धूप ऐसी पड़ी मुह़ब्बत की

धूप ऐसी पड़ी मुह़ब्बत की

धूप ऐसी पड़ी मुह़ब्बत की

धूप ऐसी पड़ी मुह़ब्बत की।
खिल उठी हर कली मुह़ब्बत की।

शम्अ़ नफ़रत की बुझ गई फ़ौरन।
बाद जब भी चली मुह़ब्बत की।

उड़ गए होश सब रक़ीबों के।
बात ऐसी उड़ी मुह़ब्बत की।

बाद मुद्दत के आज देखी है।
उनके रुख़ पर हंसी मुह़ब्बत की।

लाख शोअ़ले उठे बग़ावत के।
पर न सूखी नदी मुह़ब्बत की।

जिसने पालीं अदावतें दिल में।
उससे छूटी गली मुह़ब्बत की।

वस्ल है ह़स्नो इ़श्क़ का हर सू।
चल रही है सदी मुह़ब्बत की।

जुड़ न पायी फ़राज़ जोड़े से।
डोर ऐसी कटी मुह़ब्बत की।

सरफ़राज़ हुसैन फ़राज़

पीपलसानवी

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