आग | Aag

आग

( Aag ) 

 

शाम को अभी और ढल जाने दो जरा
बर्फ को अभी और पिघल जाने दो जरा
अभी अभी ही तो ली है अंगड़ाई तुमने
दिल को अभी और मिल जाने दो जरा

अभी अभी ही तो मुस्कराए हैं लब तेरे
अभी अभी ही तो शरमाई हैं आंखें तेरी
अभी अभी ही तो उतरे हैं केश गालों पर
अभी अभी ही तो झुकी हैं पलकें तेरी

आई है शाम तो चांद का आना भी तय है
मिली हैं निगाहें तो इश्क का होना भी तय है
बंदिशें भी लाख हों आपके दिल पे मगर
है जिश्म तो दिल का धड़कना भी तय है

कर लो भले इनकार ,हमे कोई ऐतराज नहीं
कैसे कह दूं की आपमें कोई जज्बात नही
बढ़ती है ये आग भी आहिस्ता आहिस्ता
कहूं कैसे की धड़कनों पर दिल का राज नही

 

मोहन तिवारी

( मुंबई )

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One response to “आग | Aag”

  1. Shivani Swami Avatar
    Shivani Swami

    V nice dadu ji

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