सुदेश दीक्षित की कविताएं | Sudesh Dixit Poetry
आयेगा बुलावा तो जाना पड़ेगा
आयेगा बुलावा तो जाना पड़ेगा।
माया मोह से हाथ छुड़ाना पड़ेगा।
मस्त हो नींद गहरी में होंगे तब हम।
तुम्हें बार बार ना हमें बुलाना पड़ेगा।
जो मरजी हो बेफिक्र हो करते रहना।
सब ये देख हमें दिल ना दुखाना पड़ेगा।
गिर जाएंगे जब अपनी ही नज़रों से हम।
अपना जनाजा हमें तब खुद उठाना पड़ेगा।
अस्थियां उठा अपनी कहां बहाएंगे हम।
आंखों की गंगा में खुद उन्हें बहाना पड़ेगा।
हर बार दोष हमारा बता बदनाम करते हो।
लगता है अब आईना उसे दिखाना पड़ेगा।
मुझे अच्छा नहीं लगता
वो उदास रहे मुझे अच्छा नहीं लगता।
वो जो कहता है जरा सच्चा नहीं लगता।
हरकतें जरुर हैं उसकी बच्चों बाली।
पर उमर से तो वो बच्चा नहीं लगता।
खा के ठोकरें दर दर की थक गया है।
पक गया है वो कच्चा नहीं लगता।
अपनी अपनी नज़र का नजरिया है।
मुझे कहीं से वह टुच्चा नहीं लगता।
जोहरी हो तुमने जांचा परखा होगा।
दीक्षित कहीं से भी सुच्चा नही लगता।
सुच्चा – मोती
याद आता है
दरो दीवार आंगन का शज़र याद आता है।
शहर में बैठे बैठे जब घर याद आता है।
हिचकी अक्सर मां की याद दिलाती है।
गांव का पनघट,पीपल अक्सर याद आता है
कमाने की दौड़ में इतना आगे निकल आया।
बचपन में बाप की मार का डर याद आता है।
तेरे साथ भी ज़िद कर सकते नहीं जिंदगी।
जहां दी थी नसीहत वो दर याद आता है।
लड़ते झगड़ते हैं हम ज्यादा जिससे।
वो शख्स बहुत मर कर याद आता है।
कहर इस तरह से बरपा कि हद हो गई।
होना इस तरह बरसात में बेघर याद आता है।
छाऊं सारेयां जो ( पहाड़ी रचना )
मतलबे ताएं मांह्णु इक दूजे से लपटोंदे दिक्खे।
अप्णिया अग्गी च म्हाणू लह्सटोंदे दिक्खे।
बूटेयां देणि जिह्नां छाऊं सारेयां जो।
वगैर खादी पाणियें सैह मट्ठोंदे दिक्खे।
होंन पेडू भरोयो दाणेयां ने जिह्नां दे।
राती दिनें घर्राडेयां मारी सैह सोंदे दिक्खे।
हुंन्दा नी जिह्नां दा गुरु पीर कोई।
जवानी अप्णियां ते सैह पऴटोंदे दिक्खे।
चतर चलाकां दा हुण जमानां गिया गुआजा।
बड़े चतर भी वक्ते दे छज्जें छंण्डोंदे दिक्खे।
टैंम अप्णिया बत्ता ढाऴी लैंदा सबनी जो दीक्षिता।
नि ढऴदे जेहडे सैह जाह्नुआं भारें घस्सटोंदे दिक्खे।
दर्द इक दिल में बसा लिया
दर्द इक दिल में बसा लिया।
खुद को जीना सिखा लिया।
बडी मुश्किल से गमों को।
तिरी नजर से बचा लिया।
खुद को ढूंढते रहे जहां में।
खुद से खुद को छुपा लिया।
तुझ से न रंज न द्वैस कोई मुझे।
यूं ही रूठ कर तूने बुरा मना लिया। क्षय
छूटने वाला नहीं दामन अब गमों से
दीक्षित दिल को ग़मों ने घर बना लिया।
चतर चलाक (पहाड़ी रचना)
दिन भर जेह्डे पटोंदे दिक्खे।
संझा हुंदिया सैह लटोंदे दिक्खे।
दुईं टैमां दी रोटी होई जिन्हां दी भारी।
उमर सारी जेह्ड़े खरडोंदे दिक्खे।
खोलियां जिन्हां होरनां ताएं मुट्ठीं।
अपणे ताएं सैह संगडोंदे दिक्खे।
छाड़ां छड्डी भी जेह्ड़े ठीक नी होए।
कुक्कड़ तिन्हां ताएं राती मरड़ोंदे दिक्खे।
नट्ठी करी जिन्हां बसाया घर अपणा।
तिन्हां दे घरां च ड़ांग सोह्ठे होंदे दिक्खे।
बणदे थे जेह्ड़े बड़े चतर चलाक।
वक्ते दे पैरां सैह पोंदे दिक्खे।
चंद घड़ी के मेहमान
तुम चंद घड़ी के यहां मेहमान हो
फिर भी बनते फिरते शैतान हो
बताओ तो कब से हो गए इंसान
लगते लोगों को अभी भी हैवान हो
नहीं पहचान पाओगे चालों को तुम
दुनिया में अभी भी तुम नादान हो
फैसला कभी नहीं भी होता हक में
उसके फैसले पर क्यों तुम हैरान हो
बोलें भले ही सबके सामने कुछ भी
मानते हैं आज भी तुम मेरी जान हो
मूंद के आंखें गुजर जाओ करीब से
जैसे कुछ नहीं जानते तुम अनजान हो
मुहब्बत
मुहब्बत को मुहब्बत समझोगे तभी मुहब्बत करोगे।
रहेगी ही नहीं मुहब्बत तो किससे मुहब्बत करोगे।
मुहब्बत की बातें नहीं अच्छी लगती तिहारे मुंह से।
मां बाप से न की तो औरों से ख़ाक मुहब्बत करोगे।
छोड़ कर चले गए परिवार को सोता रात में चुपके से।
परिवार से न की तो खुदा से तुम क्या मुहब्बत करोगे।
डगर मुहब्बत की इतनी आसान नहीं है बरखरुदार।
चलोगे इस पर तो तुम खुद से सच में मुहब्बत करोगे।
दर्द ज़ख्म ग़म दगा धोखा बेवफा का नाम है मुहब्बत।
दीक्षित दोस्ती करोगे इनसे तभी मुहब्बत से मुहब्बत करोगे।
गिले-शिकवे उसको करना नहीं आता।
गिले-शिकवे उसको करना नहीं आता।
दिया ज़ख्म उसको भरना नहीं आता।
खाए हों जिसने धोखे खुद से ही ।
धोखों से उसको डरना नहीं आता।
कैसे यकीं कर लूं कि मर गया वो।
वो जो उसको मरना नहीं आता।
हार कर मैं चुप हो जाता हूं अक्सर।
सच में मुझे झगड़ना नहीं आता ।
ज़िद्दी है मानता ही नहीं बात मेरी।
छूटे पल्लू का छोर पकड़ना नहीं आता ।
सच यही है
सच यही है कि लोग अजमाने लगते हैं।
बात बात पे ताहने सुनाने लगते है।
आज के बच्चों में यही इक दिक्कत है।
भले की बोलो तो आंखें दिखाने लगते हैं।
फेल तो होंगे ही वो समाज की परिक्षा में।
दो दो को चार नहीं छ:जो वताने लगते हैं।
नहीं है ऐसे लोग भी कम हमारे जीवन में।
जो मदद को एहसानों में गिनाने लगते हैं ।
निकलती है मुख से तब भी दुआ उनके लिए
जो जन्म दात्री का दिल जब दुखाने लगते हैं।
कर देता है फैसला सही गलत का पल में।
खुद को जो खुदा से ऊपर बताने लगते हैं ।
छूट जाती है तरक्की जिंदगी में उनसे।
जो बाप को ऊंच नीच समझाने लगते हैं।
चंद घड़ी के
तुम चंद घड़ी के यहां मेहमान हो
फिर भी बनते फिरते शैतान हो
बताओ तो कब से हो गए इंसान
लगते लोगों को अभी भी हैवान हो
नहीं पहचान पाओगे चालों को तुम
दुनिया में अभी भी तुम नादान हो
फैसला कभी नहीं भी होता हक में
उसके फैसले पर क्यों तुम हैरान हो
बोलें भले ही सबके सामने कुछ भी
मानते हैं आज भी तुम मेरी जान हो
मूंद के आंखें गुजर जाओ करीब से
जैसे कुछ नहीं जानते तुम अनजान
सोचा न था
सच बोलने पर झगड़ा होगा सोचा न था।
झूठ से ही मुंह मीठा होगा सोचा न था।
यूं ही मज़ाक में सौदा किया था दिल का।
सौदा इतना मंहगा होगा सोचा न था।
झगड़े सुलझाने ले जाते थे लोग जिसे।
अपने ही खूं से दंगा होगा सोचा न था।
मुक्ति पाने को रावण ले आया था जानकी।
कलयुगी रावण लुटेरा होगा सोचा न था।
बड़े बड़े सपने सजा दौड़ रहे थे नींद में।
होगा एक भी न पूरा ऐसा सोचा न था।
चिड़िया सोने की है भारत अभी भी तो।
आधा हिस्सा नंगा भूखा होगा सोचा न था।
जला कर दिल रौशन की राहें तेरी।
अपने घर में अंधियारा होगा सोचा न
सूरज भी
अनाथ कर बाप जब मरता है।
जमाना तभी सर पे चढ़ता है।
जिंदा है बाप जब तक सच में।
सूरज भी आंख दिखाने से डरता है।
होते हैं होंसले बुलंद बाप के रहते।
साया भी तब पानी भरता है।
कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता दुःख दर्द।
इन सब से हिफाजत बाप करता है।
चुपके से
बड़ी मासुमियत से जो दर्द अदा कर गए।
उठा न सकूं सर इतना खौफ जदा कर गए।
रात गुजारी है कैसे क्या बताएं हम।
हमारे ख्वाब हमी से दगा कर गए।
वो डराते रहे साथ रह कर हमें सदा।
फिर भी हम उनसे वफ़ा कर गए।
मशगूल थे हम पुराने ग़मों को भुलाने में।
चुपके से वो इक ग़म और अता कर गए।
नहीं दिल को अच्छी कोई हसीं चीज अब।
जब से वो बांतों से हमें खफा कर गए।
छोड़ दिया
साया उठा बाप का,बाहर जाना छोड़ दिया।
आई होश जब तोआंखें दिखाना छोड़ दिया।
आ गए जूते बच्चों के पांवों में जब मेरे।
हो गये वो स्याने उन्हें समझाना छोड़ दिया।
घर है खुला जब मर्ज़ी आ के लूट लो।
सांकल टूटी तो ताला लगाना छोड़ दिया।
बहुत छोड़े रखा दिल को साथ उनके ।
किराए दार इसमें बसाना छोड़ दिया।
लौटे तो देखा सब बिखरा था इधर-उधर।
जो लुट गया उस पर आंसू बहाना छोड़ दिया।
दो गली छोड़ ले लिया घर उसने सुना है।
घर पड़ा अधूरा अपना बनाना छोड़ दिया।
सहारे गए
पता नहीं क्यों हम नकारे गए ।
लुटा के सब हम मारे गए।
सहारा दिया अपना समझ।
तभी तो अपने सहारे गए।
वक्त की दौड़ में पिछड़ गए।
हाथों से छूट किनारे गए।
हमने चाहा जी भर सभी को।
हमीं सब ओर से नकारे गए।
बहला कर हमें,हमारे हक।
सामने हमारे डकारे गए।

सुदेश दीक्षित
बैजनाथ कांगड़ा
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