रत-जगे

रत-जगे | Rat-Jage

रत-जगे

( Rat-Jage )

ख़ल्वत में रत-जगे,कभी जलवत में रत-जगे।
बरसों किए हैं हमने मुह़ब्बत में रत-जगे।

करते हैं जो ख़ुदा की इ़बादत में रत-जगे।
आएंगे काम उनके क़यामत में रत-जगे।

समझेगा कैसे हाय वो लुत्फ़-ए-ग़म-ए-ह़यात।
जिसने किए हैं सिर्फ़ मुसर्रत में रत-जगे।

क़ुरबत में चैन देते हैं यह बात सच है,पर।
तकलीफ़ दिल को देते हैं फ़ुरक़त में रत-जगे।

उनकी इ़बादतों सी इ़बादत नहीं कोई।
करते हैं जो किसी की अ़लालत में रत-जगे।

आती थी उनकी याद तो सोते न थे कभी।
हमने किए हैं ऐसे भी ग़ुरबत मे रत-जगे।

बर्बाद उसने कर ली यक़ीनन ही ज़िंदगी।
जिसने किए किसी की कबाह़त में रत-जगे।

क़र्ज़े फ़राज़ कैसे चुकाओगे उनके तुम।
करते हैं जो वतन की ह़िफ़ाज़त में रत-जगे।

सरफ़राज़ हुसैन फ़राज़

पीपलसानवी

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