तेरे बिना

तेरे बिना

तेरे बिना

तू चली गई, मुझे तन्हा छोड़कर,
तेरी यादों में हर लम्हा जलता गया।
दिल ने अब धड़कना भी छोड़ दिया,
बस तेरे जाने के बाद सब ठहरता गया।

दीवारों से बातें अब आदत बनी,
तेरी परछाईं भी खामोश हुई।
अंधेरों में तेरी आहटें खोजूं,
पर हर राह अब सूनी हुई।

कभी हमसफ़र थे, साथ चले थे,
प्यार की राहों में हम ने वादे किए थे।
फिर क्यों छोड़ दिया एक मोड़ पर आकर,
बता, प्रेम के सपनें कय्या ग़लती किए थे?

अब लौट आओ, फिर से संभालो,
बिछड़े लम्हों पर प्यार बरसालो।
दिल अब भी तेरा इंतज़ार कर रहा है,
धड़कनों में अपनी फिर से बसा लो।

कवि : प्रेम ठक्कर “दिकुप्रेमी”
सुरत, गुजरात

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