वो घास हैं

वो घास हैं

वो घास हैं

पाश हो या सफदर हाशमी
या हो फिर भगत सिंह
इन तीन नाम में छिपे हैं कई और नाम
डराया गया
धमकाया गया
मारा गया
कोशिश की गई उनके विचारों को मिटाने की
क्या फिर भी मिट पाए ये नाम?
क्या नेस्तनाबूद हुए उनके विचार ?

वो तो घास हैं
हर बार उग आते हैं कहीं ना कहीं
जो जगह कर दी है तुमने बंजर
जहां पर विचारों का सूखा पड़ा हो
अक्ल का पड़ा हो अकाल
ये घास की तरह
अपने विचारों की हरियाली फैलाते हैं
हर बार कहीं ना कहीं
फिर फिर उग आते हैं
सत्ता के मद में चूर तानाशाह को
उसकी औकात दिखाते हैं

अनुवादक: दीपक वोहरा

(जनवादी लेखक संघ हरियाणा)

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