मजदूर | Poem mazdoor

मजदूर

( Mazdoor )

मजदूर दिवस पर रचना

 

मुश्किल से टकराता है
मेहनत को वो अपनाता है
गरम तवे की रोटी खातिर
परदेस तलक वो जाता है

 

हाथों का हुनर रखता है
वो महल अटारी करने को
खून पसीना बहा देता
पेट परिवार का भरने को

 

मजदूर आज मजबूर हुआ
महंगाई की मार सहने को
कौन ले सुधबुध उनकी
बचा नहीं कुछ कहने को

 

सर्दी गर्मी वर्षा में भी
वो कर्म पथ अपनाता है
नीली छतरी के नीचे बैठा
हाथों का हुनर दिखाता है

 ?

कवि : रमाकांत सोनी सुदर्शन

नवलगढ़ जिला झुंझुनू

( राजस्थान )

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