प्रेम की भाषा हिंदी | Prem ki Bhasha

प्रेम की भाषा हिंदी

( Prem ki Bhasha )

ज़बानो के जमघट में
एक ज़बान है नायाब
हमारी ज़बान”हिंदी”
जिसमें एक लफ्ज़ के
होते हैं कई मुतादरीफ़।

एक “मोहब्बत व ईश्क”को
प्यार कहो या प्रेम
सुर कहो या रश्क
ममता कहो या प्रीति
संस्कृति कहो रीति रिवाज
नाज कहो या लाज….

यह हिन्दी है
माथे की बिंदी है।

Manjit Singh

मनजीत सिंह
सहायक प्राध्यापक उर्दू
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय ( कुरुक्षेत्र )

यह भी पढ़ें :-

Similar Posts

  • धरती की पुकार | Kavita dharti ki pukar

    धरती की पुकार ( Dharti ki pukar )   जब धरती पे काल पड़ जाए हिमपात भूकंप आए वृक्ष विहीन धरा पे बारिश कहीं नजर ना आए   ज़र्रा ज़र्रा करें चित्कार सुनो सुनो धरती की पुकार सागर व्योम तारे सुन लो सारे जग के सुनो करतार   अनाचार अत्याचार पापाचार का बढ़े पारावार संस्कार…

  • पथ पर आगे बढ़ना होगा | Path par Aage Badhna Hoga

    पथ पर आगे बढ़ना होगा ( Path par aage badhna hoga )    चलें  आंधियां  चाहे जितना   धुसित  कर  दे सभी दिशाएं      पिघल  चले अंगारे पथ  पर         उठे  ज्वालाएं  धू-धू नभ  में             फिर भी हमको चलना होगा,               पथ  पर  आगे  बढ़ना होगा।   हंस हंस कर भी रोकर भी…

  • दिल की आवाज | Poem dil ki awaz

    दिल की आवाज ( Dil ki awaz )    मेरा दिल मुझे ही बार-बार आवाज दे खुद को तुम खुद के ही उमंग से नवाज ले। कल के कई है आईनें, आज का रख तु मायने। डर से भरी ज़िन्दगी निडर बन के तु निकल तेरे जैसे बदन बहुत । लेकिन अलग अंदाज दे खुद…

  • राम वैभव | Ram Vaibhav

    राम वैभव ( Ram vaibhav )   वैदेही अनुपमा,राम वैभव आधार जनक दुलारी महिमा अद्भुत, प्रातः वंदनीय शुभकारी । राम रमाकर रोम रोम, पतिव्रता दिव्य अवतारी । शीर्ष आस्था सनातन धर्म, सुरभि संस्कृति परंपरा संस्कार । वैदेही अनुपमा,राम वैभव आधार ।। मृदु विमल अर्धांगिनी छवि, प्रति पल रूप परछाया । प्रासाद सह वनवास काल, अगाथ…

  • ईश्वर की मर्जी | Kavita Ishwar Ki Marzi

    ईश्वर की मर्जी ( Ishwar Ki Marzi )     ईश्वर  की  मर्जी  के आगे, कहाँ  किसी  की चलती है। विधि मिटे ना भाग्य बदलता, होनी  तो होकर रहती हैं।   सीता हरण हुआ राघव का,वधू वियोग पहले से तय था, दश आनन को मारा जाना, राम के हाथों ही निश्चय था।   श्रवण मरे…

  • होली प्रेम | Holi Prem

    होली प्रेम ( Holi Prem )   महक उठा फिर से टेशू, फूलों से अपने प्रिय लाल ! फागुन में उड़ने लगा फिर प्रेम से बने रंग का गुलाल ।। जब पिचकारी मोहे पिया ने मारी रंग डारी मोहे सभी रंगों से सारी, रगड़ रगड़ मोहे ऐसे रंग लगाया निकल गई थकन,सारी बीमारी ।। मचाया…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *