों की प्यास बुझेगी, इकदिन सम्मुख दरसन दोगे सोच रही हूं मै कान्हा, प्रतिपल देखा…

  • आओ अस्पताल बनवाएं | Hospital par Kavita

    आओ अस्पताल बनवाएं ( Aao aspatal banaye )    आओ मिलकर नेक कार्य ऐसा हम ये कर जाएं, सबके लिए सार्वजनिक यह अस्पताल बनवाएं। जहां होगा हर रोगी की बीमारियों का ये ईलाज, हर एक व्यक्ति दिन रात देगा सबको वो दुआएं।। कदम-उठाकर कदम-मिलाकर बीड़ा ये उठाओ, अपनें हो चाहें पराये सभी का जीवन ये…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *