पग बढ़ाते चलो

पग बढ़ाते चलो

पग बढ़ाते चलो

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कंकड़ी संकरी पथरीली,
या हों रास्ते मखमली।
हृदय में सदैव जली हो अग्नि,
स्वार्थ हमें सब होगी तजनी।
सेवाभाव की मंशा बड़ी,
रास्ते में मुश्किलें भी होंगी खड़ी।
पर जब करने की मंशा हो भली,
बाधाएं दूर हो जातीं बड़ी से बड़ी।
खुदा के वास्ते न देखो पीछे मुड़कर,
बस तू पग बढ़ाते चलो डटकर।
डाल हाथों में हाथ,
सबको लेकर चलो तू साथ;
काबू में रखें सभी अपने जज्बात।
आह्वान, उद्घोष करते चलो,
पग आगे ही आगे रखते चलो।
निर्धारित लक्ष्य तक पहुंचे बिना,
झुके न तेरा ये शीष,सीना।
थके नहीं तेरे ये पांव,
भले लग जाएं उनमें दो घाव ।
घाव के उस टीस को ही बनाओ प्रेरणा,
मंजिल कैसे मिलती है ? यह देखना!
पथ से विचलित न होना,
ना कष्टों का रोना रोना।
साथ चल रहे लोगों से कहना,
रूको ना … रूको ना!
अब आने ही वाली है मंजिल-
चलकर वहीं ठहरो ना,
रास्ते में यूं रूको ना।
दूर निकल आए हैं-
धैर्य और साहस खोवो ना,
थोड़ी और हिम्मत रखो ना।
चल पड़े हैं-
निकल पड़े हैं मंजिल की ओर,
पहुंच ही जायेंगे अब होते-होते भोर।
मचाओ न अनर्गल सब शोर,
बस पग बढ़ाते चलो,
पग बढ़ाते चलो।
मंजिल आने ही वाली है,
समझो आ ही गई है-
अब तकदीर बदलने ही वाली है,
तस्वीर बदलने वाली है;
कष्ट अब दूर होने ही वाली है।
मंजिल पाकर जश्न मनाएंगे,
वहीं रूक थोड़ा सुस्तायेंगे ।
असीम शांति का अनुभव कर पायेंगे,
जो मानवता की सेवा में लग जायेंगे।

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नवाब मंजूर

लेखक– मो.मंजूर आलम उर्फ नवाब मंजूर

सलेमपुर, छपरा, बिहार ।

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