बदल रहा है जीवन का ही सार

बदल रहा है जीवन का ही सार

बदल रहा है जीवन का ही सार

कहने को तो बदल रहा है,
जीवन का ही सार।

यूं तो शिक्षा के पंखों से,
भरकर नयी उड़ान।
बना रही हैं आज बेटियां,
एक अलग पहचान।
फिर भी सहने पड़ते उनको,
अनगिन अत्याचार।
कहने को तो बदल रहा है,
जीवन का ही सार।

तोड़ बेड़ियां पिछड़ेपन की,
बढ़ने को हैं आतुर।
इधर-उधर मन के भीतर पर,
बैठा है भस्मासुर।
प्रश्न विकट यह, भेदें कैसे,
कुंठा की दीवार।
कहने को तो बदल रहा है,
जीवन का ही सार।

नवयुग की इस चमक-दमक में,
भूले हम अपनों को।
भाग रहे हैं पूरा करने,
केवल कुछ सपनों को।
पीछे छूट गया लेकिन जी,
आपस का ही प्यार।
कहने को तो बदल रहा है,
जीवन का ही सार।

डाॅ ममता सिंह
मुरादाबाद

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