कागा काव्य किरन | Kaga Kavya Kiran
मज़दूर दिस
एक मई मज़दूर दिवस मोज मस्ती से मनायें,
अपना भविष्य मज़दूर दिवस शानो शोक्त से मनाये।
करते ख़ून पसीने की कमाई हाढ़ तोड़ ह़लाल,
तपती धूप दुपहरी में अपनी अच्छी बस्ती बनायें।
सर्दी में ठिठुर अलाव पर हाथ पैर तपाते,
तन बदन पर पहने फट्टे चीत्थड़े हस्ती बनायें।
धूल भरी चलती आंधियां सरपट लू के थपेड़े,
बरसे आग के गोले अंगार झुग्गी सस्ती बनायें।
घास फूस आड़ी टेड़ी लकड़ियां जंगल से काट,
अपना आशियाना झौंपड़ी चलती फिरती गश्ती बनायें।
बारिश में टपकती चारों ओर पानी का बहाव,
आफ़्त सिर पर मंडराती काग़ज़ की कश्ती बनायें।
हम मज़दूर ज़रूर मगर मजबूर मोह़ताज नहीं कागा,
हाथ में हुनर हरदम अपना भाग्य दस्ती बनायें।
देश प्रेमी
हम है देश प्रेमी ग़दार नहीं,
हम है देश भक्त ग़दार नहीं।
जान हथेली पर रख खड़े है,
मर मिटने को तैयार ग़दार नहीं।
सीमा सुरक्षा वास्ते तैयनात लाम बंद,
चुस्त दुरस्त चाक चौबंद ग़दार नहीं।
देंगे मुंह तोड़ जवाब चुनोती का,
दुश्मन होगा मटिया मेट ग़दार नहीं।
हंगामी ह़ालात है जंग का आस़ार,
ख़बरदार ख़ुदार हमेशा हम ग़दार नहीं।
गोली बम का नहीं ख़ोफ़ कागा,
तजुर्बा है मुक़ाबले का ग़दार नहीं।
जाति जन गणना
जाति गत जन गणना का फ़ेस़ला हो गया,
जनता जीत गई गणना का फ़ेस़ला हो गया।
सालों से मांग जारी जाति जन गणना की,
टालम टोल होती रही लगातार फ़ेस़ला हो गया।
ह़क़ हड़पा गया बहुजन का चाहू बलियों द्वारा,
डकार गये निवाला छीन झपट फ़ेस़ला हो गया।
बंधुआ अनपढ़ अबूझ सोच कर बने महा मूर्ख,
पूर्व जन्म का पाप कर्म फ़ेस़ला हो गया।
सनातन के सपने सलोने दिखाये हर दम हमेशा,
विधि विधाता का खेल निराला फ़ेस़ला हो गया।
सोया ज़मीर जाग उठा ग़ाफ़िल गहरी नींद से,
देर हुई अंधेरा मिटा दुरस्त फ़ेस़ला हो गया।
आस जगी निराश भागी उल्टे पांवों लोट कागा,
अमीर ग़रीब को बराबर बंटवारा फ़ेस़ला हो गया।
एक नेक हो जाओ
आपसी मत भेद भुला दो एक हो जाओ,
आपसी मन भेद भुला दो नेक हो जाओ।
फूट का फायदा उठा कर दुश्मन लूट लेगा,
निजी दुश्मनी को दूर कर एक हो जाओ,
हल्की फुल्की ह़रकत होती रहती है हर रोज़,
नौक झौंक निकालो दिल से एक हो जाओ।
जाति धर्म ऊंच नीच की भावना बड़ी नादानी,
भेद भाव छूआ छूत छोड़ एक हो जाओ।
सालों तक रहे ग़ुलाम ग़ैरों गोरों के लाचार,
याद करो ज़ुल्म सित्म अत्याचार एक हो जाओ।
घुटनों बल चल गिड़ गिड़ा करते बाप दादा,
तलवा चाटते चाह से मजबूर एक हो जाओ।
पुरखों की परेशानी याद करो रहते पराधीन कागा,
लड़ाई झगड़ा रगड़ा लफड़ा छोड़ो एक हो जाओ।
आखातीज
आखातीज पर्व पर गर्व सर्व समाज को,
आखातीज पर्व पर गोर्व सर्व समाज को।
ढाट मारवाड़ के हाली बनाते मोज मस्ती,
झूम चूम धरा चाहते आबाद अपनी बस्ती।
आंगन पर सजती धान की ढेर ढेरियां ,
बाजरा मूंग मोठ मतीरा काचर बीज ढेरियां।
किसी सुंदर बर्तन में जल भरा जाता,
शकुन शुभ कामना संदेश संग रिश्ता नाता।
गेहूं आटे के बनते पतले फाफरे फलके,
मीठी रस भरी राबड़ी नैनों प्रेम छलके।
हाली मन हृषित आसाड़ श्रावण भादो असोज,
मास बनाते मिट्टी के तालाब ख़बर खोज।
अनुमान भविष्य वाणी वर्षा का काल सुकाल,
अगला चौमासा कैसा होगा ह़ाल चाल सुकाल।
कागा अक्ष्य तृत्या अबूझ लग्न ज्योतिष प्रमाण,
वर वधु कुंडली चाहे कैसी मांगलिक प्रमाण।
ज़हरीला इंसान
जात पात मज़हब का ज़हर घोल रहे हैं,
अगड़ा पिछड़ा धर्म का ज़हर घोल रहे है।
गड़े मुर्दे दफ़न कफ़न में क़बरस्तान में क़ैद,
इंतक़ाम के बहाने अपना दुश्मन बोल रहे है।
मौक़ा प्रस्त करते थे माज़ी में झुक ग़ुलामी,
उनकी औलाद अपनी पुश्तेनी पोल खोल रहे है।
अपना रोब रुतब्बा क़ायम दायम वास्त़े होते मातह़त,
आज की पीढ़ियां अपना वजूद तोल रहे है।
अफ़वाहों का बज़ार गर्म झूठ झांसे का तालमेल,
बेहूदा अलफ़ाज़ बोल अमनो अमान टटोल रहे है ।
जी ह़ुज़री का जमाल ख़ून में बसता कागा,
बदले माह़ोल में डगमग डगर डोल रहे है।
नरेंद्र मोदी
अगर मोदी है तो सब कुछ मुमकिन है,
अगर मोदी है तो सालम सलामत ज़मीन है।
मुल्क की सीमायें सुरक्षित चारों ओर चाक चौबंद,
पडो़सी देशों से रिश्ते मज़बूत डरता चीन है।
किसी धर्म मज़हब पर कोई ख़त़रा नहीं ख़ोफ़,
इबादत करने की छूट चुस्त दुरस्त दीन है।
भाईचारा गंगा जमनी की मिस़ाल वंदे मातृम नारा,
राष्ट्र गान गूंजा गगन परचम रंग तीन है।
तिरंगा लहराये बुलंद ऊंचा आसमान वत़न की शान,
चेहरे चमकते जनता के नहीं कोई ग़मगीन है।
छप्पन इंच की छाती नरेंद्र मोदी महान कागा,
दुश्मन कांपता थर्र थर्र मन उदास बेचीन है।
पहलगाम
पहलगाम पर मचा कोहराम कोई मामूली घटना नहीं,
पहलगाम पर मचा संग्राम कोई मामूली घटना नहीं।
जम्मू कश्मीर में सुलग रही चिंगारी चुप चाप,
सुरक्षा में चूक जान कोई मामूली घटना नहीं।
आतंक वादियों के ह़ोस़ले बुलंद बदले की भावना,
पर्यटकों का क़तले आ़म कोई मामूली घटना नहीं।
जात पात धर्म दीन मज़हब का बोल बाला,
नहीं रहा अमनो अमान कोई मामूली घटना नहीं।
अपने मुल्क में मंडराये जीवन पर भारी ख़तरा,
सुरक्षित नहीं अपनी जान कोई मामूली घटना नहीं।
किसी का सिंदुर लूटा गया सूनी हुई मांग,
बहिन रोती भाई क़ुर्बान कोई मामूली घटना नहीं।
पिता का साया हटा सिर से बच्चे यतीम,
रोते बिलखते बेबस बेजान कोई मामूली घटना नहीं।
अपना दर्द पीड़ा किसको को करें पैश कागा,
सुनता नहीं खोल कान कोई मामूली घटना नहीं।
दोगले
दले दोगले चले करने चापलूसी आदत से मजबूर,
पिलाया नहीं पानी प्यासे को आदत से मजबूर।
मुफ़्त ख़ोर चुग़ल चोर करते रहे चमचा गिरी,
पराये माल पर मोज मस्ती आदत से मजबूर।
करते डाल डाल पाता पात पर अपना बसेरा,
फुदक करते फूलों पर भंवरे आदत से मजबूर।
गंद मक्खी बन बेठ जाते चिकने चेहरे पर,
यदा कदा गंदे नासूर पर आदत से मजबूर।
चालाक चतुर करते चाकरी चाटूकार अपने आक़ा की,
करते काना फूसी गुमराह ग़ुलाम आदत से मजबूर।
बराबरी करना बस की बात नहीं बुराई पैशा,
गिला शिक्वा ग़म ग़ुस़ा ग़ज़ब आदत से मजबूर।
जाने अनजाने बन जाते लाडे की भूआ कागा,
बिना हींग फिटकड़ी रंग चोखा आ़दत से मजबूर।
नफ़रत
नफ़रत का नंगा नाच हो रहा है,
फ़ितनत का गंदा नाच हो रहा है।
इंसान बंट गया जाति मज़हब फ़िरक़ों में,
अदाववत का दंगा दर्द रो रहा है।
अमनो अमान ग़ायब फि़तना फ़स़ाद सितम जारी,
बग़ावत का बीज बाग़ी बो रहा है।
चादर ओढ़ चापलूसी की चुग़ल चोर बेपरवाह,
शरारत की गेहरी नींद सो रहा है।
नाच नहीं जाने आंगन टेढ़ा बहाना बेशुमार,
ख़िलाफ़त का ख़ोफ़ बोझ ढो रहा है।
इंसान दुश्मन इंसान का ख़ून का प्यासा,
हिमाक़त से ह़क़ खुशी खो रहा है।
ज़ुल्म ज़ोर ज़बरदस्ती का ज़माना ज़ालिम कागा,
इबादत का आंसू चेहरा धो रहा है।
बदला
अब वक़्त आया दुश्मन को सबक़ सिखाने का,
अब वक़्त आया दुश्मन को मज़ा चखाने का।
हम साया होते तंग ह़ाल तकलीफ़ में हमदर्द,
लाग़र्ज़ फ़र्ज़ नहीं निभाये दम ख़म दिखाने का,
धर्म पूछ बेदर्दी से मारा बेगुनाह बंदों को,
दहश्त गर्दी कर ह़मला बदला माह़ोल बरग़लाने का।
दबंग मारते मुल्क में जात पात पूछ कर,
ऊंच नीच भेद भाव दबोच कर दहलाने का।
धर्म जाति त़ब्क़े तेअस़ब तकरार की जड़ें गहरी,
हस्ती मस्ती मिटती नहीं बेबस दिल बहलाने का।
हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई में किया इंसान तक़्सीम,
झंझट झगड़ा अगड़ा पिछड़ा कायर कमज़ोर कहलाने का।
ईंट का जवाब पत्थर से कर तैयारी कागा,
जंग में जायज़ होता ख़ून में नहलाने का।
दोस्त-दुश्मन
अगर चाहें अपना दोस्त एहसास का रिश्ता जोड़,
अगर चाहें अपना दुश्मन एह़सान का रिश्ता जोड़।
पानी पर बनते बिगड़ते बुलबुले पल भर आरज़ी,
ठहरा दायमी गंदा बहता उजला स़ाफ़ रास्त़ा मोड।
बड़े ह़ेरत अंगेज़ होते ग़ैरत नहीं ग़ुलामी से,
एक झटके से नहीं आहिस्ता कर वास़्ता तोड़।
मौक़े की तलाश में रहते मुफ़त ख़ोर अ़नास़र,
सिर ऊंचा कर चलना चाहें दब्बू दास्ता छोड़।
दलाल से दोस्ती इज़्ज़त आबरू को ख़त़रा लाह़क़,
दलेर बन दमदार दूर रहना कोसों गुमाश्ता गठजोड़।
मत़लबी दोस्त नहीं होते जानी दुश्मन क़रीबी कागा,
दोस्त हम किनार आयेंगे तुरंत बन फ़िरश्ता दोड़।
समाज सेवा
समाज में राजनीति का घाल मेल हो गया,
अध्यात्म में राजनीति का ताल मेल हो गया।
मंदिर मस्जिद चर्च में होती चर्चा धर्म की,
इबादत में राजनीति का खुला खेल हो गया।
संत साधु पीर फ़क़ीर पादरी सत्ता के मोह़ताज,
मठ छोड़ चला महंत पंच पटेल हो गया।
पूजा पाठ आरती आराधना मन तन उदास हुआ,
जप तप साधना जलता दिया तेल हो गया।
माला उतार गले से गमछा पहना पार्टी का,
रुद्राक्ष का मनका गोफ़न का गुलेल हो गया।
घोड़ा नंदी मोर शेर चूहा वाहन सवारी कागा,
विश्वास नहीं रत्ती भर आवागमन रेल हो गया।
ख़ुदार
ख़ुदा को पसंद नहीं सख़्ती बयान में,
इसलिये पैदा की नहीं हड्डी ज़ुबान में।
बत्तीस दांतों के बीच क़ैद हुई क़ाबू,
दो तलवार नहीं होती एक मयान में।
ज़ुबान ज़हर अकसीर का ख़ज़ाना ज़र ज़ख़ीरा,
उगलती निगलती हमेशा वक़्त बवक़्त शान में।
भगदड़ अफ़रा तफ़री मची रस्सा कसी जारी,
जैसे जान फूंकी जाती किसी बेजान में।
नाक रगड़ देने से कटवा देना बेहत्तर,
ग़ुलामी ज़िंदगी जीना एक अज़ाब जहान में।
घुटनों के बल मरना नस्ल नेस्तो नाबूद,
खड़ा सिर क़लम चंगा जंगे मैदान में।
बिकना झुकना रुकना मिज़ाज में नहीं कागा,
इज़्ज़त आबरू पर आंच नहीं ज़मान में।
बिकाऊ
बिक गये बीच बज़ार कोड़ियों के भाव,
जन्नत मिली नहीं जह्नुम कोड़ियों के भाव।
अमीर बनने की आरज़ू दिल दग़ा बाज़,
बिके गये लार टपक कोड़ियों के भाव।
सरे आम नीलाम होते चर्चित मंडी में,
बिक गये औने पौने कोड़ियों के भाव।
दो कोड़ी के लोग बिकते बरियानी पर,
बिके गये पव्वे पर कोड़ियों के भाव।
बाशऊर बिकते नहीं रहते बेदाग़ दामन बावफ़ा,
बिक गये बेज़मीर बेशऊर कोड़ियों के भाव।
शेर जूठन नहीं खाता कुत्ते का शिकार,
बिक गये बदमाश बेवफ़ा कोड़ियों के भाव।
गिद्ध नोचते मरे पशु के कंकाल को,
बिक गये भूखे भेड़िये कोड़ियों के भाव।
ईमान लाज ह़य्या बचा नहीं बाक़ी कागा,
बिक गये जिस्म फ़रोश कोड़ियों के भाव।
बिना पैंदे के
लुढ़क जाते इधर उधर बिना पैंदे के लोटे,
लपक जाते इधर उधर बिना पैंदे के लोटे।
पीतल कांसा तांबा चांदी चाहे हो मिट्टी के,
लटक जाते इधर उधर बिना पैंदे के लोटे।
भरे हो पानी से चाहे हो आधे ख़ाली,
पटक जाते इधर उधर बिना पैंदे के लोटे।
भरोसा नहीं करना बिना पैंदे वाले बर्तनों पर,
अटक जाते इधर उधर बिना पैंदे वाले लोटे।
बद से बदनाम बुरा आदत रहती उनकी अनाड़ी,
मटक जाते इधर उधर बिना पैंदे के लोटे।
दुनिया में होते दुश्मन भलाई करने पर कागा,
भटक जाते इधर उधर बिना पैंदे के लोटे।
लालची
लालची लोग लूटे जा रहे हैं,
आलसी लोग लूटे जा रहे हैं।
सु़बह़ दुपट्टा नीला शाम को भगवा,
दोगले लोग लूटे जा रहे हैं।
जय भीम का देते नारा नक़ली,
मत़लबी लोग लूटे जा रहे हैं।
पद पैसे का लोभ मानसिक ग़ुलाम,
चापलूस लोग लूटे जा रहे हैं।
दूर रहना हरगिज़ दग़ा बाज़ से,
बिचोलिये लोग लूटे जा रहे हैं।
पव्वा पुलाव चाट चाशनी के शौक़ीन,
पेटू लोग लूटे जा रहे हैं।
अपनों की करते मुख़बरी दलाली कागा,
लफ़ंगे लोग लूटे जा रहे हैं।
जन्म भूमि
बरसूं बीते विदा हुए जन्म भूमि याद है,
सालों गुज़रे जुदा हुए जन्म भूमि याद है।
वक़्त बदला माह़ोल गर्म हुआ अफ़रा तफ़री मची,
सरह़दों की लकीरें खींची जन्म भूमि याद है।
बच्चपन खेला गलियों में गुली डंडा का खेल,
लंगोटिये यार छोड़ चले जन्म भूमि याद है।
जवानी का जोश जल्वा ज़िंदगी का हर लम्हा,
गाबड़ी कब्ड़ी सतोलिया दोड़ जन्म भूमि याद है।
खेतों में करते काम चौमासे की मौसम में,
गाते हमरचो की हुंगार जन्म भूमि याद है।
कागा करवट बदली हुई इकहतर की जंग जोरदार,
पलायन किया पाक से जन्म भूमि याद है।
बराबर
हाथ की पांचों उंगलियां बराबर नहीं होती,
लंबी छोटी पतली उंगलियां बराबर नहीं होती।
सूरज चांद सितारे आसमान पर चमका करते,
चमन में फूल कलियां बराबर नहीं होती।
खिलते फूल रंग बरंगी कांटों के साथ,
गुंजन भंवरों की तितलियां बराबर नहीं होती।
जिस्म बना गोश्त ख़ून का अस्थि पंजर,
सीने का ढांचा पसलियां बराबर नहीं होती।
गांव शहर बस्तियां हस्तियां हुजूम इंसानों का,
ग़नीमत मान चलिये गलियां बराबर नहीं होती।
अमीर ग़रीब का अलग अंदाज़ मिज़ाज कागा
रंगीन संगीन रंग रैलियां बराबर नहीं होती।
भावी पीढ़ी
आने वाली पीढ़ी हमें माफ़ नहीं करेगी ,
हम निकले नाकाम नादान माफ़ नहीं करेगी!
हम बने मानसिक गुलाम पिछलग्गू की त़रह़,
होते रहे चालाक चापलूस माफ़ नहीं करेगी!
ख़ुद ग़र्ज़ ख़ात़िर जी-ह़ुज़ूरी करते रहे,
हां में हां मिलाया माफ़ नहीं करेगी!
ज़मीर बेच दिया अपना सस्ते दाम में,
पव्वे पाणी पुरी पर माफ़ नहीं करेगी!
क़ौम का क़तल किया अपने हाथों से,
दोगले बने दग़ा बाज़ माफ़ नहीं करेगी!
बेईमान बन दिया ग़ैरों का सथ ‘कागा”
अपनों का ह़क़ हड़पा माफ़ नहीं करेगी!
आदतन
आदत से मजबूर चंद ख़ुराफ़ाती लोग,
आ़दत से मजबूर चंद शरारती लोग!
अमनो अमान नापसंद दहशत गर्दी चाहते,
आदत से मजबूर चंद शिकायती लोग!
ख़ामियां खोजते हर नेक काम में,
आ़दत से मजबूर चंद बग़ावती लोग!
चापलूसी करते चुग़ली बेहूदी बातें कर,
आदत से मजबूर चंद अ़दावती लोग!
तोड़ मरोड़ करते बात का बतड़ंग,
आ़दत से मजबूर चंद बनावटी लोग!
सुरख़ुरू बन करते साज़िश बेवजह ‘कागा”
आदत से मजबूर चंद मिलावटी लोग!
मन-मानी
जिसकी लाठी उसकी भैंस नीति बन गई,
जिसकी लाठी उसकी भैंस रीति बन गई!
समय बदला स़ूर्त मूर्त बदली त़ौर त़रीक़ा,
हवा का रुख़ बदला प्रीति बन गई!
अनाड़ी के हाथों मिली कमान बिना मेह़नत,
घर बेठे गंगा नहाई अनुभूति बन गई!
हींग लगी नहीं फिटकड़ी नहीं माथा फोडी़,
मुफ़्त में मिली सौग़ात स्तुति बन गई!
सत्ता मिली शरारत से अ़दावत बग़ावत नहीं,
ख़ेरात खाकर ख़ुश हुए कुरीति बन गई!
घर का भेदी लंका ढाये डंका बजाये,
‘कागा’ बंदर बांट एक अनीति बन गई!
इंसानियत
इंसानियत भी कोई चीज़ होती है,
ह़ेस़ियत भी कोई चीज़ होती है!
रब ने एक अदना इंसान बनाया,
ख़ास़ियत भी कोई चीज़ होती है!
इंसान बन नहीं सके ज़िंदगी में,
अस़लियत भी कोई चीज़ होती है!
हम हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई बने,
ह़क़ीक़त भी कोई चीज़ होती है!
मंदिर मस्जिद चर्च गुरुद्वारे बनाये हमने,
अक़ीदत भी कोई चीज़ होती है
तहज़ीब तमदन तरक़ी इंसान के उस़ूल,
फ़ज़ीलत भी कोई चीज़ होती है!
सुरख़ ख़ून हर किसी जिस्म में,
नस़ीह़त भी कोई चीज़ होती है !
हम ठहरे बुत्त प्रस्त बंदे ‘कागा”
वस़ीयत भी कोई चीज़ होती है!
गीदड़ की मौत
गीदड़ की मौत आती है गांव की ओर दोड़ता है,
जंगल छोड़ भागता इधर उधर गांव की ओर दोड़ता है!
आ बेल मार मुझे की त़र्ज़ पर मारा मारा फिरता,
रोता चीख़ता चिल्लाता बेचैन बिलखता गांव की ओर दोड़ता है!
अपना झुंड टोला क़बीला क़ाफ़िला से मुंह मोड़ बद-ह़वास,
भूखा प्यासा पागल बेपरवाह लाचार गांव की ओर दोड़ता है!
अपना बिस्तर बोरिया बांध अकेला अलबेला रिश्ते नाते तोड़ मरोड़,
दुम दबाकर देर नहीं लगाता गांव की ओर दोड़ता है !
शेर ख़रगोश लोमड़ी चीता से राय मशोरा नहीं ख़ुद मुख़्तार,
करता फ़ुर्त फ़ेस़ला आनन फ़ानन गांव की ओर दोड़ता है!
मौत पुकार सुन अपनी भूल जाता चाल चालाकी सब ‘कागा’
होता जुनून सवार सिर पर गांव की ओर दोड़ता है!
ह़ालात ग़रीब दिल अमीर ज़मीर ज़िंदा जिनका,
ह़ालात ह़क़ीर दिल फ़क़ीर ज़मीर मुर्दा जिनका!
माह़ोल
ह़िक़ारत की नज़र से देखते ज़हीन ज़लील,
फ़ित़रत पुर फ़ाहिश देते अजीबो ग़रीब दलील!
जेसी नज़र वेसा नज़रिया नियत जेसी मुराद,
मन्नत मांग करते मुकमल मुत़ालबा ख़्वाहिश मुराद!
होती ह़सरत ह़क़ीक़ी दिल में दबी दास्तान,
मुमकिन ग़मगीन ग़नीमत दर्द मंद दबी दास्तान!
फ़िक्र मंद बन ज़िक्र कर ज़िंदगी का,
अक़ीदत इबादत कर बाब मुत़ाला बंदगी का!
‘कागा’ मंदिर मस्जिद चर्च बारगाह रब का ,
सिर झुका कर सजदा शुक्रिया रब का !
दिल ए दास्तान
दिल बड़ा नाज़ुक टूट जाता ज़रा ज़र्ब से,
ह़र्फ़ की चोट बर्दाशत नहीं ज़रा ज़र्ब से!
दिल एक उज़्वा रहता सीने में क़ैद क़ाबू,
मचल जाता मन चला मस्त ज़रा ज़र्ब से!
हर ह़रकत हलचल पर पैनी नज़र रखता नादान,
पिघल जाता पानी की त़रह़ ज़रा ज़र्ब से!
उल्फ़त का दीवाना मस्ताना मोह़ब्त का प्यासा पागल,
उबल कर उड़ता बाफ़ बन ज़रा ज़र्ब से!
चीर कर देख लिया एक बूंद नहीं लहु,
उडेल देता आंख में अशक ज़रा ज़र्ब से!
धड़कन तेज़ होती फफक कर फ़िराक़ में ‘कागा”
उछल जाता ऊंचा आसमान तक ज़रा ज़र्ब से!
ताश के पत्ते
इंसान ताश की पत्तों की त़रह़ चार क़िस्म,
इंसान ताश की पत्तों की त़रह़ चार इस्म!
बंद बक्से में एक साथ तादाद शुमार बावन,
चार त़ब्कों में तकसीम फ़ी तेरह़ होते बावन!
इक्का दुक्की तिग्गी चौकी पंचम छह सात आठ,
नो दस राजा रानी ग़ुलाम सबका अपना ठाठ!
जान रख हथेले पर कूद पड़ते जंगे मैदान ,
ख़त़रों से खेलना फ़ित़रत रहती फ़तह़ करते मैदान!
ग़ैर जानब दार रवैया ज़ात मज़हब नस्ल नहीं,
हार जीत होती रहती कोई अस़ल नस्ल नहीं !
तितर बितर होकर बिखर जाते ग़ैरों के हाथों,
मिल जुल अपना फ़र्ज़ अदा करते पराये हाथों!
बेजान बेज़ुबान होकर अपने रिश्ते नाते बख़ूबी निभाते,
बेज़मीर बेशऊर बेईमान बेवफ़ा नहीं बनते तोड़ निभाते!
‘कागा’ शाह मात का खेल हमारा बड़ा मुश्किल,
मुआशरे में इंसान बन कर जीना बड़ा मुश्किल!
देश भक्त
सीमा पर तैनात जवान सच्चा देश भक्त सुजान,
सोया सेज पर मारे खर्राटे अंध-भक्त नादान !
किसान बोता बीज खेतों में चलाता हल हमेशा ,
उपजे धन धान खलियान खाता अंध-भक्त नादान!
बाग़बान सींचे बाग़ बग़ीचे अमृत जल धारा से,
मीठा फल फूल मेवा चखे अंध-भक्त नादान!
कामगार करता कड़ी मेह़नत धूप दुपहरी बारिश में,
ख़ून पसीने की कमाई डकारे अंध-भक्त नादान!
ग्वाला चराता गायें हरा भरा घास वन में,
दूध निकाल बेच देता मालिक अंध-भक्त नादान!
जनता भोली भाली करती अपना मुफ़्त में मतदान,
करते एश अ़शर्त रहनुमा ज़ालिम अंध-भक्त नादान!
आंखों बंधी पट्टी घूमता बेल घानी इर्द गिर्द ,
तेल निकला तिलों से ख़ुश अंध-भक्त नादान!
हींग लगे नहीं फिटकड़ी रंग रूप चंगा ‘कागा”
फूल कली आंसू बहाते भंवरे अंध-भक्त नादान!
डा. अम्बेडकर
महा पुरूष डा, भीम राव अम्बेडकर,
युग पुरूष डा, भीम राव अम्बेडकर!
चौदह अप्रेल जन्म दिवस जशन मनायें,
दिलो दिमाग़ मन चित्त प्रसन्न बनायें!
शिक्षित बनो संगठित रहो संघर्ष करो,
नारा बुलंद कर समाज जागृति करो!
अभी तो अंगड़ाई है लड़ाई बाक़ी,
चलना किया शुरू मंजिल अभी बाक़ी!
संविधान पवित्र पोथी ख़ुशियों का ख़ज़ाना,
पन्ना पल्टते पढ़ो अधिकारों का ख़ज़ाना!
विश्व विख्यात ज्ञान भंडार अनमोल धरोहर,
संरक्षण करें सुचारू पुश्तेनी प्राप्त धरोहर!
किसान कामगार जवान नारी मुक्ति दाता,
‘कागा” अम्बेडर जेसा नहीं शक्ति दाता!
एक अड़वा हूं !
अकेला खड़ा खेत में एक अड़वा हूं ,
खाता पीता कुछ नहीं एक अड़वा हूं!
करता रखवाली खेत की बिना लाग लपेट ,
रहता मुस्तेद हमेशा बेख़ोफ़ एक अड़वा हूं !
बेदर्द हमदर्द नहीं मगर डरते जीव जानवर ,
नहीं लेता पगार पैसा एक अड़वा हूं!
लहलाती फ़स़ल के बीच लोभ लालच नहीं,
मोह माया से दूर एक अड़वा हूं!
खाता हूं नहीं खाने देता खड़ा ख़ामोश,
जिस्म में जान नहीं एक अड़वा हूं!
नहीं किसी से दोस्ती नहीं दुश्मनी ‘कागा’
बेज़ुबान बेजान बेक़द्र बुत्त एक अड़वा हूं!
घड़ियाली आंसू
घड़ियाली आंसू ख़त़रा की घंटी पिघल नहीं,
खुद मत़लबी घड़ियाल की नौटंकी पिघल नहीं!
घड़ियाल आंसू बहाता अपना शिकार देख कर,
घात लगा कर गटक लेता पिघल नहीं!
समुंदर किनारे बेठा बगुला आंखें मूंद ख़ामोश!
मछली आती पास निगल देता पिघल नहीं!
बहेलिया बिछाये जाल रखे अंदर चुग्गा दाना,
फंसा डाल झोले में झटपट पिघल नहीं!
ख़ुद ग़र्ज़ ख़ातर करता इंसान छल कपट,
करता चिकनी चुपड़ी मीठी बातें पिघल नहीं!
नेकी बदी दोनों तेरे अंदर सौच ‘कागा”
फ़र्श पर बेठ अ़र्श देख पिघल नहीं!
ग़ैर जानब-दार
वालदीन होते बदनाम जब औलाद करें गुस्ताख़ी ,
ख़राब होता ख़ानदान जब औलाद करें गुस्ताख़ी!
पुश्तैनी शानो शोक्त शहोरत रोबो रुतब्बा रसूख़,
नाबूद करते नादान जब औलाद करें गुस्ताख़ी!
बाशऊर बाब पढ़ाना दुनिया की दरसगाह मेंं,
वरना होंगे बदज़ुबान जब औलाद करें गुस्ताख़ी!
अख़लाक़ एमाल उस़ूल जैसी दौलत नहीं कोई ,
बदतमीज़ बेवफ़ा बदगुमान जब औलाद करें गुस्ताख़ी!
इंस़ाफ़ की तराज़ू के दो पलड़े बराबर,
झूठ सच्च पेहचान जब औलाद करें गुस्ताख़ी!
गै़र जानब-दार ह़क़ीक़ी मैदान में ‘कागा”
ख़ुदा निगाह बान जब औलाद करें गुस्ताख़ी!
सबका मालिक एक
ऊपर वाला एक हम नीचे वाले अनेक,
हम हिंदू मुस्लिम सिख संत साधू शेख!
हम बनाते मंदिर मस्जिद गुरु द्वारा गुबंद,
वो बनाता हमें हाड मांस पुतला देख!
हम बनाते मूर्ति हथोड़ा छैनी से ठोक,
हमें रखता मां के पेट मे पैक!
जाति धर्म नहीं सबके भीतर रक्त लाल,
चाहे करो चारों ओर जांच पड़ताल चैक!
जल थल अगन गगन पवन रंग रूप,
बराबर भूख प्यास भावना काम वासना विवेक !
वो हा़ज़िर नाजिर सब पर नज़र ‘कागा”
रहता आपके अंदर रखता सबकी हरदम टेक!
दुनिया-दारी
मेंढक तराज़ू में तोलना आसान काम नहीं,
केंकड़ा एकता को तोड़ना आसान काम नहीं!
फूलों का रस निचोड़ चूसती मधु मखियां,
बना देती अमृत धारा मिल संग सखियां!
जल थल जंगल जानवर बनवासी धरोहर अमानत,
बेदख़ल कर उजाड़ देना आशियाना धरोहर ख़्यानत!
बिखरे मोती समेट कर बैंध लो सारे,
धागे में पिरोये माला बना दो सारे!
चमन में गुल खिले रंग बरंगी ख़ुशबूदार,
कांटा कोई नहीं चुनता बच निकलते जानदार!
कभी खु़शी कभी ग़म दुनिया का दस्तूर,
मुक़दर के सिकंदर किसी का नहीं क़ुस़ुर!
एक उंगुली उठाते तीन ख़ुद की ओर,
तीन गुना कमियां होती किया कभी ग़ौर!
पराई चादर मेली कुचेली अपनी स़ाफ़ बेदाग़,
ओढी काली कम्बली छिप गये सारे दाग़!
बेनस्ल करते हमेशा अस़ल खा़नदान को बदनाम,
हम डूबे स़नम आप को साथ बदनाम!
सुखी सहन नहीं भूखे को देते नहीं,
‘कागा” छल कपट कर कुछ देते नहीं!
जात पात
जात पात की बू जाती नहीं,
बन ख़ुशबू बन बदबू जाती नहीं!
समाज का ताना बाना बुना कैसा,
भेद भाव की भावना जाती नहीं!
अमीर ग़रीब पीर फ़क़ीर शाह गदा,
ऊंच नीच की दरार जाती नहीं!
फ़र्श से अ़र्श तक दूरी लम्बी,
अड़ोस पड़ोस की दूरी जाती नहीं!
दिल ज़ुबान में हड्डी नही होती,
नफ़रत उलफ़त की ख़ूबी जाती नहीं !
इंसान में इंसानियत हे़वानियत दोनों ‘कागा”
तराज़ू में बराबर तोली जती नही!
राम नवमी
राम नवमी का उत्सव उत्साह से मनायें!
जय श्री राम बोल उत्साह से मनायें!
अवध नगरी रघु कुल राजा दशरथ घर ,
कोशल्या की कोख उत्पन्न उत्साह से मनायें!
नन्हा मुन्हा प्यारा बालक सुंदर सलोना रूप,
छवि जेसे रवि चमका उत्साह से मनायें!
दशरथ की तीन रानियां कोशल्या केकेई सुमित्रा,
कोशल्या का कंवर लाल उत्साह से मनायें!
राज़ मह़ल रंग बरंगी फूलों से सजा,
घर आंगन रची रंगोली उत्साह से मनायें!
राम के तीन भाई भरत लक्ष्मण शत्रुघन,
जेष्ठ राम लल्ला रतन उत्साह से मनायें!
राम मर्यादा पुरोशोतम जैसा नहीं कोई ‘कागा”
राम नवमी पावन पर्व उत्साह से मनाये!
जय भीम
जय भीम का नारा गूंज उठा गगन में ,
नीला दुपट्टा गले में गूंज उठा गगन में!
ऊंचा नीला फ़लक नीचे झलक ज़मीन हरी भरी,
बिना लाग लपेट बेबाक बात बोलते खरी खरी!
अम्बेडकर वादी आदी संघर्ष के जान हथेली पर,
संविधान की खाते सौगंध रख जान हथेली पर!
दो अप्रेल को शहीद क़ौम के लिये क़ुर्बान,
बहुजन समाज जाग गया अब नहीं सहेगा अपमान!
कमोबेश तालीम हासिल की संगठन में आधे अधूरे,
संघर्ष में सावधानी ज़रूरी सोच में आधे अधूरे!
भीम राव अम्बेडकर नाम पर अनेक बने संगठन,
एकता के नाम पर होता आपसी विवाद विघटन!
एक झंडा डंडा फंडा एजंडा की बड़ी ज़रूरत,
ऊंचा बुलंद लक्ष्य प्रोपेगंडा नहीं ख़ाका ख़ूस़ूरत!
देश विदेश अड़ोस पड़ोस मुल्कों में अम्बेडकर महान,
वहां की जनता करती दिलो जान से बखान !
‘कागा’ आओ मिल जुल जयंती मनायें शान से,
भारत वत़न हमारा करें नाम रोशन जान से!
नेक इंसान
रिश्ता जोड़ अधर-झूल में छोड़ चले गये,
नाता तोड़ मंझ-धार में छोड़ चले गये !
प्यार स्नेह का पाठ पढ़ाया जीने का सलीक़ा,
अपनों गै़रों से मिलने जुलने का त़ौर तरीक़ा!
काच की चमक सूरज की किरन से होती,
हीरे की चमक दमक अंधेरी रात में होती !
ह़ाल चाल पूछ आंसू पूंछे आंखों से गिरते,
थाम लिया हाथों से ग़रीब लड़खड़ा जो गिरते!
रह़म दिल खोल करते मदद मिस्कीन मोह़ताज की,
सिर झुकाया नहीं साख रखी सलामत समाज की!
काजल कोटड़ी में रहते हुए कालिख नहीं लगी
कीचड़ छींटे पड़ने नहीं दिये कालिख नहीं लगी!
हथकंडा प्रोपेगंडा का बुना जाल घूस ख़ोरी का,
दाल गली नहीं चाल धरी रही नशा ख़ोरी का !
लाली पोप की लालच लाल नोटों की गड्डियां ,
दावत दिल कश शराब शबाब कबाब की हड्डियां!
डगमग डिग नहीं पाया अपना मज़बूत ज़मीर ईमान,
‘काग ‘क़द्रदान नहीं दुनिया में मिला नेक इंसान !
माह़ोल
अमनो अमान का मगहोल सिरफ़िरे बिगाड़ रहे है,
झूठी अफ़वाह़ें फेला माह़ोल सिरफ़िरे बिगाड़ रहे है!
गंगा जमुनी तहज़ीब का ताना-बाना तोड़ फोड़,
स़दियों से शादाब आबाद आशियाना उजाड़ रहे है!
कभी मज़हब जाति धर्म को ख़त़रा का ख़ोफ़,
कभी बद उनवानी बदगुमानी अरमान उखाड़ रहे है!
नफ़रत की फ़ित़रत दिल में करते फि़तना फ़स़ाद,
दंगा पंगा नंगा नाच दबंग दहाड़ रहे है!
देते भड़काऊ बयान ऊंचे आवाज़ में ऊल-जुलूल
बद ज़ुबान बद तमीज़ गला फाड़ रहे है!
अपना जोश जल्वा जुनून दिखा कराते बल्वा ‘कागा”
भाईचारा अमन चैन ख़ुशहाली को गाड़ रहे है !
बेदर्द लोग
दर्द ए दिल किसको सुनाये बेदर्द बेठे है,
दर्द ए रूह़ किसको सुनायें नामर्द बेठे है!
जुल्म ज़ोरी रिश्वत ख़ोरी जारी सरे आम,
दर्द ए ब्यां किसको करें बेदर्द बेठे है!
बेख़ोफ़ ज़ुल्म सितम करते जा़लिम सित्म गर,
दर्द ए फ़साना किसको बतायें बेदर्द बेठे है!
रहज़न रहबर बन लूट लेते माल असबाब,
दर्द ए फ़रियाद किसको करें बेदर्द बेठे हैं!
दग़ा बाज़ दग़ा करते ह़िमायत के बहाने,
दर्द ए दाग़ किसको दिखाएं बेदर्द बेठे है!
लाल लिबास लपेटे जिस्म पर हाथ तस्बीह ,
दर्द ए ख़ंजर किसको कहें बेदर्द बेठ़े है!
त़बीब नुकेले नश्तरों पर ज़हर लगाये कागा’
दर्द ए दवा किससे मंगायें बेदर्द बेठे है!
परिंडा
प्यासे परिंदों वास्ते लगा परिंडा पानी का,
मौसम गर्मा-गर्म लगा परिंडा पानी का!
लू के पड़ते थपेड़े चलती तपती हवायें ,
पक्षी तड़प रहे लगा परिंडा पानी का!
दया करते दयालू पाप करते पापी पाराधी,
दाना चुग्गा डाल लगा परिंडा पानी का!
गोरीया सिसक सुबक रही घर आंगन में,
घौंसला नहीं बिखेर लगा परिंडा पानी का!
बाग़ बग़ीचे में प्यासे बुलबुल त़ोता मीना,
तितली भंवरा चिड़िया लगा परिंडा पानी का!
कंठ सूख गये कबूतर कोयल के ‘कागा’
गिलहरी छिपकली परेशान लगा परिंडा पानी का!
वक़्त बादशाह
वक़्त बादशाह तख्त-ताज बदल देता है,
वक़्त शहनशाह बख़त-रिवाज बदल देता है !
मुग़ल गोरी गज़नवी शाह सूरी हूण चंगेज़,
ग़ुलाम बना मुल्क गै़रों का आये अंग्रेज़ !
जाति धर्म की फूट का फ़ायदा उठाया,
सोने की चिड़िया को जो आया लुटाया!
मूल निवासी बने बनवासी बाहरी धणी धोरी,
प्राचीन परम्परा तह़स़ नह़स़ बने जबरन ज़ोरी!
भेद भाव छूआ छूत का बोल बाला,
अंदर काला कलूटा हाथ में रुद्राक्ष माला !
वीर सपूत संत महंत महात्मा ऋषि मुनि,
तपस्वी तेजस्वी की बराबरी बात नहीं सुनी !
कबीर रविदास ने पढ़ाया एकता का पाठ,
महात्मा ज्योतिबा फूले ने नेकता का पाठ!
हिंदू बोध जैन सनातन संस्कृति का विभाजन,
विचार धारा विश्वास आस्था में हुआ विभाजन!
बाबा अम्बेडकर फ़िरश्ता बन कर आये महान,
अधिकार दिये बराबर सबको बनाया भारत संविधान!
‘कागा’ नैतिक मूल्यों का पतन हुआ बेशुमार,
ग़ुलामी कर ग़ैरों की चढ़ा रहा ख़ुमार!
मोबाईल
चल दूर भाष ने चाल चित्र बदल दिये ,
चल दूर भाष ने माल मित्र बदल दिये!
चरित्र पवित्र बदल दिया झूठा् मूठ बोल कर,
घड़ी का गला घौंट चल चित्र बदल दिये !
टीवी बीवी बदल दी बदल दिये रिश्ते नाते ,
छात्र छल कपट में लिप्त स्वभाव बदल दिये!
पत्र लेखन लिफ़ा़फ़ा अता पता डाक टिक्ट कार्ड,
मन में छुपा प्रेम भाव प्रभाव बदल दिये!
अपराध बढ़ गये हत्या चोरी लूट बोल बाला,
संस्कार सभ्यता का सर्व नाश इरादे बदल दिये!
खान पान हंसीं मज़ाक़ ठठोली का अंदाज़ अधूरा ,
हथाई मन की बात त़ौर त़रीक़े बदल दिये!
आया ज़माना मोबाईल का हर कोई व्यस्त ‘कागा’
बैंक खाता लेन देन दस्तूर रिवाज बदल दिये!
उल्ट फेर
उल्टी गंग धारा बहने लगी अब क्या होगा,
सूरज पूर्व दिशा डूबने लगा अब क्या होगा!
खुला कैश नार अप शकुन माना जाता था,
सुहागन खुला बाल चलने लगी अब क्या होगा!
घूंघट पट महिमा गरिमा मरियादा मटिया मैट हुई,
चूड़ेल चढ़ी पहन चलने लगी अब क्या होगा!
नंगा सिर नंगा बदन चेहरे पर दुपट्टा नहीं,
होंठ लाल मांग सूनी लगी अब क्या होगा !
भाग कर प्रेम विवाह करते युवा भविष्य तबाह़ ,
मां बाप नाक कटने लगी अब क्या होगा!
ब्याय फ़्रेंड गर्ल फ़्रे़ट का ट्रेंड का माह़ोल,
रखेल बन साथ रहने लगी अब क्या होगा!
पति व्रत धर्म पत्नि पर कलंक लगा ‘कागा’
निर्मम हरदम हत्या होने लगी अब क्या होगा!
बाज़मीर
कठपुतली बनना क़बूल नहीं मरना मंज़ूर है,
बंधुआ बनना क़बूल नहीं मरना मंज़ूर है !
इशारों पर नाचना आदत नहीं इरादा मुकमल,
बेज़ुबान बनना क़बूल नहीं मरना मंज़ूर है!
ज़मीर मेरा ज़िदा रहे हमेशा आरज़ू मेरी ,
बेशऊर बनना क़बूल नहीं मरना मंज़ूर है!
ज़मीर बेच अमीर बनना फ़ित़रत नहीं मेरी,
बेज़मीर बनना क़बूल नहीं मरना मंज़ूर है !
जी ह़ुज़ूरी कर जीना तास़ीर नहीं मेरी,
ग़ुलाम बनना क़बूल नहीं मरना मंज़ूर है!
ख़ुद मुख़्त्यार रोब रुतब्बा बुलंद ह़ोस़ला मेरा,
चापलुस बनना क़बूल नहीं मरना मंज़ूर है!
ख़ुद मत़लब के ख़ात़िर करते त़ोत़ा चश्मी,
चुग़ल बनना क़बूल नहीं मरना मंज़ूर है!
चाट चाशनी पाव भाजी पुलाव बरियानी वास्त़े,
चाटुकार बनना क़बूल नहीं मरना मंज़ूर है!
ईमान पर आंच नहीं आने दूंगा ‘कागा”
बिकाऊ बनना क़बूल नहीं मरना मंज़ूर है!
बेबस बंदा
बंदा कितना बेबस गिर जाता क़दमों पर,
तक़लीफ़ बर्दाशत नहीं गिर जाता क़दमो पर!
निगाहें गड़ा बेठा गिद्ध जैसी मन मैला,
मुफ़्त माल भरोसे गिर जाता क़दमों पर!
मेहनत मशक्कत करता नहीं मन्नत मांगता फिरता,
रगड़ अपना सिर गिर जाता क़दमों पर!
कांटा चुभने पर कराहता लड़खड़ा कर चलता
कुचले फूल चुनता गिर जाता क़दमों पर!
तपती दुपहरी धूप से परेशान ढूंढता छाया,
पसीना तर-बतर गिर जाता क़दमों पर!
चुनौती का सामना बस की बात नहीं ,
चापलुस चुग़ल चाटुकार गिर जाता क़दमों पर ,
अंध-विश्वास पाखंड आडम्बर पौंगा पंथी परम्परा,
अंध भगत भटक गिर जाता क़दमों पर!
जंगल से निकल चुंगल में फंसा ‘कागा”
करता अपना बखान गिर जाता क़दमों पर!
तफ़ावत
कमियां हर इंसान में होती है,
ख़ामियां हर जान में होती है!
दुधा का धुला कोई नहीं होता ,
ख़ुशियां हर शान में होती है!
गंगा जल मे़ नहायें करते पाप,
मस्तियां हर स्नान में होती है!
अमीर ग़रीब अपना नस़ीब मुक़दर,
हस्तियां हर जहान में होती है!
दिल की दूरियां नहीं कर कुशादी,
खिड़कियां हर मकान में होती है!
नफ़रत के नाग फन फेला घूमते,
ग़ल्तियां हर महान में होती है!
ज़हर नहीं घोल मीठा बोल ‘कागा”
सख़्तियां हर ज़ुबान में होती है!
अवतार
जब जब हूआ अत्याचार तब हुआ अवतार,
जब जब हुआ व्यभिचार तब हुआ अवतार!
प्राचीन ग्रंथों में आते प्रसंग अनोखे अनंत,
जब जब हुआ अंधकार तब हुआ अवतार!
चौबीस अवतार का वर्णन है जग ज़ाहिर,
जब जब हुआ हाहाकार तब हुआ अवतार!
विशेष व्यक्ति एक को बचाने आया भगवान,
जब जब हुआ तकरार तब हुआ अवतार!
क्रांति आई रक्त पात की चली नदियां,
जब जब हुआ संहार तब हुआ अवतार!
अछूत की पीड़ा किसी ने नहीं सुनी,
जब जब हुआ ललकार तब हुआ अवतार!
अम्बेडकर अवतार नही मगर रुतब्बा बुलंद ‘कागा”
जब जब हुआ अनाचार तब हुआ अवतार!
राजा-प्रजा
राजा रंग मह़ल में प्रजा पग डंडी पर,
किसान खेत खलियान में फ़स़ल धान मंडी पर,
राजा रईयत का रखवाला दुख सुख में दास,
आंच नहीं प्रजा पर परम प्रबल आत्म विश्वास!
राजा खाये काजू किशमिश बादाम अखरोट पिस्ता अंजीर,
प्रजा खाती मूंग फ़ली गुड़ डली ज़िंदा ज़मीर !
राजा खाये ह़ल्वा परांठा शुद्ध घी मखन मावा,
प्रजा रूखी सूखी बासी रोटी दाल चावल दावा!
राजा खाता सोना चांदी की चमकीली थाली में,
किसान मज़दूर कामगार मिट्टी की परात कंगाली में!
राजा रेश्मी मलमल मख़मली लिबास में रहे मलबोस,
ग़रीब गुज़ारे जीवन पैवंद लगे पेहरन मन मदहोश !
राजा सवारी हवाई जहाज महंगी मोटर कार में ,
प्रजा चलती पैदल थकी मांदी बेह़द बेकार में!
राजा को ख़ुमारी राज सत्ता की ग़रीब ग़मगीन,
जनता जनार्दन की जान जोखम में मोहताज मिस्कीन!
शराब कबाब शबाब राजा का शौक़ शानो शोक्त,
ग़रीब के पास ग़ैरत का ख़ज़ाना शानो शहोरत!
‘कागा’ नहीं बन कायर कमज़ोर आते उतार चढ़ाव,
लगाते रहना मरहम मोह़ब्त का मिट जायेंगे घाव!
भुलकड़
मानव बड़ा भुलकड़ भूल जाता हर बात!
मानव बड़ा घुमकड़ भूल जाता हर बात!
नई बात नो तेरह दिन याद रहती,
बिसर जाती चाहे अहम हो हर बात!
याद दिलाई जाती हर मोड़ पर क़स्में,
रस्में चंवरी सात फेरों की हर बात !
हनुमान अपनी शक्ति भूल गया था,
पहाड़ उठाया अपने हाथों संजीवनी हर बात!
सितम ज़ुल्म चंद रोज़ याद रहते ताज़ा,
वक़्त का तकाज़ा नहीं याद हर बात !
शावक भूल जाता वजूद भेड़ों के संग,
रंग रूप ढंग उमंग अस़लियत हर बात!
सोया समाज जगाओ गहरी नींद से ‘कागा”
अनुभव कराओ अपने अधिकार सहित हर बात!
सेवा भाव
समाज की स़ूरत बदल जन सेवक बन कर,
समाज की मूर्त बदल नैन पलक बन कर!
बरस बीत चुके लाखों सोया पड़ा नींद में,
समाज की शक्ल बदल एक झलक बन कर!
मानव जात महान ओर कोई प्राणी तोड़ नहीं,
समाज की अ़क़ल बदल जरा छलक बन कर !
नई प्रभात गई रात जाग गये जीव जंतु,
समाज की करवट बदल एक ढोलक बन कर!
जागा समाज चल पड़ा अपने लक्ष्य की ओर,
समाज की अंगड़ाई बदल चुस्त चालक बन कर!
कमान थाम अपने हाथों में बग़लें नहीं झांक,
समाज की गति बदल महान मालिक बन कर!
बुराई करने का लाभ नहीं बराबरी करना सीख,
समाज का सपना बदल ऊंचा फ़लक बन कर!
नया रक्त का संचार कर युवा वर्ग में,
समाज का संस्कार बदल ललाट तिलक बन कर!
राजनीति रंग रंगीन संगीन रूप स्वरूप कठिन ‘कागा”
समाज का इरादा बदल अपना मुल्क बन कर!
खु़दार
ख़बरदार ख़ुदार बन ग़दार नहीं,
ख़बरदार दमदार बन ग़दार नहीं!
ख़ामोश खड़े हो मायूस उदास,
ख़बरदार जानदार बन ग़दार नहीं!
दोगले बन करते हो दलाली,
ख़बरदार शानदार बन ग़दार नहीं!
अपना ज़मीर बेचना बड़ा गुनाह ,
ख़बरदार ईमानदार बन ग़दार नहीं!
अरमान ईमान क़ायम दायम रख,
ख़बरदार बुरदबार बन ग़दार नहीं!
बुलंद इरादा नेक तमना रख,
ख़बरदार आबदार बन ग़दार नहीं!
मुखबर बन बेईमानी नहीं करना!
ख़बरदार ह़क़दार बन ग़दार नहीं!
चमक दमक खनक रौनक ख़राब,
ख़बरदार वफ़ादार बन ग़दार नहीं!
ईंट का जवाब पत्थर से,
ख़बरदार अस़रदार बन ग़दार नहीं!
गुमराह नहीं होना बरग़लाने पर,
ख़बरदार दीदार बन ग़दार नहीं!
हथकंडे हज़ार आज़मा लेगा दुश्मन,
ख़बरदार सरदार बन ग़दार नहीं!
क़ौम की क़द्र कर ‘कागा”
ख़बरदार दिलदार बन ग़दार नहीं!
पूत सपूत
पूत सपूत तो क्यों धन संचित,
पूत कपूत तो क्यों धन संचित!
पूत सपूत होगा भर देगा भंडार ,
पूत कपूत ख़ाली कर देगा भंडार!
पूत सपूत के पग पालने में,
परखे जाते सोते हुए पालने में!
सपूत की उड़ान फ़र्श से अ़र्श,
मधुर वचन वाणी करे हृदय स्पर्श!
मन बुद्धि चित्त चरित्र पवित्र पावन,
चाल चेहरा चित्र मित्र स्वतंत्र पावन!
कुल कूटम्ब का नाम रोशन करता,
सपूत सरल स्वभाव दिल प्रसन्न करता!
पूत सपूत कपूत प्रकृति की माया,
रंग उमंग ढंग गोरी काली काया!
भिन्न भाव भावना रूप रस गंध,
शब्द स्पर्श तेज धीमी बुद्धि मंद!
खेत एक फ़स़ल अनेक खट्टा मीठा,
मोटा पतला तरल सरल खट्टा मीठा!
‘कागा’ कर्तव्य पालन कर नैन खोल,
अंध भगत भटके सदेव सत्य बोल!
पेट पापी
पेट पापी का सवाल रोटी जीवन सहारा,
बिना रोटी जीवन जंजाल रोटी जीवन सहारा!
पेट नहीं होता पाप नहीं होता कभी,
नहीं होता कोई बवाल रोटी जीवन सहारा!
दो जून की रोटी नून की मिलावट,
साग सब्ज़ी पतली दाल रोटी जीवन सहारा!
ग़रीबा में गीला आटा भूखे बच्चे बिलबिलाते,
नींद नहीं आती निढाल रोटी जीवन सहारा!
कुपोषण से दुबले पतले काले कलूटे कुबड़े,
भीख मांग खाते मलाल रोटी जीवन सहारा!
कचरा बीन ढूंतते रूखी सूखी बासी जूठन,
नंगा बदन ह़ाल बेह़ाल रोटी जीवन सहारा!
झुग्गी झौंपड़ी छपरा बसेरा रेत पर बिछोना,
घुमक्कड़ चलती फिरती चाल रोटी जीवन सहारा!
शिक्षा से कोसों दूर भिक्षा पर गुज़ारा,
क़द काठी ह़ालत कंगाल रोटी जीवन सहारा!
हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई सब भाई ‘कागा”
हम गूदड़ी के लाल रोटी जीवन सहारा!
सरल सोच
खोने को कुछ नहीं ख़ाली हाथ जाना है,
नंगे बंद मुठ्ठी आये ख़ाली हाथ जाना है!
ऊंधे मुंह लटके रहे मां के गर्भ में ,
रोते आये बाहर भूखे ख़ाली हाथ जाना है !
मिली एक ब्लाश्त लंगोटी जाते दो गज़ कफ़न,
कमाई रह जायेगी इधर ख़ाली हाथ जाना है!
लड़कपन खेल कूद मनो-रंजन मोज में खोया ,
जवानी जोश जुनून में ख़ाली हाथ जाना है!
मां बाप बीवी बच्चे बहिन भाई मत़लबी रिश्ते,
अकेले आये अकेला जाना ख़ाली हाथ जाना है!
नेकी कर बंदा जहान में बदी बुराई छोड़,
कीर्ति चलेगी तेरे साथ ख़ाली हाथ जाना है!
बड़े बेरह़म अपने घर से बेदख़ल करते ‘कागा”
जलाते दफ़न करते अपने ख़ाली हाथ जाना है!
जन-सेवक
सेवा कर समाज की जन सेवक बन कर,
मदद कर मिस्कीन की मदद-गार बन कर!
पैर फूटी नहीं बिवाई क्या जाने पीड़ा पराई,
इज़्ज़त कर अपनों की इज़्ज़त -दार बन कर!
समय साया बदलता रहता कभी पूर्व कभी पश्चिम,
क़द्र कर कमज़ोर की आब-दार बन कर !
उतार चढ़ाव आते ज़िंदगी के हर मोड़ पर,
दया कर दर्दमंद की ख़ुद ख़ुदार बन कर!
बांझ क्या जाने प्रसव पीड़ा क्या होती है,
बेसहारा पर रह़म कर रह़म -दिल बन कर !
अपनों के गीत हर कोई गाता हरदम ‘कागा”
गैरों पर ग़ौर कर ताह़्यात यादगार बन कर!
माता-पिता
कर मां बाप का अभिनंदन कोई तोड़ नहीं,
कर माता पिता का वंदन कोई जोड़ नहीं !
जन्म दिया पाल पोष बड़ा किया जग में,
बहिन भाई का रिश्ता बंधन कोई तोड़ नहीं!
मां ने सीने से लगा अपना दूध पिलाया ,
खिलाया तरल सरल भरपूर भोजन कोई तोड़ नहीं!
बुरी नज़र बचाव का टोटका काला टीका लगाया,
चेहरे पर लेप लाल चंदन कोई तोड़ नहीं!
आंचल में ढा़ंप छुपाया डायन के डर से ,
पालने में सुलाया नैन नंदन कोई तोड़ नहीं!
स्वंय सोई गीले बिछोनै संतान को सूखे पर ,
चाह से देती चुपके चुम्बन कोई तोड़ नहीं!
लोरी सुनाती लाड़ लड़ाती सारी रात जाग कर,
गीत गाती गुन-गुनाती गुंजन कोई तोड़ नहीं!
पिता का प्यार उंगली पकड़ चलना सिखाया गिरते,
लड़खड़ा जाते कांप कर चरन कोई तोड़ नहीं!
मां बाप के सपने सलोने सगाई शादी ‘कागा”
बहु आये घर लक्ष्मी आंगन कोई तोड़ नहीं!
प्रकृति
प्रकृति पुरूष का ताल-मेल प्राचीन परम्परा,
परस्पर पूरक का ताल-मेल प्राचीन परम्परा!
नर नारी की जुगल जोड़ी अभिन्न अंग ,
रज वीर्य का ताल-मेल प्राचीन परम्परा!
सूरज उगता होता सवेरा उजाला दिन में,
सूर्य प्रकाश का ताल-मेल प्राचीन परम्परा!
रात होती धुप अंधेरा करते प्राणी विश्राम,
चांद चांदनी का ताल-मेल प्राचीन परम्परा!
पत्थर आपस में टकराते उत्पन्न होती आग,
पाषण अग्नि का ताल-मेल प्राचीन परम्परा!
दूध दही मक्खन खोया पनीर की उत्पति,
दूध घी का ताल-मेल प्राचीन परम्परा!
वनस्पति से मिलते फूल फल रस निचोड़,
स्वाद सुगंध का ताल-मेल प्राचीन परम्परा!
मृग नाभि कस्तूरी ढूंढे घास सूंघ कर,
हिरन कस्तूरी ताल-मेल प्राचीन परम्परा!
पांच तत्व का पुतला कंचन काया ‘कागा’
आत्मा परमात्म का ताल-मेल प्राचीन परम्परा!
आज़ाद भारत
जय भीम जय जवान जय किसान,
जय भीम यजय विज्ञान जय संविधान !
पंद्रह अगस्त सैतालीस को भारत आज़ाद ,
छब्बीस जनवरी पच्चास को बना संविधान!
धर्म निरपेक्ष जाति वर्ग भेद नहीं,
सबको बराबर अधिकार जय भारत महान!
अगड़ा पिछड़ा वंचित शोषित स्वर्ण समान,
अपमान नहीं सबको मिला आदर सम्मान!
मत अधिकार मिला खुले शिक्षा द्वार,
ऊंचा तिरंगा जय अशोक स्तम्भ निशान!
गंगा यमुना सरस्वती संगम शुभ संकेत ,
भाई चारा बुलंद हिंदू सिख मुस्लमान!
धर्म मज़हब हीन भावना सब ग़ायब,
मंदिर में बजा घंटा मस्जिद अ़ज़ान!
होली दिवाली मिल कर मनाते ‘कागा”
बारहा वफ़ात ईद मुबारक माहे रमज़ान!
जीवन डोर
कठपुतली की डोर बाज़ीगर के हाथ में,
बंदरिया की डोर बाज़ीगर के हाथ में!
नाच नहीं जाने आंगन टेढ़ा एक बहाना,
जीवन की डोर कारीगर के हाथ में !
हाड मांस का मंदिर बनाया मालिक ने,
सांसों की डोर मालिक के हाथ में !
राधा केसे नाचे बिना नो मन तेल ,
गोपियों की डोर गोपाल के हाथ में!
रास लीला रचाए नट खट नचाये गोपियां,
प्रेम की डोर कनिहा के हाथ में!
मुरलीया की धुन सुन सुरीली राधा ‘कागा”
आत्मा की डोर ईश्वर के हाथ में!
चेहरा
अब आया अस़़ली चेहरा सबके सामने ,
हट गया नक़ाब चेहरा सबके सामने!
ढका था घूंघट में काला कलूटा ,
पलट गया पल्लु चेहरा सबके सामने!
छुपा रखा था छल कपट कर,
हट गया ह़िजाब चेहरा सबके सामने!
पेहरा लगा रखा था चारों ओर,
उठ गया पर्दा चेहरा सबके सामने!
मुंह पर मुखोटा चेहरे पर चेहरा,
मुखोटा उतर गया चेहरा सबके सामने,
बहुरुपिये का कमाल अगड़ा पिछड़ा ‘कागा”
दरक गया दुपट्टा चेहरा सबके सामने!
ख़त़रा
ख़त़रा मंडरा रहा सिर पर गाज गिरने वाली ,
सत्ता में शक्ति सिर पर गाज गिरने वाली!
जीव जंतु पक्षियों का कोई धर्म मज़हब नहीं,
मंदिर मस्जिद पर बेठ जाते धर्म मज़हब नहीं !
रहते सदा झुंड में बड़े प्रेम भाव से,
नहीं कोई बेर भावना संग प्रेम भाव से!
पीते पानी तालाब में एक साथ मिल जुल,
चरते सूखा हरा चारा घास साथ मिल जुल !
मधु मक्खी चूसती रस फूल फुलवारी में मधुर,
बनाती राम बाण रसायन मोल महंगा मीठा मधुर!
जात पात ऊंच नीच छूआ छूत भेद भाव,
झगड़ा रगड़ा लफड़ा नहीं सादा सुंदर सहज स्वभाव!
सगाई शादी रस्म कान नहीं दस्तूर दुल्हा दुल्हन,
दहेज से कोसों दूर त़लाक़ नहीं दुल्हा दुल्हन !
भूत प्रेत पिशाच डाकनी शाकनी डायन अंध-विश्वास,
ओसर मोसर मृत्यू भोज नहीं करते अंध-विश्वास
स्वर्ग नर्क सुख दुख का नहीं भय लापरवाह ,
जीवन मरण की चिंता नहीं रहते सफल लापरवाह !
मानव प्राणी से निक्ट का रिश्ता नाता निभाते,
करते मनो-रंजन मोज मस्ती रिश्ता नाता निभाते!
‘कागा” कोयल कबूतर तीतर बटेर त़ोत़ा मीना,
रहते संग उमंग दबंग अपंग तान अपना सीना!
मांसाहार
मानव अनाज भोजन पेय पदार्थ पानी,
मांसाहार मदिरा नहीं पेय पदार्थ पानी!
प्रकृति ने परोसा वन उपवन खेत,
फल फूल अन्न पेय पदार्थ पानी!
बारिश होती बरस बूंदें बादल बन,
गूंजा गाज गर्जन पेय पदार्थ पानी!
शाक आहार प्रत्येक पग पर उपलब्ध,
विभिन्न प्रकार भोजन पेय पदार्थ पानी!
राम लक्ष्मण सीता बनवास बिताया जीवन,
खाये बासी वंयजन पेय पदार्थ पानी!
पांडवों ने अज्ञात-वास में गुज़ारा
नहीं खाया हिरन पेय पदार्थ पानी!
महाराण प्रताप ने घास रोटी खाई,
मांस नहीं सेवन पेय पदार्थ पानी!
ऋषि मुनि तपस्वी पहाड़ कंद्रा में,
भूखे पिया पवन पेय पदार्थ पानी!
महावीर ने अहिंसा का पाठ पढ़ाया,
मुंह पट्टी बंधन पेय पदार्थ पानी!
जल थल अगन गगन पवन ‘कागा”
बनी काया कंचन पेय पदार्थ पानी!
सरदार भगतसिंह
सरदार भगतसिंह एक महान क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी थे,
जनता जनार्दन का दुलारा क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी थे!
आठाईस सितम्बर उन्नीस सौ सात का जन्म हुआ,
पिता किशनसिंह माता विधावती क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी थे!
गांव लायलपुर वर्तमान पंजाब पाकिस्तान किसान सम्पन्न परिवार,
शिक्षा लाहोर से अर्जित क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी थे!
सन् उन्नीस सौ छब्बीस में किया संगठन खड़ा,
नौजवान भारत महा सभा क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी थे!
भारत आज़ादी का मुख्य उदेश्य जोश जुनून था,
जल्वा जज़्बात ख़ुमार खूंख़ार क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी थे!
राजनीति में सक्रिय योगदान हलचल गतिविधियों में अगूवा,
अग्रिम पंक्ति में पहलवान क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी थे !
उन्नीस सौ अठाईस में जान पी सैंडर्स क़तल ,
सहायक पुलिस अधीक्षक का क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी थे!
उन्नीस सौ उन्नतीस में बम विस्फोट किया धमाका,
दिल्ली केंद्रीय विधानसभा में क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी थे!
परम मित्र राजगुरू सुखदेव सहयोगी सुंदर सिपाह सालार,
दोनों को मौत सज़ा क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी थे!
भगतसिंह पर मुक़दमा चला मुक़र्र सूली की सज़ा!
फांसी का फंदा चूमा क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी थे!
लाहोर जैल में जलाद ने खींची डोरी डरते,
गूंज उठा आसमान नारा क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी थे!
तैईस मार्च उन्नीस सौ इक्कतीस को अलविदा ‘कागा”
शहादत बनी संग्राम दिशा क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी थे!
जल जीवन
जल है तो कल जल है तो जीवन ,
जीवन है तो कल जल है तो जीवन!
जीव जंतु कोशिका पशु पक्षी पैड़ पौधे इंसान,
जल बूंद की उत्पति जल है तो जीवन!
जल थल नभ अग्नि वायु ब्रह्मांड प्रकृति देन,
बिना जल सूना जहान जल है तो जीवन!
चौरासी लाख योनियों में दुर्लभ मानव योनि महान ,
मन बुद्धि चित्त आत्मा जल है तो जीवन!
जल मिलता पाताल को खोद खोज ख़बर कर,
आकाश से बरसे बादल जल है तो जीवन!
जय जवान जय किसान जय विज्ञान नारा कागा”
बिना जल प्राणी परेशान जल है तो जीवन!
मालिक
हम तेरे बंदे मालिक महर कर,
हम तेरे बंदे मालिक लहर कर!
तेरे बिना ह़ुकम पत्ता नहीं हिलता,
तुम ह़ाज़िर नाज़िर मालिक महर कर !
अशरफ़ अल मख़लूक़ात तेरे भरोसे मह़बूब,
तेरी रज़ा रह़म मालिक महर कर!
चींटी से हाथी चिड़िया से अजगर,
ख़्याल ख़ेर ख़बर मालिक महर कर !
तेरी रहमत में बरकत स़ुबह शाम,
हर लम्ह़ा घड़ी मालिक महर कर!
दामन पर दाग़ नहीं लगे मेरे,
ह़िफ़ाज़त करना हरदम मालिक महर कर !
ह़लाल का रिज़्ज़क़ अ़त़ा कर ‘कागा”
ह़राम से परह़ेज़ मालिक महर कर!
अस़लियत
अस़ली कौन आज फ़ेस़ला हो जाये,
नक़ली कौन आज फ़ेस़ला हो जाये!
तन उजला मन मेला चेहरा चमकदार,
चीर कर बताओ फ़ेस़ला हो जाये!
हंस बदन स़ाफ़ सफ़ेद चुगता मोती,
बेठ सागर किनारे फ़ेस़ला हो जाये !
बगुला शांत स्वाभाव दृष्टि मछियों पर,
आंख झपक झपटे फ़ेस़ला हो जाये!
भेष भगवा धारी आत्मा काली कसाई,
भाव भावना भृष्ट फ़ेस़ला हो जाये!
नाम नारंगी अंदर बाहर रंग रंगीली,
भीतर टुकड़े अनेक फ़ेस़ला हो जाये!
अंदर लाल गुलाल बाहर काला ‘कागा”
पितर बन आता फ़ेस़ला हो जाये !
अनाड़ी
धर्म की बात अनाड़ी क्या जाने,
कर्म की बात अनाड़ी क्या जाने!
वैद पुरान उपनिषद को पढ़ा नहीं,
मर्म की बात अनाड़ी क्या जाने!
पसीना बहाया नहीं खेत खलियान में,
श्रम की बात अनाड़ी क्या जाने!
दबा रहा दादर मिट्टी में गहरा,
गर्म की बात अनाड़ी क्या जाने!
पहाड़ोंं की चट्टानों पर बिताया जीवन,
नर्म की बात अनाड़ी कन्या जाने!
मानव हाड़ मांस का पुतला ‘कागा”
चर्म की बात अनाड़ी क्या जाने!
लालच
मोह माया लालच बुरी बला होती है ,
कंचन काया लालच बुरी बला होती है!
बहेलिया जाल बिछाता मुठ्ठी भर दाना डाल,
फंसते परिंदे भूख बुरी बला होती है!
सरोवर पर करते कलोल पंछी पानी पर,
पाराधी पकड़ते प्यास बुरी बला होती है!
रण का मैदान दिखता पानी का पोखर,
हिरण की हूक बुरी बला होती है!
दो दिल रोते मिलन वास्ते ज़ार ज़ार,
प्यार की उमंग बुरी बला होती है!
काम वासना की आग भभक जाये ‘कागा”
रूह रोता भावना बुरी बला होती है!
दोबारा
छोड़ चला रिश्ता आता नहीं दोबारा,
तोड़ चला नाता आता नहीं दोबारा!
सम्भल कर चल दुनिया दल दल ,
पल गुज़र जाता आता नहीं दोबारा!
तरकश में तीर गिन कर रख,
निकल कमान जाता आता नहीं दोबारा!
बत्तीसी में बंद ज़हर अमृत ज़ुबान ,
निकल बोल जाता आता नहीं दोबारा!
दिल रोता आंसू टपकते आंखों में,
नीचे गिर जाता आता नहीं दोबारा!
इंसान इज़्ज़त आबरू का मोहताज ‘कागा”
नज़र गिर जाता आता नहीं दोबारा!
सिद्धार्थ
नव संवत्सर पर हार्दिक बधाई शुभ-कामनाऐं ,
नव संवत्सर पर हार्दिक बधाई नेक-तमनाऐं!
सनातन धर्म का नूतन वर्ष विक्रम संवत,
चैत्र मास शुक्ल पक्ष प्रतिपदा अमावस्या अंत!
फाल्गुन की फुलवारी फीकी सुगंध पड़ी धीमी,
दिन तपती दुपहरी धूप तेज शीत धीमी!
धरती धोरां की बाळू मरूधर देश मेरा,
जाळ में पीलू पके लाल पीला घनेरा!
खेजड़ी सांगरी केरिया परोसे पंचकुटा की पेहचान,
मींढक मुस्कायें टर्र टर्र अपनी सुरीली तान
मोर मचाये शोर नाचे सुन धुन सारंग,
पपिहा बोले पिया जिया जलाये धुन सारंग!
कोयल की कूक मधुर मन मोहनी भावन,
लू के थपेड़े बाजे ऊनहालो परम पावन!
आंधी त़ूफ़ान की भरमार आभे बरसे अंगार,
बेसाख बाल गोपाल बिलखे गोरी भूली श्रृंगार!
जेष्ठ महीना बदली छाई काली काजल रेख,
हाळी मन हिरखे आकाश बिजली चमकती देख!
‘कागा’ हाळी परब आखा-तीज मन भाये,
नर नारी का तन हिंवड़ा हिलोरा खाये !
दान दाता
दान के दल दल में फंस गये हम,
वरदान के छल बल में फंस गये हम!
मुफ़्त ख़ोर हो गया इंसान मेह़नत से परहेज़,
अनुदान के चल अचल में फंस गये हम!
कुपोषण का शिकार जच्चा बच्चा नन्हा मुन्हा नोनहाल,
रक्त-दान अस़ल नस्ल में फंस गये हम!
ज़ात धर्म से नफ़रत अदावत लहु से नहीं,
जीवन दान हल चल में फंस गये हम!
प्रजा तंत्र में मत दाता महान किसान जवान,
मत दान उछल मचल में फंस गये हम!
अन्नदाता का क़द्र दान नहीं कोई उगाता अन्न,
अन्न दान अगल बग़ल में फंस गये हम!
बिना लग़ाम घोड़ी की सवारी ख़त़रा जान ‘कागा”
संविधान की उथल पुथल में फंस गये हम!
नक़ल
आज कल नक़ल का ज़माना,
चला गया अ़क़ल का ज़माना!
दूध दही घी मखन मिलावटी,
पनीर मावा खोया मिठाई मिलावटी!
मिर्च मसाला धनिया हल्दी नमक,
सोना चांदी की फीकी चमक!
नर मादा अपना पराया नक़ली,
हंसी ख़ुशी सगाई शादी नक़ली
लुटेरी दुल्हनों का बोल बाला,
दुल्हा बेचारा बिकता भोला भाला!
नोट वोट में खोट ख़राबी,
भेष बदल भगत निकले शराबी!
पेपर लीक होते हर बार,
नक़ल होता प्रशन पत्र बेशुमार!
फल फूल साग सब़्जी सजावट,
जड़ी बूटी ओषधी ज़हर बनावट!
‘कागा’ सत्ता में साला बनते,
बिना मत़लब जीजा नहीं बनते!
बहिन-भाई
बहिन भाई का प्रेम रक्त का रिश्ता नाता,
मां की ममता पिता की क्षमता रिश्ता नाता!
एक कोख से उत्पन्न पिया दूध माता का ,
आंचल का सुंदर सहारा सुगम सुलभ रिश्ता नाता !
दोनों सुत संतान समता समान एक गर्भ गौद,
आपस में नहीं कोई गुमान जान रिश्ता नाता!
भाई करता एक कुल का कल्याण अपनी पीढ़ी,
बहिन करती दो कुल का सम्मान रिश्ता नाता !
बहिन ननंद बन जाती अपनी भाभी की लाडली,
सास की बहु बींदनी निभाती लुभाती रिश्ता नाता!
मां सुनाती लोरी पिलाती घुटी अमृत धारा ‘कागा”
दूध छठ्ठी तक गाढ़ा काढ़ा पावन रिश्ता नाता!
नया दौर
वो बग़ावत के बीज बो रहे है,
वो अदावत के बीज बो रहे है!
स़दियों से गुज़री ज़िंदगी एक साथ,
जाग उठ अब दोबारा सो रहे हैं!
गंगा यमुना की तहज़ीब बेह़द भाई-चारा,
एक झटके में तबाह़ खो रहे है !
ज़मीन ख़ून उगल रही सुरख़ बन सेलाब ,
बिछी लाशों का ढेर ढो रहे है!
फ़िरक़ा प्रस्त हड़कंप मचाते फ़ितना फ़स़ाद कर,
हाय तोबा कर चीख़ रो रहे है!
अमनो अमान का मिस़ाल वत़न हमारा ‘कागा”
टूटे सपने मूंगेरी लाल डुबो रहे है!
समय का चक्र
मुग़ल चुग़ल वो कहां चले गये,
अंग्रेज़ चंगेज़ वो कहां चले गये!
मुल्क पर करते थे ह़ुकूमत हुज़ूर,
गौरी गोरे वो कहां चले गये!
डंका बजता था जहान में ज़ोरदार,
शाह शहनशाह वो कहां चले गये!
समय का चक्र चलता रुकता नहीं,
रथ पालकी वो कहां चले गये!
राज पाठ ठाठ शानो शोक्त बुलंद,
रोब रुतब्बा वो कहां चले गये!
क़िला कोट गुंबज़ मह़ल गढ़ आलीशान,
दास दासी वो कहां चले गये!
रावण कंस कौर्व महा बली राजा,
सु्ग्रीव विभीषण वो कहां चले गये!
हम फ़ख़्र करते पुरखों पर ‘कागा”
बाप दादा वो कहां चले गये!
दोहरा चरित्र
गुड़ गटक जाते गुलगुलों से परहेज़,
पानी पी लेते बुलबुलों से परहे़ज़!
पगड़ी पटक देते पावों पर वोटों वास्त़े,
रसगुलों से नहीं साथ खाना परहेज़!
होंठों से होंठ मिला चूमते चूसते,
हम बिस्तर होते जाति से गुरेज़ !
घूस ख़ोर खाते भरते पेट अपना,
नोट चाहिये भर रखते तिजोड़ी सहेज!
समाज सुधार पर भाषण देते जोशीला,
संबधियों से मांगते ढेर सारा दहेज!
मांस मदिरा का करते सेवन ‘कागा”
कबाब शबाब के शोक़िन होता हेज!
बनावटी
दोस्त नहीं दुश्मन हैं होशियार हो जाओ,
रहबर नहीं रहज़न है ख़बरदार हो जाओ!
वेश बदल आया है बगुला भगत बनकर,
हाथ में माला बग़ल खंजर भगत बनकर!
भोली भाली भैड़ों के झुंड में भेड़िया,
ओढ़ खाल भेड़ की घुसा छुप भेड़िया!
नीयत नेक नहीं करता रहा अपना शिकार,
भेडें अपनी चाल चलती होती रही शिकार
ढोंग पाखंड अंध-विश्वास का बोल बाला,
प्रवचन अगले जन्म का प्रलोभन बोल बाला!
स्वर्ग नर्क सुख सम्पति संतान का झांसा ,
धन एंठते भावनायें भड़का कर झूठा झांसा!
‘कागा’ कर सोच विचार दुनिया रंग बरंगी,
सब मत़लब के यार कोई नहीं संगी !
छूआछूत
छूआ-छूत नहीं छोड़ रही पीछा अछूतों का,
भेद-भव नहीं छोड़ रहा पीछा अछूतों का!
छाया बन चलती साथ आगे पीछे अगल बग़ल,
ऊंच नीच नहीं छोड़ रही पीछा अछूतों का!
चार युग बीते चौबीस अवतार हुए प्रकट भगवान,
मन मुटाव नहीं छोड़ रहा पीछा अछूतों का!
कमर में बंधा झाड़ू गर्दन में लटकती हांडी,
विश्वास घात नहीं छोड़ रहा पीछा अछूतों का!
स्तन ढकने की छूट नहीं नंगा अंग तन,
बेबसी बलात्कार नहीं छोड़ रहा पीछा अछूतों का!
दासी प्रथा प्रचलन प्रचूर मात्रा भोग विलास,
वैमनस्य व्यभिचार नहीं छोड़ रहा पीछा अछूतों का!
शिक्षा दीक्षा रक्षा से कोसों दूर भाग्य भरोसे,
विधि विधान नहीं छोड़ रहा पीछा अछूतों का!
लोक तंत्र की छत्र छाया में अवतार अम्बेडकर,
रूढ़ी रिवाज नहीं छोड़ रहा पीछा अछूतों का!
भीम राव ने मौलिक अधिकार दिलाये संविधान में,
मलिन मानसिकिता नहीं छोड़ रही पीछा अछूतों का!
वोट नोट खोट वासना से छूआ छूत छूट ,
ईर्ष्या आग नहीं छोड़ रही पीछा अछूतों का!
पानी की मटकी खाने का बर्तन छूना वर्जित,
बराबरी करना नहीं छोड़ रहा पीछा अछूतों का!
मूंछ बड़ी रखना गवारा नहीं ताव देता तक़लीफ़,
बाल काटना नहीं छोड़ रहा पीछा अछूतों का!
बारात बिंदोली घोड़ी पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध ,
हीन भावना नहीं छोड़ रही पीछा अछूतों का!
आजा़दी के बाद काला कलंक मिटाओ मिल ‘कागा”
अगड़ा पिछड़ा नहीं छोड़ रहा पीछा अछूतों का !
बेगाने
तेरी मह़फ़िल में हम बेगाने हो गये,
तेरी मजलिस में हम बेगाने हो गये!
बड़ा शोर सुना था तेरी नज़ाकत का,
तेरी अंजमुन में हम अनजाने हो गये
शोक था शराब का प्याला नस़ीब नहीं,
ओक़ में पिलाया हम दीवाने हो गये!
मय कशी सागर संजीदा थे आ़ला आलीशान,
इज़्ज़त आबरू नहीं हम फ़साने हो गये!
मजमा जमा था अजीबो ग़रीब रक़ीब हबीब,
चमकते सितारे चांद हम मस्तानै हो गये!
दस्तरख़ान पर दस्तयाब लज़ीज़ त़़आम कबाब ‘कागा”
मेज़बान मेहमान साक़ी हम मयख़ाने हो गये!
जांबाज़
.बेज़ुबान की आवाज़ बन जान है तो जहान है,
बेसहारा की परवाज़ बन जान है तो जहान है!
दर क़दम सितमगर ज़माने में ज़ईफ़ के दुश्मन ,
ज़िंदा दिल जांबाज़ बन जान है तो जहान है!
बेजान इंसान को जनाज़ा कहते लोग अमीर ग़रीब फ़क़ीर,
बेकस का आग़ाज़ बन जान है तो जहान है!
क़ुदरत का करिश्मा अपनों में होते चंद बेगाने दीवाने,
अपनों का अंदाज़ बन जान है तै जहान है!
मुक़दर के सिकंदर क़लंदर शाह गदा सुल्तान सरदार चौकीदार,,
रुतब्बा का राज़ बन जान है तो जहान है !
ऊपर वाले की लाठी जब बरसती आवाज़ नहीं होता,
कमज़ोर का साज़ बन जान है तो जहान है!
कायनात में क़्यामत त़य्य आज नहीं तो कल ‘कागा”
हम दर्द हम राज़ बन जान है तो जहान है!
सपनों का भारत
आज के सपनों का भारत सुंदर सलोना,
आप के अपनों का भारत सुंदर सलोना!
भारत देश हमारा अपने प्राणों से प्यारा,
हम सब नेक एक भारत सुंदर सलोना!
काशमीर से कन्या कुमारी तक डंका बजता,
पंजाब बंगाल गुजरात समेत भारत सुंदर सलोना!
तिरंगा लहराये अर्श में ऊंचा बुलंद आलीशान,
बीच अशोक चक्र देख भारत सुंदर सलोना!
अलग वेश भूषा भाषा संस्कृति खान पान,
आचार विचार शुद्ध विवेक भारत सुंदर सलोना!
हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई जैन बोध ‘कागा”
मत पंथ महंत अनेक भारत सुंदर सलोना!
होली का दहन
आओ होली का मिल जुल दहन करें,
कुप्रथा कुरीति का कब तक सहन करें!
ढोंग पाखंड अंध-विश्वास आडम्बर ने घेरा ,
जात पात की होली का दहन करें!
आडम्बर पौंगा पंथी परम्परा ने पंगू बनाया,
अशिक्षा अज्ञान की होली का दहन करें!
धर्म मज़हब की होड़ मची भगदड़ भयंकर ,
घ्रणा घमंड की होली का दहन करें!
बाल विवाह सत्ती प्रथा समाज पर कलंक,
भ्रुण हत्या की होली का दहन करें!
नशीली वस्तुओं का प्रचलन प्रचूर मात्रा में,
दारूं डोडा की होली का दहन करें!
फ़ुज़ुल ख़र्च का बोल बाला टीका दस्तूर ,
महंगी मंगनी की होली का दहन करें!
बलात्कार होते सरे आम कन्याओं का क़तल,
दहेज दानव की होली का दहन करें;
राजनीति रंगीन हो चुकी होता दमन दबाव,
दबंग दलाल की होली का दहन करें!
ओसर मोसर मृत्यू भोज मांस सेवन ‘कागा”
छूआ छूत की होली का दहन करें!
तुख़्म तास़ीर
तेरा क़ुस़ुर नहीं तुख़्म की तास़ीर है,
तेरा गुनाह नहीं तुख़्म का क़ी तास़ीर है!
करेला होता कड़वा बीज जड़ पत्ते फूल,
क्या करे करेला तुख़्म की तास़ीर है!
आम होता खट्टा मीठा चटपटा रस भरा!
इमली अमचूर स्वाद त़ुख़्म की तास़ीर है!
जल ज़मीन आबो हवा फ़लक बारिश बूंदें,
सबका ज़ायक़ा अल्ह़दा तुख़्म की तास़ीर है!
कोई नर्म दिल ख़ुश मिज़ाज हर दिल अ़ज़ीज़,
कोई शीरीन ज़ुबान तुख़्म की तास़ीर है!
कोयल कूक मीठी सुरीली कड़वा बोल ‘कागा’
दोनों रंग काला तुख़्म की तास़ीर है!
इंसानियत
इंसान चला जाता दुनिया छोड़ यादें रह जाती,
इंसान चला जाता मुंह मोड़ यादें रह जाती!
क़ुदरत का कमाल क़िस्मत का खेल दुनिया फ़ानी,
बादल बरस करते गज गोड़ यादें रह जाती !
हरा भरा होता आलम आलीशान स़िहरा सूखा रेगस्तन,
किसान करता कोशिश गठ जोड़ यादें रह जाती!
नेकी बदी का नफ़ा नुक़सान हर कोई जानता,
बदमाश देते सारी ह़दें तोड़ यादें रह जाती!
नफ़रत की आग लगाते हसरत वाली बस्तियों में,
हह़ास़द बग़ावत करते तोड़ फोड़ यादें रह जाती!
सलूक कर शानो शोक्त सलीक़े से क़द्रदान ‘कागा’
बदी बुराई को तोड़ मरोड़ यादें रह जाती!
जीवन
सांसों पर भरोसा नहीं कब रुक जाये,
नासों से आते जाते कब रुक जाये!
अगन गगन जल थल पवन का पुतला,
वायु पर भरोसा नहीं कब रुक जाये !
हाड़ मांस रक्त लार नस नाड़ियों भरपूर,
लहु पर भरोसा नहीं कब रुक जाये !
इळा पिंगळा सुष्मणा की डोर में गू़ंथा,
तार पर भरोसा नहीं कब रुक जाये !
काम क्रोद्ध लोभ मोह माया अहंकार अकड़,
माया पर भरोसा नहीं कब रुक जाये !
रूप रस गंध शब्द स्पर्श अनुलोम विलोम,
स्वर पर भरोसा नहीं कब रुक जाये!
मन बुद्धि चित्त मत मति सत्ता स्मृति,
व्रति पर भरोसा नहीं कब रुक जाये !
प्रकृति पुरुष से संरचना सर्व सृष्टि की ,
प्रलय पर क्या भरोसा नहीं कब रुक जाये
प्राण पखेरू फुदक रहा पिंजरे में ‘कागा’
प्राण पर भरोसा नहीं कब रुक जाये!
होली
बुरा मत मानो होली है,
बुरा मत सुनो होली है!
होली का हुड़दंग रंग गुलाल,
बुरा मत सोचो होली है!
रंग लाल पीला नीला गुलाबी ,
बुरा मत बोलो होली है!
होली जली दिल आग बबुला,
बुरा मत बनो होली है!
फागुन का अंत बसंत बहार,
बुरा मत करो होली है!
गाते फाग बजाते डफ ‘कागा”
बुरा मत कहो होली है!
चमार
मानव पुतला गंद गठरी ढांप रखी चाम से,
मांस रक्त मल मूत्र ढांप रखी चाम से!
हाड जोड़ ढांचा बनाया सांचा सुंदर तन बदन,
नाड़ियां बहती रक्त धारा ढांप रखी चाम से!
नव द्वार से गंदगी टपके लार थूक बन,
आंसू पसीना वीर्य रज ढांप रखी चाम से!
रोम रोम में छेद अनेक बुरी आती बदबू,
मेल मेद सेदा उल्टी ढांप रखी चाम से!
हर अंग उज़वे नस में मवाद का स्वाद,
मानव गाथा बनी चमार ढांप रखी चाम से!
पंडित पूजारी संत महंत आत्मा महात्मा ऋषि मुनि,
क्षत्री वैश्य शूदर काया ढांप रखी चाम से!
सांस रोमांस में बास लीचड़ कीचड़ का ‘कागा”
हर पल हर घड़ी ढांप रखी चाम से!
ढाटी मेघवाल
पन्नू पातालिया पुनड़ जोगू जोईया जयपाल,
पारगी पतलिया इणखिया वाओरी बोचिया बारोपाल!
खोखर खंभू ख़ींटलिया खियाला पड़गड़ू पंवार,
गाडी गंढेर गांगला मणहोर ओढाणा पड़िहार!
बालाच बा़भणिया बाणिया चोहाणिया राठोड़िया निजार,
संजा सेजू दरड़ा देपाल कतीरा फा़ंगालिया
मकवाणा मेहरड़ा मसाणिया बढ़िया सिलोरा सिंहटा
धणदे बणल बेगड़ कूंहट कुडेचा कागिया!
तुरकिया लहुआ लीलड़ मंगलिया सोलंकी सूदरा
हंजड़ा हींगड़ा रोलहा बलासिया आसलिया कड़ेला!
होळी
होळे-होळे पगलियां पाळी पधारी भोळी भाळी होळी,
गाम गोआड़ी भुआड़ी पाळी सिधारी भोळी भाळी होळी!
हरण कशियप री बहिन बापड़ी प्रह्राद सगा भतीजा,
सळगणे बळने को बेठी गौद निकला बुरा नतीजा!
फागन री फूहार पळका पड़े गावे गीत संगीत,
रंग रंगीली भरी पिचकारी डारी सखी संग पुनीत!
सज धज सखियां भर अंखियां काजळ निरखे नार,
कर सौळह सणंगार सुहागण छटा बिखेर बिलखी नार!
काळा बाळ लाल गाल रंग गुलाल चढ़ माळ,
देखे ऊपर डागळे गोरी गौखड़े होळिका बळती झाळ!
बाळ गोपाळ बूढां बडेरा मोटियार गुडाळ गू़ंजे फाग,
होळी पिया घर आंगण नहीं काळजे सुळगे आग !
‘कागा’ कृष्ण खेले होळी संग गोपियां रंग बोछार,
राधा रूकमणी रंग मह़ल बावळी बनी बिना बोछार!
ढाटी माड़हू
असीं ढाटी माड़हू ढाट रा क़द काठी में मजबूत,
डिघा घणा देखण में फुटरा ढाट जमीं जाया रजपूत !
परगणो असांजो पधरो खावड़ मोहराणो कंठो वट नगर पारकर,
छाछरो डाहली गढड़ो छापर अमराणो कागिया चेलहार थर पारकर!
रोहळ खींहसर बगल बगनू मडुआ ढाकलो राजोड़ो रड़ियाळो दूंबाळो,
तुगूसर तारियाणो वरनारियो सारंगियार अमरहार जैसार भाडासिंधो भिटाळो बिजाळो!
आधीगाम मेहलाणो सामी बेरी महू कांकियो कीतार सलाम कोट,
मिठ्ठी दीपलो खेतलियार दोबार पाबू बेरो नबीसर नयो कोट!
झांबड़ीसर धोळकें भोरीलो हरिहार सूराम हंजतल सिल सोखरू मालणोर,
अड़बलियार कमड़ार गूंगियो अकलीं पारणो सींजलियो जोगी बेरो चारणोर!
सपूत सोढ़ा सूरमा सुरतान सादुल भोजराज बिजयराज नरा नब्बा ,
रजपूत रंग रूड़ा खावड़िया संगरासी दोहट राम भणकमल चाबा!
मेघवाल भील कोळी जात भोळी भाळी करते खेती बाड़ी ,
भणती गुणती टाबर टींगर छोकर नींगर मजूरी हाड़ी दिहाड़ी!
भेष भूषा भाषा ढाट मारवाड़ री मिळी जुळी मोकळी,
खाता राबड़ी बाजरा री सांगरी साग चापटिया कदे ढोकळी!
माथे मोळियो पाघड़ी पोतियो पाग फींटो छह बाल त्रेवटो,
पग पगरखी अंग अंगरखी पू़ठीयो हिरख बाफतो बेपट्टो त्रेवटो !
आवणी जावणो गामत्रे चढ़ण नां चोखी ऊंट घोड़ा सवारी ,
पराण पाखड़ो गासियो तंग ताण संज सुजाण सुगम सवारी!
पाणी पीवण नां पाधरो कोनीं खोद पीता ऊंडो पाताळ,
साठ पुरष तळा बरत चौघट भाणा कोस गोसी पाताळ!
खीलिया खींचता ऊ़टां गधां सीं बारी -बारी दिन रात,
अवाड़ा भरता पाणी सींच मुठ्ठियां भींच करता हळकारा प्रभात!
‘कागा’ ढाट मारवाड़ रा मोटियार मोतियां से महंगो मोल ,
साची आछी बात सुणो भाईड़ां नाहीं है कोई झोळ!
ख़ून का रिश्ता
रिश्ते ख़ून के होते हैं बाक़ी मत़लब के ,
अपने एह़सास के होते है बाक़ी मत़लब के!
आफ़्त आने पर देते जान मुश्किल घड़ी में ,
खरोंच लगने पर रोते है बाक़ी मत़लब के!
होता जब ह़ादस़ा ह़रकत हलचल दर्द नहीं ज़रा,
रिश्तेदार ज़ख़्मों को धोते है बाक़ी मत़लब के!
ख़ून खोल जाता है बदन में शोला बन,
जब अपना कोई खोते है बाक़ी मत़लब के!
परेशान रहते हमेशा बेचैन आंखों में नींद नहीं ,
राहत मिलने पर सोते है बाक़ी मत़लब के!
एह़सास का रिश्ता नाता बड़ा कमाल का ‘कागा”
बिखरे मोतियों को पिरोते है बाक़ी मत़लब के!
ढाट रा ठाठ ( मारवाड़ी भाषा में )
ढाट मारवाड़ रा ढंग ढाळा लुगाईयां रा करां बखांण,
मान मरियादा मोकळी घूंघट पट सिमटती घणा करां बखांण!
सौलह कली रो घाघरा नो हाथ चूनड़ी ओढणो ओळखाण,
पग पायल बाजे घुंघरू सोलह श्रृंगार सज धज ओळखाण!
नाक नथड़ी कान झुमका कमर कंडोला माथे गूंथियो चोटलो,
छल्ला मुंद्रड़ी उंगलियां खंच मूठियों बंगड़ी हाथी दांत चूड़लो!
कांचली कुड़ती गळे नव लखा हार काळा केश कांकणी ,
मांग सिंदुर ललाट बिंदिया हाथां मेहंदी रंग राती राचणी!
मृग नेणी चाल मोरनी चाले ठुमक पग मोजड़ी खणकणी
पनघट भरे पाणी संग सहलियां सिर सिंढाणी गगरी छळकणी!
कजळी तीज श्रामण री नीम्बड़े बांध्या झूला हींडे हिंंडोळा,
बिगर पिया जळे जिया बोले पपिहा हिंवड़े में हिंडोळा!
रूप रूड़ो रूपाळी सोवनी झाळी चाले पाळी लचके कमरिया,
चम्पे री डाळी नेणे काजळ निरखे निराळी काळी बदरिया !
‘कागा’ कोयलिया री कूक मन मोहणी मीठी तान सुरीळी ,
ढाट मारवाड़ री मरजाद रो तोड़ कोनहीं तान सुरीळी !
प्यार
प्यार करने की उमर नहीं होती,
दीदार करने की उमर नहीं होती!
प्यार दोनों ओर से होता है,
इज़हार करने की उमर नहीं होती!
आग दोनों दिलों में सुलगती है,
इक़रार करने की उमर नहीं होती!
इश्क़ में काला गोरा मायने नहीं ,
इंकार करने की उमर नहीं होती!
दूर दराज़ नज़दीक फ़ास़ला रुकावट नहीं ,
तकरार करने की उमर नहीं होती!
दिल का मिलना जुलना अलग क़िस़्स़ा,
इसरार करने की उमर नहीं होती!
आंखें मिल जाती जिस्म छुआ नहीं ,
एतबार करने की उमर नहीं होती!
प्यार एक बेश-क़ीमती तोह़फ़ा ‘कागा”
निखार करने की उमर नहीं होती!
सच्चाई अच्छाई
फूट डालो राज करो नियत जारी है,
लूट डालो राज करो नियत जारी है!
समाज धर्म संस्कृति में वर्ण व्यवस्था लागू,
ऊंच नीच छूआ छूत की व्यवस्था लागू !
मुख भुजा मध्य भाग चरण से उत्पन्न,
भेद भाव की भावना मानव मन उत्पन्न !
जात पात का मकड़ जाल गूंथा ग़ज़ब,
कोई ताल मेल नहीं ग़ैर बराबरी ग़ज़ब!
शिक्षा रक्षा धन सम्पति सेवा कार्य बांटा,
मांग छीन झपट छल कपट खाना बांटा!
ख़ून पसीने की कमाई किसान मज़दूर की,
खाये तीतर कमाये कीड़ी दशा मजबूर की!
शेर सांप बाज़ बगुला घड़ियाल को छूट,
जानवर चूहा चिड़िया मछली गटक मचायें लूट !
‘कागा’ कोयल त़ौत़ा मीना का क़द्र नहीं!
सच्चाई अच्छाई ईमान अरमान का क़द्र नहीं!
अंध-विश्वास
ढोंग के दल-दल मे़ फंस गये,
पाखंड के दल-दल में धंस गये!
बहक जाते भोले भाले लोग चुंगल में,
अंध-विश्वास आडम्बर की चाल चुंगल में!
चिकनी चुपड़ी मीठी मोहनी बेतुकी बातें सुन,
झूठे झांसे चक्कर में आते बातें सुन!
ऋद्धि सिद्धि स्वर्ग सुख का देते लालच,
नर्क का भय पुत्र प्राप्ति का लालच !
पति की आयू लम्बी आजीवन सदा सुहागन ,
निरोगी काया घर में माया का प्रलोभन !
देते दुआ आशीर्वाद करते दक्षिणा की मांग,
देते गुप्त दान ज्ञान दक्षिणा की मांग!
करवा चौथ की महिमा करते गुण-गान ,
मन भावन त्यौहार मनाने का गुण-गान!
पित्र पूजन शांति का पढाते पवित्र पाठ,
एकांत में मिलन जुलन होते ठाठ बाट!
घिनोती हरकत वालों की अब ख़ैर नहीं,
सलाख़ों में बंद होंगे अब देर नहीं!
‘कागा’ भृष्टाचार शिष्टाचार बना सचेत हो जाओ,
संस्कार संस्कृति को सुधार सचेत हो जाओ!
नेक बनो
दिलों के टूटे तार जोड़ो,
दिलों के रूठे यार जोड़ो!
बिखरे मोतियों की बनाओ माला,
धागे में पिरोते बनाओ माला !
चमन में फूल चुनता माली ,
गूंथ गुल बनाता हार माली!
तार सारंगी के सुंदर सुर ,
साज़ बजता गूंजता सुंदर सुर!
शीशे में देखते अपना मुखड़ा,
टूटा फूटा बिखरा टुकड़ा उखड़ा !
मुंह मोड़ चलते डर कर,
ज़ख़्मी होने से डर कर !
ऊंच नीच में मत बांटो,
छूआ छूत में मत बांटो!
अगड़ा पिछड़ा लफड़ा रगड़ा छोड़ो,
भेद भाव का झगड़ा छोड़ो!
‘कागा’ करो एकता नेक बनो,
नेक विवेक से अनेक बनो!
आवा-गमन
संगी साथी चले गये हम है तैयार,
बिस्तर बोरिये बांध रखे हम है तैयार!
दुनिया का दस्तूर आना जाना खाना पीना,
नेक बंदे चले गये हम है तैयार !
रिश्ता नाता सगे संबंधी अपना कोई नहींं ,
अच्छे बुरे चले गये हम है तैयार!
संसार सुख दुख का सागर लहरें उठती,
हंस बगुले चले गये हम है तैयार !
जीवन भर की कमाई दो गज़ कफ़न,
अपने पराये चले गये हम है तैयार!
दुनिया दोगली मत़लबी दोस्तों की भर-मार ,
जमघट वाले चले गये हम है तैयार!
मखियां भिन-भिनाती गुड़ पर झुंड बनाये,
तलवे चाटते चले गये हम है तैयार!
बंद मुठ्ठी आये ख़ाली हाथ जाना ‘कागा”
अड़ोसी पड़ोसी चले गये हम है तैयार!
महिला दिवस
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर करें वर्णन विशेष,
महिला महिमा न्यारी अनोखी देती सुंदर संदेश!
महिला मर्द की छाया दाम्पत्य जीवन जोड़ी,
अ़र्श से उतर आती फ़र्श पर जोड़ी!
बिना नारी नहीं होती सृष्टि की रचना,
नर नारी का मेलाप सृष्टि की रचना!
नारी चांद की चांदनी चमक दमक खनक,
रोशनी बन करती रोशन माह़ोल सूरज रौनक़!
नारी रंग अंग उमंग फूल की ख़ुशबू
जननी संगनी भगनी बन जाती घर ख़ुशबू!
मां की ममता पिता की परी चिड़िया,
अंत उड़ जाती फुर्र चहक कर चिड़िया!
मायके में सवार डोली चलती अपने ससुराल,
उठती अर्थी मरघट की ओर छोड़ ससुराल!
लाग लपेट लोभ लालच नहीं निभाती रिश्ते,
बिना मोह माया देख ह़ेरान होते फ़िर्श्ते !
‘कागा” हाथ कंगन पग पायल बजे आंगन ,
राम रावण कंस कृष्ण की खान बेरागन !
महारानी वसुंधरा राजे
महारानी वसुंधरा राजे का जन्म दिन मनायें,
जोशो ख़्रोश होश ह़वास़ से जशन मनायें!
महिला शक्ति भक्ति युक्ति मुक्ति दाता महान,
जय राजस्थान का नारा बुलंद यादगार बनायें!
दो बार मुख्य मंत्री क़द्दावर नेतृत्व कमाल,
अगड़ा पिछड़ा भेद नहीं विकास कार्य गिनायें!
अमनो अमान सुख शांति का संदेश भेज,
आम जन मानस तक सुगम संगीत सुनायें!
बीमार प्रदेश को चुस्त दुरस्त स्वस्थ्य बनाया ,
अग्रणी श्रेणी में नाम रोशन गुंजन गुनगुनायें !
राजे जेसा मज़बूत कोई रहबर नहीं ‘कागा”
हार्दिक बधाई मंगल शुभ कामनाएं नेक तमनायें!
प्रेम बंधन
प्रेम में जात पात बंधन नहीं होता,
प्रेम मे दीन धर्म बंधन नहीं होता!
प्रेम दिलों का मेल आकर्षण होता है,
प्रेम में रंग रूप बंधन नहीं होता!
प्रेम की आंखों नहीं नाबीन होता है,
प्रेम में ऊंच नीच बंधन नहीं होता!
प्रेम में पागल हो जाते दोनों दिल,
प्रेम में भेद भाव बंधन नहीं होता!
प्रेम में चूमते झूमते चूसते देते चुम्बन ,
प्रेम में छूआ छूत बंधन नहीं होता!
प्रेम बिना देखे परखे हो जाता है ,
प्रेम में ग़ैर अनजान बंधन नहीं होता!
प्रेम में दूर दराज़ फ़ास़ला रुकावट नहीं ,
प्रेम में सीमा पार बंधन नही होता!
प्रेम नर मादा की भूख प्यास ‘कागा”
प्रेम में उम्र का बंधन नहीं होता!
बुढ़ापा
बेबस बुढ़ापा आ गया जवानी चली गई,
बेकस बुढ़ापा छा गया जवानी चली गई!
बच्चपन बीता खेल कूद मनो-रंजन में,
समय खिसक गया मोज मस्तानी चली गई!
जोश जल्वा जुनून जज़्बात ख़ुमार जवानी का,
चमक दमक खनक रौनक दीवानी चली गई!
शानो शोक्त शहोरत रोब रुतब्बा इज़्ज़त आबरू,
तेज़़ तर्रार त़ाक़्त ताज़गी निशानी चली गई!
मह़फ़िल मजलिस दावत का दौर अजीबो ग़रीब,
शराब कबाब शबाब की रवानी चली गई!
सहारा थे कमज़ोर के बेसहारा बेज़ार ‘कागा”
बेकार बुज़ुर्ग बन बेठे नूरानी चली गई!
मां का रिश्ता
मां का रिश्ता ममता का रिश्ता,
मां का रिश्ता क्षमता का रिश्ता!
नौ माह अपनी कोख में पालती,
मां जेसा नहीं कोई ओर रिश्ता!
रिश्ते नाते जग में सारे मत़लबी,
प्रसव पीड़ा सहन का महान रिश्ता!
स्तनों से बहती दूध अमृत धारा,
पीती संतान गट-गट मधुर रिश्ता!
पेट मे पालन पोषण सुरक्षा संतक्षण,
खान पान रहती सावधान सुंदर रिश्ता!
जन्म होता गूंजती किलकारी मां मुस्काती,
कलेजे में ठंडक मन मोहक रिश्ता!
मल मूत्र धोती रोती ढोती बोझ,
अंग उमंग पहनाती पोतड़ा प्रेम रिश्ता!
माता कहो जननी को काले ‘कागा”
नहीं लजाना दूध छट्ठी का रिश्ता!
ख़ंजर
खंजर गिरे ख़रबूज़ पर नुक़स़ान ख़रबूज़ का,
ख़ंजर गिरे तरबूज़ पर नुक़स़ान तरबूज़ का !
ग़रीबी में गीला आटा दाल नहीं गलती ,
दामन केसे स़ाफ़ रखें चाल नहीं चलती!
देख ह़सीन चेहरा पेहरे पर पेहरा हज़ार,
गुलाब में गुल भी कांटे होते हज़ार!
प्यार भी क्या चीज़ है अजीबै ग़रीब,
दिल में दर्द होता दूर चाहे क़रीब!
दुनिया का दस्तूर दुश्मन होते हर जाय,
फ़ास़ला नहीं करते बेगाने दीवाने हर जाय!
‘कागा’ ख़्वाहिश होती नहीं मुकमल ख़्वाब में,
वक़्त ज़ाया करते फ़ालतू सवाल जवाब में
होली बोली
होली बोली हर साल मुझे क्यों जलाते हो,
अब छोड़ो भेड़ चाल मुझे क्यों जलाते हो!
हरण कश्यप मेरा भाई मैं उसकी सगी बहिन ,
प्रह्लाद मेरा भतीज लाल मुझे क्यों जलाते हो!
भाई बहिन भूआ भतीज का रक्त का रिश्ता,
रक्त का रंग लाल मुझे क्यों जलाते हो!
जला कर जी नहीं भरा मनाई ख़ूब खुशियां,
रंग डाल लाल गुलाल मुझे क्यों जलाते हो!
ढोल ढफ चंग बाजे गाते फाग फाल्गुन की,
नाचें गायें ठोक ताल मुझे क्यों जलाते हो!
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का देते नारा खोखला,
करते भ्रुण बेटी ह़लाल मुझे क्यों जलाते हो!
मातृ शक्ति सम्मान की करते बातें बढ़ चढ़,
दोहरी चलते चाल चंडाल मुझे क्यों जलाते हो!
नव दुर्गा कन्या पूजन करते नवरात्रा काल में ,
नारी का जीवन जंजाल मुझे क्यों जलाते हो!
समय बीता कौन जीता कौन हारा भूल जाओ,
कुरीति बनी रीति कमाल मुझे क्यों जलाते हो!
अबला नहीं सबला नार ममता मरी नहीं ‘कागा”
करो क्षमा बनो कृपाल मुझे क्यों जलाते हो!
आशिक़ माशूक़
तेरी स़दा सुन मुझे इश्क़ हो गया,
तेरी अदा देख मुझे इश्क़ हो गया!
तेरा ह़सीन चेहरा चमका पूनम का चांद,
तेरी रज़ा देख मुझे इश्क़ हो गया!
हम रूह हुए हम राह हम-दम ,
तेरी सज़ा देख मुझे इश्क़ हो गया!
इश्क़ में रोता दिल ज़ार ज़ार पागल,
तेरी क़ज़ा देख मुझे इश्क़ हो गया!
गुलशन में गुल गुलाब के ख़ुशबू-दार ,
तेरी फ़िज़ा देख मूझे इश्क़ हो गया!
आशिक़ माशूक़ के दरम्यान गुफ़्तार होती ‘कागा”
तेरी ग़ज़ा देख मुझे इश्क़ हो गया!
जवानी बनाम बुढ़ापा
जवानी में ग़ुलामी नहीं अब बुढ्ढे हो गये ,
जवानी में सलामी नहीं अब बुढ्ढे हो गये!
बच्चपन से गीत गाये आज़ादी के बन परवाने,
जवानी में चापलूसी नहीं अब बुढ्ढे हो गये !
शिक्षा दीक्षा ज्ञान ग्रहण किया मन चित्त से,
जवानी में चाटुकारी नहीं अब बुढ्ढे हो गये!
संस्कार संस्कृति सभ्यता का पाठ पढ़ा माता से,
जवानी में चुग़ली नहीं अब बुढ्ढे हो गये!
माता पिता पुत्र रिश्ते नाते का धर्म निभाया ,
जवानी में बदमाशी नहीं अब बुढ्ढे हो गये!
चाल चेहरा चित्र चरित्र मित्र पवित्र इ़त़र जेसे,
जवानी में बेईमानी नहीं अब बुढ्ढे हो गये!
काम क्रोद्ध मोह माया लोभ लालच से दूर,
जवानी में व्यभिचारी नहीं अब बुढ्ढे हो गये!
राज सेवा समाज सेवा राजनीति रंग मंच पर,
जवानी में चमचागिरी नहीं अब बुढ्ढे हो गये!
दामन पर दाग़ नहीं काजल कोठड़ी में ‘कागा”
जवानी में भृष्टाचारी नहीं अब बुढ्ढे हो गये!
नोटंकी
मां बाप की सेवा नहीं कुंभ नहाने चले ,
सास ससुर की सेवा नहीं कु़ंभ नहाने चले!
भूखे को भोजन नहीं प्यासे को पिलाया पानी ,
बहिन भाई से प्यार नहीं कुंभ नहाने चले!
रिश्ते नाते निभाये नहीं बेरी बन रहे सदा,
अपने पराये का भेद नहीं कुंभ नहाने चले!
लूट खसोट हत्या व्यभिचार किये कुकर्म काले कर्तूत,
बेसहारा का सहारा बने नहीं कुंभ नहाने चले!
माता पिता को छोड़ा वृद्धाश्रम मिंयां बीवी अकेले,
शराब कबाब शबाब में जनाब कुंभ नहाने चले!
मात पिता की मृत्यू बाद करने लगे नोटंकी,
मृत्यू भोज अस्थि विसर्जन की कुंभ नहाने चले!
अपने आदर्श भूल कर पराये भरोसे पिछलग्गू ‘कागा”
संस्कार संस्कृति हो गई भृष्ट कुंभ नहाने चले!
मन का मेल
मन का मेल मिटा नहीं करता तन स़ाफ़,
चित्त का मेल मिटा नहीं करता तन स़ाफ़!
घ्रणा घमंड ढौंग पाखंड आडम्बर पौंगा पंथी परम्परा,
रूढ़ी वादी रिवाज मिटा नहीं करता तन स़ाफ़!
नियत में खोट नित्य करे पग पग पाप,
हय्या दया लाज रखता नहीं करता तन स़ाफ़!
खाल ओढ़ भेड़ की भेड़िया घुस झुंड मे़,
खाता अपना खाज शर्म नहीं करता तन स़ाफ़!
तन उजाला भगत बगुला झपट गटक लेता मछलियां ,
बन बुरा बाज़ दया नहीं करता तन स़ाफ़!
भेष बदल करता भ्रमण अड़सठ तीर्थ यात्रा ‘कागा”
बोल मधुर आवाज नीति नहीं करता तन स़ाफ़!
हम-राही
हम एक दूसरे के लियै तुम मेरे लिए,
हम एक दूसरे के लिए मैं तेरे लिए!
प्रकृति ने जग में जोड़ी बनाई नर मादा,
दोनों को दिल दिया एक दूसरे के लिए!
जब आंखें होती दो चार हो जाता प्यार,
दोनों को प्यार दिया एक दूसरे के लिये!
जा़त पात का झंझट नहीं कोई बाधा बंधन,
दोनों को दर्द दिया एक दूसरे के लिए!
दिल बेताब होता मिलन को तड़प कर हरदम,
दोनों को नूर दिया एक दूसरे के लिए!
आंसू टपक कर पड़ जाते जुदाई में ‘कागा”
दोनों को दीदार दिया एक दूसरे के लिए!
जान के दुश्मन
जान देकर जान बचाई जान के दुश्मन निकले ,
ख़ून देकर जान बचाई जान के दुश्मन निकले!
नाम देकर अपना नामचीन बनाया मुस़ीबत के वक़्त,
नालायक़ को लायक़ बनाया जान के दुश्मन निकले!
जिन पत्थरों को ज़ुबान दी बरसे मुझ पर ,
जिन पर एह़सान किया जान के दुश्मन निकले!
क़दमों में गिर गिड़गिड़ा रहे थे ऊंचा उठाया,
कमज़ोर को त़ाक़्तवर बनाया जान के दुश्मन निकले!
मंझधार में फंस डग-मग कर डूबने वाले,
किनारे पर पार लगाया जान के दुश्मन निकले!
नमक ह़लाल नहीं बने खाने के बाद ‘कागा”
माला माल ख़ुशह़ाल बनाया जान के दुश्मन निकले!
क़ुदरत का करिश्मा
क़ुदरत का करिश्मा जन्म भूमि ढाट कर्म भूमि मारवाड़,
क़िस्मत का कमाल जमाल ताल ढाट ह़ाल चाल मारवाड़!
सगाई हुई गांव भाडासिंधा मडुआ सिंध में हेत से,
बारात सजी अभे का पार सीमा पार हेत से!
गांव इब्राहिम का तला जहां जमघट झंझट शरणार्थियों का,
घाट घाट का पानी पिया गडरा रोड़ शरणार्थियों का!
कैम्प महाबार में परिवार छोड़ा नोकरी साजी तड़ा में ,
सुख मय समय बीता दिल जीता साजी तड़ा में!
वक़्त ने करवट बदली चौहटन में मास्टर कम्पाऊंडर लिपिक ,
भारतीय नागरिकता मिल गई भूमि मिली नोकरी वरिष्ट लिपिक!
प्रधान पंचायत समिति सदस्य विधायक बन गये चौहटन के ,
राजनीति मे़ सक्रिय सदेव जाग्रत शांत स्वभाव चौहटन के!
बच्चों की शिक्षा दीक्षा परीक्षा समीक्षा प्रतिदिन जारी रखी,
दूध पानी का मेल अपनी दिन-चर्या जारी रखी!
आठ ब्याह रचाये दो बहिनें दो बेटियां दो बेटा,
एक भांजी एक भतीजा का विवाह सोच बेटी बेटा !
छह बार वीज़ा से जन्म भूमि का दर्शन किया,
ख़ून के सगे संबंधी भाईयों का दोबारा दर्शन किया!
आराध्य कुल देवी मां देवल खारोड़ा जाकर दी धोक,
हिंगलाज माता की तीर्थ नहाया बलुचिस्तान जाकर दी धोक!
आठ चुनाव लड़े चार पर जीत हुई चार हारे ,
विजय मिली क़दम दर क़दम दिल से नहीं हारे!
‘कागा’ क़ुदरत का करिश्मा क़िस्मत का खेल नहीं जानता,
अलौकिक दृश्य देखा अपनी आ़ंखों से खेल नहीं जानता!
दिल दीवाना
दिल मेरा दीवाना दौलत किसी ओर की है,
दिल मेरा मस्ताना मिल्कियत किसी ओर की है!
धड़कनें तेज़ होती मेरे सीने में धक धक,
दिल मेरा दीवाना अमानत किसी ओर की है!
छुपा रखा फिर भी तड़प रहा बड़ा पशेमान,
दिल मेरा दीवाना फ़ज़ीलत किसी ओर की है !
बिना पैर चलता फिरता बिना पंख उड़ जाता ,
दिल मेरा दीवाना ज़मानत किसी ओर की है!
अमानत में ख़्यानत ख़ुर्द-बुर्द करना नहीं मक़स़द ,
दिल मेरा दीवाना वस़ियत किसी ओर की है !
प्यार करना कोई गुनाह नहीं स़वाब है ‘कागा”
दिल मेरा दीवाना नस़ीह़त किसी ओर की है !
होली
आई होली बड़ बोली भर झोली ख़ुशियों की,
सजायें आंगन रंगोली मनायें मिल होली ख़ुशियों की!
खेलें रंगीन रंगीली लाल पीली सरसूं जेसी सुनहरी,
भीगे अंग संग सहेलियां चुनरी चोली ख़ुशियों की !
पपिहा बोले पिया जिया जले दीपक जगमग ज्योति,
मधुर रस मिश्री घोली सखियां ठठोली ख़ुशियों की!
प्रीतम प्रदेश अकेली बिलखे अलबेली कर सोलह श्रृंगार ,
रात बेरन नींद नहीं जली होली ख़ुशियों की !
बगिया में बुलबुल बोले डाली डोली कोयलिया काली,
त़ौता मीना तितली की तान सुरीली ख़ुशियों की!
फाल्गुन मास फुलवारी सुगंध सुमन रंग बरंगी ‘कागा”
फाग गाती टाबर टोली गले मिल ख़ुशियों की!
माह-ए-रमज़ान
माहे रमज़ान मुबारक ख़ुश आमदीद मुक़दस महिना,
पाक रोजे मुबारक ख़ुश आमदीद मुक़दस महिना!
रमज़ान में रखते रोज़ा अक़ीदत ईमान से,
खाना पीना मना ख़ुश आमदीद मुक़दस महिना!
नफ़स शेता़न पर ज़ाब्त़ा रूह़ स़ाफ़ शफ़ाफ़,
इब्तदा इबादत ख़ुश आमदीद मुक़दस महिना!
स़ुबह़ सवेरे जाग अदा करते फ़जर नमाज़,
सिहरी आग़ाज़ ख़ुश आमदीद मुक़दस महिना!
वुज़ू कर पाक दामन नमाज़ पांच वक़्त ,
अज़ान इंतज़ार ख़ुश आमदीद मुक़दस महिना!
चांद का दीदार बड़ी बेताबी पर ‘कागा’
इफ़तारी इस्तक़बाल ख़ुश आमदीद मुक़दस महिना
समाज सेवा
दिल खोल दान दो समाज सेवा वास्ते,
दिल खोल जान दो समाज सेवा वास्ते!
समाज जाग चुका नींद भाग गई गेहरी,
दिल खोल वरदान दो समाज सेवा वास्ते,
शिष्टाचार संस्कार गरिमा बिना समाज आधा अधूरा,
दिल खोल शान दो समाज सेवा वास्ते!
शिक्षा क्षेत्र में सुंदर काम हो रहा ,
दिल खोल सम्मान दो समाज सेवा वास्ते!
बेटा बेटी एक समान कोई फ़र्क़ नहीं,
दिल खोल अरमान दो समाज सेवा वास्ते!
पीढ़ियों से वंचित शोषित शिक्षा से ‘कागा’
दिल खोल पहचान दो समाज सेवा वास्ते!
दिल पागल
दिल बड़ा पागल फ़रमान बरदार नहीं होता,
दिला बड़ा जाहिल ईमान बरदार नहीं होता!
कभी स्वाद कभी मवाद पर बेठ जाता ,
उड़ता मक्खी की त़रह़ ख़बरदार नहीं होता!
चिकने चेहरे से ज़र्ब ज़ख़्म पर मंडराता,
बदबू ख़ुशबू फ़र्क नहींं शानदार नहीं होता!
रंग बरंगी फूल कली चुलबुली तितली भंवरा,
रस चूस लेता चूम ख़ुदार नहीं होता!
लहू से नहीं वास्ता हर फ़न मोला,
प्यार का इज़हार करता ग़दार नहीं होता!
अस़ल नस्ल जायज़ ना-जायज़ नहीं देखता ‘कागा”
बे-ख़ुदी में बन बेज़ार सरदार नहीं होता!
सगी मां
मां सगी होती है जिसने कोख में पाला हो,
मां सगी होती है बेटा गोला चाहे काला सो!
मां की ममता निराली मां भोली भाली गोरी काली,
मां सगी होती है जिसने गोद में पाला है !
सोतेली मां ने राम को भेजा चौदह बरस बनवास ,
मां सगी होती है जिसने आंचल में पाला हो !
सौतन बुरी ध्रुव को खदेड़ा पिता की गोद से ,
मां सगी होती है जिसने पालने में पाला हो !
पुत्र श्रवण जैसा माता पिता को उठाया कंधों पर,
मां सगी होती है जिसने सीने लगा पाला हो !
माता के चरणों में स्वर्ग सेवा करो सदेव ‘कागा”
मां सगी होती है जिसने पीड़ा में पाला हो!
प्यार कर
प्यार कर नफ़रत में क्या रखा है ,
प्यार कर अदावत में क्या रखा है!
बिना प्यार जीवन बेह़द बेकार जीना दुश्वार,
प्यार कर बग़ावत में क्या रखा है!
दो दिलों का मिलन मह़सूस होती मसरत,
प्यार कर शरारत में क्या रखा है !
दयिया के दो किनारे मिलते नहीं कभी,
प्यार कर मिलकियत में क्या रखा है!
दिल की बग़िया में खिलते गुलाब गुल,
प्यार कर हसरत में क्या रखा है!
दिल में ख़ून का क़त़रा नहीं ‘कागा”
प्यार कर ग़फ़लत में क्या रखा है!
तिरंगा
देश की आन बान शान तिरंगा,
देश की जान ईमान अरमान तिरंगा!
भारत देश हमारा प्राणों से प्यारा,
बहती पावन जल धारा यमुना गंगा!
सिर मुक्ट हिमालय पर्वत सागर स़ेहरा,
भाई-चारा बुलंद नहीं कोई पंगा, !
लड़ाई झगड़ा रगड़ा लफ़ड़ा नहीं नफ़रत,
अनेकता में एकता नेकता नहीं दंगा!
लोक तंत्र पर भरोसा राजनीति रंगीन,
संगीन माहोल में चेहरा चमके चंगा!
पंद्रह अगस्त आज़ादी दिवस मनाते हम,
छब्बीस जनवरी संविधान नहीं कोई अड़ंगा!
काशमीर से कन्या कुमारी तक ‘कागा”
‘अमनो अमान चैन नहीं भूखा नंगा!
दिल का दरवाज़ा
दिल का दरवाज़ा खोल हम खड़े है सामने,
हरदम देते रहते दस्तक हम खड़े है सामने!
एक झलक पाने की ख़्वाहिश बड़े बेताब बेज़ार,
घूंघट के पट खोल हम खड़े है सामने!
चार दीवारी में चाक चौबंद बाहर बेठा दरबान ,
चोखट का ताक खोल हम खड़े है सामने!
पिंजरे में क़ैद पंछी आज़ाद उड़ना आसान नहीं,
पिंजरा छोड़ पंख खोल हम खड़े है सामने!
हाथों में हथकड़ियां पैरों में बेड़ियां जकड़ी ज़ंजीरें,
लगे ताले तगड़े खोल हम खड़े है सामने!
मुफ़्त की रिज़्क़ से आती परवाज़ में कोताही,
अब अपनी गठरी खोल हम खड़े है सामने!
कब तक गुज़र सफ़र होगी ग़ुलाम ज़िंदगी ‘कागा”
पर्दा नशीन पर्दा खोल हम खड़े है सामने!
मृत्यू भोज अभिशाप
मृत्यू भोज अभिशाप मृत्यू भोज महा पाप ,
मृत्यू भोज संताप मृत्यू भोज महा पाप!
ओसर मोसर करना रस्म रीति नहीं कुरीति ,
मृत्यू भोज करना रिवाज नीति नहीं अनीति!
मृत्यू होती घर में बुढ़े बुज़ुर्ग की,
रोते होते बेह़ाल मोत बुढ़े बुज़ुर्ग की !
आंखों में आंसू बहता नाक से पानी,
महिलाऐं करती सुबक घर में ईंधन पानी!
शोक संतप्त परिजन दुखी करता आलाप विलाप ,
पार्थिव शरीर आंगन पड़ा पड़ोसी मेल मेलाप
अर्थी उठने से पहले होती चर्चा चालू,
बनते मिल कर ईर्ष्यालु दयालू कृपालू श्रद्धालू !
सांत्वना श्रद्धांजलि अर्पित के बजाय कांधीपा करना,
बारहवें तक मीठा भोजन हल्वा पूरी करना!
देशी घी गाय का डोडा अमल मनुहार ,
पांच पीढ़ी के सगे संबंधी बुलावा मनुहार!
मृत्यू भोज बोझ बन जाता ग़रीब पर,
ज़मीन जायदाद बेचना आफ़्त आती ग़रीब पर!
‘कागा’ क़र्ज़ उठा फ़र्ज़ निभाता लोक लाज,
कुरीति जड़ से मिटाओ मिल सभ्य समाज!
नशा प्रवृति
नशा नहीं कर नर नशा नाश की निशानी,
नशेड़ी नहीं बन नर नशा नाश की निशानी!
नशा अमल डोडा चरस गांजा भांग धतुरा कोकीन,
शोकीन शराब कबाब का नशा नाश की निशानी!
नशा नाश करे घर आबाद को बर्बाद तबाह़,
हुक्का स़ुल्फ़ा ज़र्दा तम्बाकू नशा नाश की निशानी!
नशा हीरोईन एमडी नसवार सवार होता सिर पर,
धन की होती हानि नशा नाश की निशानी!
नशा छोड़ो नाता जोड़ो अपनों से बिखर गये,
नशा नस नस में नादान नशा नाश की निशानी!
‘घर में होता घमसान कल्ह कलेश कष्ट ‘कागा”
नोंक झौंक छीना झपटी नशा नाश की निशानी!
मात पिता की सेवा
मात पिता की सेवा कर जब तक ज़िंदा !
तन मन से सेवा कर जब तक ज़िंदा ,
पाल पोष कर बड़ा किया शिक्षा दीक्षा दिलाई,
योग्य बनाया इंसान सेवा कर जब तक ज़िंदा!
उंगली पकड़ चलना सिखाया गिरते को थाम कर,
चोट से बचाया सेवा कर जब तक ज़िंदा!
खाना खिलाया पानी पिलाया अपने हाथों से हरदम,
खेल खेलगया ख़ूब सेवा कर जब तक ज़िंदा!
समय पर भोजन खिला पानी पिला पूछ ह़ाल,
रोग का उपचार सेवा कर जब तक ज़िंदा!
लोक लाज की ख़ात़िर करेगा मृत्यू भोज मूर्ख,
जीवित की ज़रूरी सेवा कर जब तक ज़िंदा!
मां बाप जेसा नहीं कोई रिश्ता ओर ‘कागा”
मन चित्त से सेवा कर जब तक ज़िंदा!
क़ुदरत का क़ानून
जैसी नज़र वैसा नज़रिया क़ुदरत का क़ानून,
जैसी नियत वैसी मुराद क़ुदरत का क़ानून!
देर ज़रूर अंधेर नहीं मालिक के घर !
देता दोलत छप्पर फाड़ क़ुदरत का क़ानून!
स़बर का फल मीठा ज़रा इंतज़ार कर!
वक़्त करता बख़्त गुलज़ार क़ुदरत का क़ानून!
चींटी को देता एक अ़दद दाना रिज़्क़,
हाथी को रोज़ी मन क़ुदरत का क़ानून!
परिंदों की परिवर्श करता उड़ते आसमान में,
खेत खलियान में ख़ोराक क़ुदरत का क़ानून!
आबो हवा ज़मीन आग अ़र्श कायनात ‘कागा”
रज़ा क़ज़ा रब की क़ुदरत का क़ानून!
अधूरा ज्ञान
आधा अधूरा ज्ञान विज्ञान जीवन का जंजाल,
आधा अधूरा ध्यान संज्ञान जीवन का जंजाल!
अदरक का एक टुकड़ा मिला बंदर को ,
पंसारी बन बेठा ह़ेवान जीवन का जंजाल!
अक्षर सीखा एक हिंदी सिंधी आंगल का ,
शिक्षक बन बेठा नादान जीवन का जंजाल!
मंत्र जंतर तंत्र शास्त्र अध्यन नहीं किया,
गुरू बन बेठा महान जीवन का जंजाल!
गुरू कुल की अगाडी़ झांक नहीं देखी ,
ब्रह्मण बन बेठा जजमान जीवन का जंजाल!
राजनीति के रंग मंच पर छाया छछूंदर,
नेता बन बेठा बेईमान जीवन का जंजाल!
धर्म दीन मज़हब की व्याख्या करता अनाड़ी,
विधाता बन बेठा विद्वान जीवन का जंजाल!
जड़ी बूटी ओषधी बिना जाने झोला छाप,
तबीब बन बेठा आसान जीवन का जंजाल!
समाज की सेवा नहीं की भूले भटके,
सेवक बन बेठा सुजान जीवन का जंजाल!
आवारा आये थे बग़लगीर बन गये ‘कागा’
ख़ुशामद बन बेठा ख़ानदान जीवन का जंजाल!
महा शिवरात्रि
महा शिवरात्रि महान उत्सव जन जाग्रण का,
महा शिवरात्रि भजन कीर्तन जन जाग्रण का!
बसंत ऋतु की बानगी शीत का शमन,
फाल्गुन की फुलवारी सुगंध चहक उठा चमन!
रंग बरंगी सुमन खिले बगिया बुलबुल बहके,
त़ोत़ा मीना तितली भंवरा चिड़िया चुलबुली चहके!
शिव पार्वती संग करे क्रीड़ा तांडव तमाशा,
अमर आराधना अर्चना प्रार्थना आरती चरण दासा!
शिव शक्ति भक्ति भावना भंडार भरे भोला,
गणेश कार्तिक ऋद्धि सिद्धि तृत्य नेत्र खोला!
डम डम बजे डमरू तन शमशान राख,
स्मर्ण चिंतन पवित्र ह्रदय बढ़े सुंदर साख !
‘कागा’ कमंडल रुद्राक्ष माला भांग धतुरा पान,
शिवालय भीड़ चढ़ावा प्रसाद दूध घ्रत पान !
प्यार पागल
हम नफ़स हम राह़ ग़म नहीं कोई,
हम रूह़ हम चाह ग़म नहीं कोई!
प्यार आग का दरिया उबल रहा हरदम,
हम नशीन हम ह़सीन ग़म नहीं कोई!
इश्क़ की ज़ात मज़हब दीन नहीं होता,
हम सफ़र हम साया ग़म नहीं कोई!
शम्मा जले रोशन करे सारा माह़ोल मंज़िर “
हम जिनस परवाने क़ुर्बान ग़म नहीं कोई!
इश्क़ ह़क़ीक़ी मिजाजी मजाज़ी आशिक़ माशूक़ आला,
हम चश्म अशक़ लबरेज़ ग़म नहीं कोई!
हम रूह जिस्म दो मिलना मुश्किल ‘कागा”
हम राज़ हम आग़ोश ग़म नहीं कोई!
शिवम सत्यम सुंदरम
शिव सत्य है प्राचीन काल से,
शिव सुंदर है आदि काल से !
शिव शम्भू नाथ बाबा भोले भंडारी ,
शिखा में बहती गंगा जटा धारी!
नंदी वाहन चंद्र चमके भाल भभूत ,
गले में भुजंग लिपटा अनादि अवधूत!
पार्वती संग बिराजे कार्तिक गणेश सुत्,
ऊमा वाहन सिंह नंदी शत्रु अदभुत!
कार्तिक मोर पर सवार गणेश मूसक,
परस्पर बेर भाव मोर नाग मूसक!
भस्मा-सुर ने किया तप कठोर,
वर मांग लिया वचन कठिन कठोर!
भस्मा-सुर बुद्धि भृष्ट विष्णु रक्षा,
माया जाल से उबारा विष्णु रक्षा!
हाथ में डमरू बिछोना मृग छाल,
शिव रात्रि जाग्रण जय महा काल !
विपरीत विचार एक रंग शिव माया,
‘कागा’ कलेश कल्ह नहीं शिव भाया!
मां शारदे स्तुति
जय मां शारदे वरदे वीणा वादनी,
हंस वाहिनी शारदे वरदे वीणा वादनी!
कर बद्ध अभिनंदन मनन मन से,
वंदन विधा भंडार भरदे वीणा वादनी!
स्तुति करें अंत्रात्मा चित्त चिंतन से,
नमन आराधना कल्याण करदे वीणा वादनी!
मुख में वाणी बन कर बसेरा,
मधुर रस धारा धरदे वीणा वादनी!
रोम रोम में रचना संजीवनी सरस्वती ,
अंग उमंग पीड़ा हरदे वीणा वादनी!
पापी लालची दर बदर भटके प्राणी,
ठोर नहीं ठिकाना घरदे वीणा वादनी!
गंगा गोमती त्रिवेणी की जल धारा,
आवग-गमन जाल कुतरदे वीणा वादनी!
गगन मंडल में गीत संगीत गूंज,
मंगल मूक को सुरदे वीणा वादनी!
तन बदन पर वस्त्र नहीं ‘कागा”
नग्न ढकने को चदरदे वीणा वादनी!
राहगीर
मैं राहगीर राह़ का जाना मुक़ाम तक ज़रूरी,
मैं राही राह का जाना अंजाम तक ज़रूरी!
राह बड़ी ऊबड़ खाबड़ गुज़र रही स़िह़रा से,
कांटा कंकर बिखरे पत्थर जाना अंजाम तक ज़रूरी!
अनजान अजनबी दूर दराज़ लम्बी राह वादियों वाली ,
ज़हरीले सांप जंगली जानवर जाना अंजाम तक ज़रूरी!
हम सफ़र नहीं कोई साथ अकेले चलना मुश्किल
गठरी सिर पर भारी जाना अंजाम तक ज़रूरी!
चोर डाकू लुटेरे पग पग पर ख़त़रा ख़ूब,
मुह़ाफ़ज़ नहीं माक़ूल इंचज़ाम जाना अंजाम तक ज़रूरी!
थका झुका रुका बिका नहीं कारवां नहीं ‘कागा”
मालिक मेहरबान निगाह बान जाना अंजाम तक ज़रूरी!
समाज सूरमा
समाज का सिर नीचे झुकने नहीं देना,
समाज की मुहिम पीछे रुकने नहीं देना!
समाज से बड़ा नहीं कोई बड़ा क़द्दावर,
समाज की हलचल पीछे रुकने नहीं देना!
समाज है जब आज है कल रहेगा,
समाज की रफ़्तार पीछे रुकने नहीं देना!
समाज एक दरख्त हम जड़ पत्ते टहनियां,
समाज का प्रवाह पीछे रुकने नहीं देना!
समाज की आवाज़ बुलंद करना बहुत ऊंची,
समाज का नारा पीछे रुकने नहीं देना!
लाली पाप देख लपक मत जाना ‘कागा’
समाज का कारवां पीछे रुकने नहीं देना!
ज़मीर
ग़रीब ज़िंदगी मंज़ूर ज़मीर बेचना तस्लीम नहींं,
फ़क़ीर ज़िंदगी मंज़ूर शऊर बेचना तस्लीम नहींं !
चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात ,
चंद ख़ुशी ख़ात़िर ईमान बेचना तस्लीम नहींं!
ज़माने की ज़ीनत देख फिसल जाते लोग,
चमक दमक में अरमान बेचना तस्लीम नहींं!
गगन चुम्बी ऊंची आलीशान इमारत शानो शोक़्त ,
झुग्गी झौपड़ी छपरा निशान बेचना तस्लीम नहींं!
रेश्मी मख़मली मलमल शेरवानी लिबास की ललक,
छलक रहा पैमाना जान बेचान तस्लीम नहींं!
इज़्ज़त आबरू अस्मत क सौदा नहीं ‘कागा”
ग़ैरत मंद का गुमान बेचना तस्लीम नहींं!
समाज सेवा
समाज एक विचार धारा अनेक नियत रख नेक,
आवाज़ एक विचार धारा अनेक विवेक रख नेक !
पीड़ा रख सेवा की बीड़ा उठा अपने सिर,
समय मिला सुहाना चला जायेगा नहीं लोटेगा फिर!
मानव जीवन मिला अनमोल सेवा का नहीं मोल ,
अपने लहु से सींच पत्थरों से नहीं तोल!
सेवा कर समाज की तन मन धन से,
मानव जीवन मिलना जग में दोबारा कठिन से !
ऊंधे मुंह लटक सिर पटक रहा था परेशान,
वादा कर वचन दिया था सेवा का अनजान!
‘कागा’ कर याद अपना कथन कर समाज सेवा,
बिना मांगे मिल जायेंगे मुफ़्त में मीठा मेवा!
नशा
शिक्षा युक्त हो हर परिवार,
नशा मुक़्त हो हर परिवार!
शिक्षा दीक्षा से होता उजाला,
नशा भिक्षा से निकलता दीवाला!
लिख पढ़ बनता इंसान नवाब,
पूरा करता ज़िंदगी का ख़्वाब!
शिक्षा से मिटता जीवन अंधियारा,
भिक्षा से होता बुद्धि अंधियारा!
नशा नाश की निशानी जान,
मंद बुद्धि अशुद्धि निशानी जान!
‘कागा’ नशा भिक्षा की जननी ,
छिन्न भिन्न करता परिवार छलनी!
मरने के बाद
कौन जाने क्या होगा मरने के बाद,
लोट नहीं आया कोई मरने के बाद!
स्वर्ग नर्क मन बहलाने डराने की बातें,
क्या होता है बेख़बर मरने के बाद!
नेकी कर साथ चलेगी बाक़ी सब यहां,
चर्चा होती रहेगी हरदम मरने के बाद!
निंदा ज़िंदा की होती है तारीफ़ कम,
प्रशंसा के पुल बांधते मरने के बाद!
मौत जैसी सच्चाई नहीं कोई जग में,
आभास होता है सबको मरने के बाद!
जब तक सांसें तब तक जीवन ‘कागा”
किसी को नहीं पता मरने के बाद!
ह़ुब अल वत़न
वत़न पर जान क़र्बान करने वालों का नाम होता है,
वत़न की ग़द्दारी करने वालों का नाम बदनाम होता है !
सर फ़रोशी की तमना रख वत़न हमारा जान से प्यारा,
बुरी नज़र वालोऔ का मुंह काला स़ुबह़ शाम होता है!
हम जान हथेली पर रख जान की बाज़ी लगा देंगे ,
आंच नहीं आने देंगे ज़रा मुकमल मुत़ालबा पैग़ाम होता है!
पतंगे जलते शम्मा पर मर मिटने को तैयार होते हरदम,
हम मुह़ाफ़िज़ मुल्क के शहीद होना इरादा अंजाम होता है !
मुल्क की मिट्टी में पैदा हुए मक़स़द ख़ाक हो जाना,
आबो-हवा में ज़िंदगी बसर आख़िर तक क़्याम होता है !
ख़ून खोलता ख़ूब वत़न की ह़िफ़ाज़त करें जान से ‘कागा”
वत़न पर फ़िदा होने वाले जुगनुओं का एह़तराम होता है!
आईना
हां मैं आईना हूं हरदम सच्च बोलता हूं ,
लहज़े में लचक नहीं ज़रा सच्च बोलता हूं!
शीशा स़ाफ़ शफ़ाफ़ चमक दमक मगर चापलूस नहीं,
पोशीदा संजीदा रंजीदा मुख़फ़ी राज़ नाज़ खोलता हूं!
लाग-लपेट खुसर -फुसर काना-फूसी कंजूसी नहीं ,
बेबाक बुलंद स़ाफ़-गोई बेख़ोफ़ बन डोलता हूं!
जिस्म मेरा दुबला पतला मगर कायर कमज़ोर नहीं,
तराज़ू बन तक़दीर का बराबर वज़न तोलता हूं!
चुग़ल चोर मुफ़्त ख़ोर रिश्वत ख़ोर नहीं मिज़ाज,
छान-बीन कर सच्च झूठ को टटोलता हूं!
बा-ज़मीर बा-शऊर नज़र नज़रिया अल्हदा अंदाज़ ‘कागा”
झांक कर देखो मेरा गिरेबान हूबहू बोलता हूं !
वत़न
वत़न हमारा जान से प्यारा,
वत़न हमारा दिल का दुलारा!
चमन गुलशन बाग़ बग़ीचा गुलस्तन,
फूल कांटे कलियां हरियाली रेगस्तान!
भंवरे बुलबुल तितलियां त़ोत़ा मीना,
चहक जाती चिड़िया महक ह़सीना!
पहाड़ पठार झरने नदियां तालाब,
सूखा भूखा प्यासा लबालब सेलाब!
किसान कामगार जवान खेत खलियान,
झूमता नाचता जशन मनाता इंसान!
पशु पक्षी नर नारी किन्नर ,
ख़ुश उछल कूद करता वानर !
अमीर फ़क़ीर फक्कड़ मलंग मस्त,
ग़रीब ग़ुरबा हा़ल ख़ुशह़ाल दुरस्त!
प्राणों से प्यारा मुल्क हमारा,
आबाद शादाब दिलो दिमाग़ हमारा!
‘कागा’ मोर नाचे बादल बरसे,
भीगा तन बदन तड़पे तरसे!
अंधेर नगरी
जहां बेदर्द ह़ाकम हो वहां फ़रियाद क्या करना,
जहां क़ायदा क़ानून नहीं वहां फ़रियाद क्या करना!
दिन दिहाड़े क़तल होते सरे आम ज़ोरी ज़ना,
जहां लूट खसोट होती वहां फ़रियाद क्या करना!
चोरी सीना ज़ोरी ताना शाही ज़ुल्म सितम ज़बरदस्ती,
जहां रिश्वत ख़ोर निज़ाम वहां फ़रियाद क्या करना!
क़ाज़ी क़ातिल ग़ुंडे गवाह कांच शीशे की अदालत,
जहां पत्थर बने वकील वहां फ़रियाद क्या करना!
वो ख़ाक ह़िफ़ाज़त करेंगे हमारी ख़ुद ख़त़रा जान,
जहां चौकीदार चोर लुटेरे वहां फ़रियाद क्या करना!
अदल इंस़ाफ़ नहीं मिलता कोर्ट कचहरी में ‘कागा’
जहां पैशी दर पैशी वहां फ़रियाद क्या करना!
मानसिक गुलाम
देश आज़ाद हुआ मानसिक ग़लामी शेष है,
देश आबाद हुआ मानसिक गुलामी शेष है!
सालों पेहले पराधीन जीवन बिताया बंधन में,
हाथों मे हथकड़ियां जकड़ी ज़ंजीरें बंधन में!
पैरों में बेड़िया बंधी चलना फिरना कठिन,
संगीनों के साये में गिरफ़्तार जीना कठिन!
गौरे चले गये छोड़ कालों का क़हर,
दबंगों का दमन जारी जीवन बना ज़हर!
धर्म मज़हब जाति का झगड़ रगड़ा लफ़ड़ा ,
आरक्षण भक्षण संरक्षण का अगड़ा पिछड़ा लफड़ा!
ऊंच नीच भेद भाव मन मटाव अलगाव,
छूआ छूत का भूत भंयकर भारी अलगाव!
फ़िरश्ता बन आया बाबा भीम राव अम्बेडकर,
संविधान निर्माता बन आया एक अवतार अम्बेडकर!
बहुजन समाज को मानव बनाया झटके में,
पशु जीवन से बचाया एक झटके में!
शिक्षा दीक्षा का अमृत पिलाया गंगा जल,
रक्षा का कवच पहना सुरक्षित किया अटल!
मताधिकार का मुखोटा मोर मुक्ट सिर पर,
शक्ति भक्ति युक्ति मुक्ति मुक्ट सिर पर!
आज़ादी का अर्स़ा लम्बा गुज़रा गुंजाईश बाक़ी,
सफल नहीं अपने मक़्स़द में वर्दी ख़ाकी!
आये दिन होते अत्याचार व्यभिचार दबाव दमन,
लड़खड़ा जाती व्यस्था छिन्न भिन्न होता अमन!
‘कागा’ करते काले कर्तूत बच जाते स़ाफ़ ,
मारे जाते ग़रीब जो होते पाक स़ाफ़!
बुरी नियत
कोई नहीं बुरा नियत बुरी होती है,
सौच कर देखा नियत बुरी होती है!
सब हंस नहीं होते नहीं सब बगुला,
दोनों रंग सफ़ेद नियत बुरी होती है!
दोनों बेठ समुंदर किनारे करते खान पान,
बगुला झपटे मछली नियत बुरी होती हैं!
आंखें मूंंद बन ढौंगी भगत रहता मौन,
करता विश्वास घात नियत बुरी होती है!
शिकारी डाल जाल में खाने की चीज़,
पकड़ लेता जानवर नियत बुरी होती है
धर्म जाति ऊंच नीच नहीं कोई ‘कागा”
नीति में खोट नियत बुरी होती है!
महा पापी
घर मंदिर मठ मढ़ी गुरुद्वारा स्तूप,
घर स्वर्ग नर्क संतान कपूत सपूत !
मात पिता की सेवा बड़ा धर्म ,
सु़बह शाम कर सेवा बड़ा कर्म!
गंगा यमुना माता पिता के चर्ण ,
बहती सरस्वती धारा स्पर्श करो चर्ण!
अड़सठ तीर्थ माता पिता की शरण ,
फेरी लगाओ चारों रख शुद्ध आचरण!
माता पिता व्रद्ध आश्रम में छोड़ा,
नहाये कुंभ महा पाप नाता जोड़ा!
‘कागा’ कलंक मिटे नहीं कुटंब का,
करो श्राद्ध पिंड दान कुटंब का!
माता पिता
माता की ममता का मोल नहीं जग में,
पिता की क्षमता का मोल नहीं जग में!
ममता क्षमता दोंनों अनमोल बड़ी बेश-क़ीमती सौग़ात ,
बिकती नहीं हाट बज़ार मोल नहीं जग में!
माता की कोख में नो मह बिताये बेख़बर,
बोझ बन बेबस बेक़रार मोल नहीं जग में!
माता ने पिलाया गाढ़ा दूध छाती निचोड़ अपनी,
गोद में ज्ञान दिया मोल नहीं जग में!
चंदा मामा के दर्शन करये आंचल ओट में ,
घुटी पिलाई छट्ठी मनाई मोल नहीं जग में!
बुरी नज़र बचाया लगाये काला टीका चेहरे पर,
उंगली पकड़ चलना सिखाया मोल नहीं जग में!
दांत निकले दलिया खिलाया पिलाया पानी छान कर ,
तोतला बोल बोलना सिखाया मोल नहीं जग में!
मल मूत्र पोतड़े धोये हर बार मन मुस्काये ,
गीले सोई सूखे सुलाया मोल नहीं जग में!
पिता ने पसीने से लथ पथ किया गुज़ारा,
खान पान का प्रबंध मोल नहीं जग में!
पीठ बिठा बना घोड़ा घर में घूम झूम,
हर कौना चूम दिखाया मोल नहीं जग में!
माता ने कमर तक उठाया गोद में ‘कागा”
पिता ने कंधों चढ़ाया मोल नहीं जग में!
दिल ए दास्तान
हर इंसान का दिल एक जेसा हड्डी नहीं होती,
फिर भी कोमल पत्थर मोम होता हड्डी नहीं होती!
पिघल जाता देख पीड़ा पराई बिलखता कराहता कष्ट में,
मौम की तरह जल बल कर हड्डी नहीं होती!
चीर कर देख लिया चुल्लु भर लहु नहीं निकला ,
हो जाते लथ-पथ नैन हड्डी नहीं होती!
प्यार नफ़रत की खान ख़ज़ाना ज़ीनत मोह़ब्बत स़ोह़ब्बत का,
उछल कूद करता मचल जाता हड्डी नहीं होती!
प्यार में पिस जाता जेसे अन्न में मिली घुन ,
अक्स नज़र आता आंखों में हड्डी नहीं होती!
जब भर जाती नफ़रत किसी कोने में घुस ‘कागा”
पत्थर बन करता दंंगा पंगा हड्डी नहीं होती!
प्रेम पूजा
जीवन में प्यार अस़ल श्रृंगार बाक़ी सब बेकार,
जीवन में प्यार अस़ल संसार बाक़ी सब बेकार !
तन बदन ढकने को मख़मल मलमल रेशमी लिबास ,
मंगल सूत्र मोती जड़ित हार बाक़ी सब बेकार!
आंखों में काजल हाथों पर रची महेंदी लाल,
मृग नैन मोरनी चाल लचकदार बाक़ी सब बेकार!
गोरे गाल काले बाल घूंघट में सिमट चली ,
पग पायल करे घायल झंकार बाक़ी सब बेकार!
नाक नथ कानों में झूमर चोटी गूंथा गजरा,
मन मोहनी संग सहेलियां नार बाक़ी सब बेकार!
बसंत ऋतु में बावरी पीली सरसूं शोभित ‘कागा”
पिया पपिहा करते प्रेम पुकार बाक़ी सब बेकार!
दोहरा-चरित्र
आदमी का दुश्मन आदमी रास्ता काटता है,
बिल्ली बेवजह बदनाम आदमी रास्ता काटता है!
ईर्ष्या करता आर-पार बराबरी नहीं होती ,
बुराई करता बार-बार बराबरी नहीं होती!
टांग खिचाई करता आती लड़ाई की नोबत,
दोस्ती दुश्मनी में बदल लड़ाई की नोबत!
मेहनत ख़ुद करता नहीं करने देता दोगला,
करता ख़ुशामद काना -फूसी दग़ा बाज़ दोगला!
चुग़ल चाल बाज़ धोखे बाज़ जिनकी फ़ित़रत,
नीचा गिराने गिला शिक्वा करना जिनकी फ़ित़रत!
‘कागा’ करता घाल मेल घूस घपला घोटाला ,
ढौंग पाखंड करता गले में रुद्राक्ष माला !
अच्छे दिन
अच्छे दिन आये कोई ख़ोफ़ ख़त़रा नहीं,
जनता मन भाये कोई ख़ोफ़ ख़त़रा नहीं!
सिर काट ले जाते थे सीमा पार,
अब अमनो अमान कोई ख़ोफ़ ख़त़रा नहीं!
आतंक का अंत दहश्त गर्द हुए ग़ायब,
अब नही नुक़स़ान कोई ख़ोफ़ ख़त़रा नहीं!
हर रोज़ होती थी पत्थर बाज़ी भरपूर,
मिल गई निजात कोई ख़ोफ़ ख़त़रा नहीं!
करोड़ों श्रद्धालुओं ने कुंभ नहाया शांति से,
प्रयाग संगम घाट कोई ख़ोफ़ ख़त़रा नहीं!
काले बादल आसमान से छट गये ‘कागा”
लोट आई ख़ुशियां कोई ख़ोफ़ ख़त़रा नहीं!
दीवानगी
दिल दे दिया दिलरुबा को जान बाक़ी है ,
जिगर दे दिया दिलरुबा को जान बाक़ी है!
दिल का दर्द दिल जाने दिलबर क्या जाने ,
बेकस बेबस बन बेठे है जान बाक़ी है !
देख राहें भरते आहें फेला बांहें नूरानी निगाहें,
होशो ह़वास फुर्र हो गया जान बाक़ी है!
विस़ाल की आरज़ू मेरी जुस्तजू गुफ़तगू की स़नम,
ख़्वाहिश ख़त्म नहीं होती बदगुमान जान बाक़ी है!
फ़िज़ाओं में रूह़ रोता मेरा चीख़ चिल्ला कर,
बेख़बर मेरा हम सफ़र नादान जान बाक़ी है!
गली कूचे से गुज़रना नामुमकिन हो गया ‘कागा”
क़दम दर क़दम पर्दा पेहरा जान बाक़ी है!
चरित्र
चाल चेहरा चित्र चरित्र पवित्र रख,
नाक कान नेत्र भीतर पवित्र रख!
मन मेला तन उजला जैसे बगुला,
आंख मूंद गटके मछली जेसे बगुला !
तन बदन को करता मलमल स़ाफ़,
सरोवर नहाने से नहीं पाप माफ़!
नियत नीति नेक रख विवेक उत्तम ,
काम लोभ से दूर आचरण उत्तम !
अधूरी अपूर्ण बुद्धि करती मन मलीन,
ज्ञान गगरी छलकत जब मन मलीन!
‘कागा’ बोल कड़वा मधुर वाणी कोयल,
लेन देन नहीं काली कलोटी कोयल!
जय श्रीराम
राम का नाम जप कर तप तन मन से,
निश दिन क्षण पल कर तप तन मन से!
प्राण अपान रोम रोम में अंग तरंग में राम,
पलक झपक टपक रहे आंसू की बूंद में राम!
नेत्र नासा कर्ण रसना स्पर्श होता भृकूटी भाल में,
अष्ठ कमल में खोज बीन कर काल कपाल में !
राम नाम रट घट भीतर वन उप वन वृथा,
कर बंद अपने चक्षु बन भिक्षु ढौंग पाखंड वृथा!
राम निज अनह़द जीव जंतु कोशिका राम रूप आत्मा,
कण कण में बसे परम परमेश्वर पूर्ण अमर आत्मा !
अणु परमाणु अनंत रज रति गंध सुगंध दुर्गंध में,
निद्रा क्षुधा तिरष्णा काम वासना भाव भावना छंद में!
‘कागा” काला गोरा सांवला इंद्र धनुषी सप्त रंग साकार,
सत रज तम गुण में व्यापे रूप निरंजन निराकार!
सनातन संस्कृति
सनातन संस्कृति प्राचीन परम्परा करो सहर्ष सम्मान,
मानव का धर्म मानवता करो सहर्ष सम्मान!
वर्ण व्यवस्था ने बांट कर दिया बंटाधार,
छूआ छूत छोड़ छाड़ करो सहर्ष सम्मान!
बिखर कर पराधीन बने पराये मलेछों के,
भेद भाव भूल सारा करो सहर्ष सम्मान!
बहिष्कार किया अपने सगे संबंधी भाईयों का,
जात पात बंधन तोड़ो करो सहर्ष सम्मान!
काम धंधा हुनर अनोखा अपनों का सुंदर,
मोईन दड़ो हड़पा हमारा करो सहर्ष सम्मान!
सिंधु सरोवर का जल पिया अमृत धारा,
सिंधी सभ्यता संस्कृति जीवित करो सहर्ष सम्मान!
खुदाई पर मिला एकता अखंडता का अवशेष,
मंदिर मूर्ति नंदी निशान करो सहर्ष सम्मान!
ब्रह्मा विष्णु महेश की होती स्तुति आराधना ,
सरस्वती लक्ष्मी ऊमा का करो सहर्ष सम्मान!
देव दयीत्य के मध्य होता वाद विवाद,
‘कागा’ करते संघर्ष संग्राम करो सहर्ष सम्मान!
होली
आओ मिल जुल नफ़रत की होली जलायें ,
आओ घुल मिल नफ़रत की होली जलायें!
धर्म जाति की घुन घुसी मानवता खोखली,
आओ हंस खिल नफ़रत की होली जलायें!
ईर्ष्या की आग लगी मानव जीवन में,
आओ कूद उछल नफ़रत की होली जलायें!
दीमक लगी हीन भावना की चाट रही ,
आओ उथल पुथल नफ़रत की होली जलायें!
कम्मी उजागर करते सफल व्यक्ति में नक्कमे,
आओ आगे चल नफ़रत की होली जलायें!
ग़रीब की गिला करते अमीर की चापलूसी,
आओ पल पल नफ़रत की होली जलायें!
अबला नार पर अत्याचार नीति संगत नहीं,
आओ मन मचल नफ़रत की होली जलायें!
होली के हुडदंग में बद रंग ‘कागा”
आओ छोड़ नक़ल नफ़रत की होली जलायें!
होली का हुड़दंग
मचा होली का हुडदंग आई होली बड़- बोली ,
रचा होली का रंग आई होली बड़-बोली!
होली बड़ी भोली संग गोद प्रह्लाद हम जोली,
जले अंगार भरी उमंग जल जाये पतंग टोली !
भूआ भतीजा का नतीजा बचा प्रह्लाद जली होली !
बजे मोर चंग मृदंग सजाई घर आंगन रंगोली !
जची टाबर टोली रंग खेलें संग सखी सहेली,
गोरी घूंघट में घूमे झूमे भीग़ी चूनर चोली !
पणिहारी पाणी भरे पनघट पग घुंघरू चमक चमेली,
फागुन गाते फाग नाचे मोर ढोल बजाये ढोली!
‘कागा” रखे व्रत पति वृत दुल्हन नई नवेली,
नया रंग रूप रस धारा फूलों भरी झोली!
प्यास आग
लगी प्यास प्यार की बुझती नहीं,
जली आग प्यार की बुझती नहीं!
सुलग रही सीने मे़ बन चिंगारी ,
ज्वाला बन भभक रही बुझती नहीं!
आंखों में आंसू पलकें छलक पड़ी,
उफ़ान पर फफक रही बुझती नहीं!
दिल चाहता लिपट जायें दिल से,
जेसे बिजली चमक रही बुझती नहीं!
बिन बादल बूंदें बरसी रिम झिम,
दर्द बन दमक रही बुझती नहीं!
ज़ुल्फ़ो की ज़ंजीर में जकड़ कर,
रंग रुख़सार टपक रहे बुझती नहीं!
चमन में चिड़ियां तोता मीना ‘कागा”
बुलबुल भंवरा बहक रहे बुझती नहीं!
समाज सेवा
समाज की सेवा कर बंदे मेवा मिलेगा,
आज अभी सेवा कर बंदे मेवा मिलेगा!
जब तक जान जिस्म में सेवा कर,
जी जान से सेवा कर मेवा मिलेगा!
अबोझ अनाथ अनाड़ी को शिक्षा दान कर,
दया दृष्टि से सेवा कर मेवा मिलेगा!
धन दोलत से दूर ग़रीब ग़ैरत मंद,
धन सहयोग से सेवा कर मेवा मिलेगा!
बच्चे बिलख रहे भूख से सन्नाटा पसरा,
चूल्हा जले एसी सेवा कर मेवा मिलेगा!
तन बदन नंगा पैरों में खड़ाऊ नहीं,
अंग वस्त्र की सेवा कर मेवा मिलेगा!
पेट पापी का सवाल कर सहयोग ‘कागा”
जल भोजन बांट सेवा कर मेवा मिलेगा!
जन सेवक
सेवक हूं सेवा मेरा काम राजनीति नहीं करता,
लेखक हूं लिखना मेरा काम राजनीति नहीं करता !
कोई ठिकाना नहीं दर दर की खाई ठोकरें ,
आया अकेला चला जाऊंगा अकेला खाई ठोकरें!
पेदा हुआ माज़ूर मजबूर मोहताज था मां का,
मिला प्यार दुलार आशीष सहारा सत्कार मां का!
बाप ने शिक्षा दिलाई बनाया बलवान दुनिया में,
मिली शानो शोक्त शहोरत इज़्ज़त आबरू दुनिया मे़!
जन सेवक बन सेवा की जनता की हरदम,
कोई कोर कसर नहीं छोड़ी मन से हरदम!
रोते के आंसू पूंछे आंखों से बहते गिरते,
ह़ाल चाल पूंछे पीड़ित ग़रीबों के चलते फिरते !
अकाल सुकाल गर्मी सर्दी बीमारी में बेहा़ल के,
किया दवा मरहम पट्टी का प्रबंध बेह़ाल के!
मां बाप का साया हटा सिर से अचानक,
लावारिस बन लटक गये अधर-झूल में अचानक!
नहीं कोई धणी धोरी जन्म भूमि छुट गई ,
घर के नहीं घाट के क़िस्मत फूट गई!
मां- बाप की दुआऐं भाग्य विधाता बनकर आई ,
घर आंगन में दोबारा फूल खिले ख़ुशियां छाई !
धर्म-पत्नि प्रधान बनी प्रथम महिला चौहटन में,
‘कागा’ निर्विचित हुआ विधायक विस्थापित पहला चोहटन मे़!
नया दौर
नया दौर नफ़रत भरा ज़हर घोल रहे है,
नया शौर नफ़रत भरा ज़हर घोल रहे है!
इंसान दुश्मन इंसान का नीचा दिखाने में लगा,
अपनी ख़त़ा पराये सिर ज़हर घोल रहे है!
धर्म मज़हब का झगड़ा रगड़ा फ़िज़ा बदल गई,
अक़ीदत इबादत का फ़र्क़ ज़हर घोल रहे है!
ज़ात पात ऊंच नीच भेद भव छूआ छूत,
गै़र बराबरी का सलूक ज़हर घोल रहे है!
राजनीति के रंग रूप ढंग संग में बनावट,
बंदर बांट का नमूना ज़हर घोल रहे है!
अस़ल नस्ल उजड़ गया नामो निशान नहीं ‘कागा”
क़लई परत खुल गई ज़हर घोल रहे है
प्रेम रस
काया कोमल नैन निर्मल चित्त चंचल मन पावन ,
हिरनी जैसी चाल भंवरे जैसे बाल मन भावन!
बरसे मेघ मल्हार बूंदों की फूहार मास सावन,
तीज त्यौहार झूला झूले संग सखी सहेलियां सुहागन!
सज धज गोरी चली पिया घर मुस्काए मन!
जिया जले तड़पे तन तेज होती दिल धड़कन !
लाली लाल लब्बों पर ललाट बिंदिया चमके चंदन!
मांग भरी सिंदुर नाक नथ मणि काया कंचन !
गाल लाल गुलाब फुलवारी खिले फूल करे वंदन,
तितली बुलबुल त़ोता मीना करते गूंज गहरी गुंजन!
‘कागा’ कोयल करे कूह कूह रूह मनो-रंजन
राधा गोरी कृष्ण काला मीरा का मन मोहन!
हिचकियां
अपनों को याद आना करना हिचकियां आती हैं ,
अपनों की याद सताना तड़पना हिचकियां आती है!
बच्चपन में साथ खेले बिखर गये इधर उधर,
वक़्त के थपेड़ों का बिछोड़ा हिचकियां आती है!
देश छोड़ प्रदेश चले गये सात समुंदर पार,
दिलों में बसे दिल बेक़रार हिचकियां आती है !
ख़ुशामद करते मत़लबी ख़ुद ग़र्ज़ की ख़ात़िर खूब,
मददगार बन मदद करने में हिचकियां आती है!
दुनिया छोड़ चले हमारी नज़रों के सामने अपने,
क़ुदरत का कहर मजबूर मंज़ूर हिचकियां आती है !
बेबाक बोल डोलना आसान नहीं ह़ोस़ला की दरकार,
स़ाफ़ गोई से पैश आना हिचकियां आती है!
इश्क़
इश्क़ बपोती नहींं किसी की सबको होता है,
जिसके सीने में दिल मौजूद सबको होता है!
कोई सिसक सुबक दुबक रह जाता गोशे में ,
दिल रोती दर्द भरी दास्तान सबको होता है !
कोई करता इज़हार लेलां मजनू हीर रांझा जैसे,
कोई करता अपनी जान क़ुर्बान सबको होता है!
आग दोनो सीनों में सुलग हम रूह़ होते,
बुझती नहीं आ़शिक़ माशूक़ पहचान सबको होता है!
इश्क़ रूह़ानी ह़क़ीक़ी मिज़ाजी मजाज़ी सबका एक त़रीक़ा,
इश्क़ मे़ होता अस़ल इम्तिहान सबको होता है!
इश्क़ में आते अशक़ आंखों में लबालब ‘कागा”
दिल मिलने को होता पशेमान सबको होता है!
महंगाई -दबंगाई
महंगाई की मज़बूत मार ग़रीब कहां जायें,
दबंगाई का दौर दमदार ग़रीब कहां जायें!
दाल आटा चावल मिर्च नमक धनिया हल्दी,
मिलावट की भर मार ग़रीब कहां जायें!
पेट धंस गया पसलियां पीठ से चिपकी,
पहना पेहरन तार तार ग़रीब कहां जायें!
नंगा बदन लंगोटी में लिपटा लहंगा महंगा,
चोली ओढनी आर पार ग़रीब कहां जायें!
सिर ढकने को छत्त छपरा नहीं नस़ीब,
किस को करें पुकार ग़रीब कहां जायें!
ग़रीबी में गीला आटा बनाई जाती राबड़ी,
रोटी वास्ते मचती रार ग़रीब कहां जायें!
कूड़ा बीनते कंगाली में बच्चे भूखे प्यासे,
बिलख रोते ज़ार ज़ार ग़रीब कहां जायें!
कटोरा थाम हाथों में बन जाते भिखारी,
भीख की करते गुहार ग़रीब कहां जायें!
घुमंतु बन घूमते चूमते हर चोखट चोपाल,
पड़ती डांट झपट फटकार ग़रीब कहां जायें!
ग़रीबों का कोई धणी धोरी नहीं धनवान,
वोटों का होता व्यपार ग़रीब कहां जायें !
अमीर ग़रीब की खाई चौड़ी मिटती नहीं,
चाहे कोई आये सरकार ग़रीब कहां जायें!
वादा दावा करते झुक सलाम मत़लबी ‘कागा”
अब उठ गया एतबार ग़रीब कहां जायें!
ऊंच नीच
दर्द दोनों का बराबर अमीर हो चाहे ग़रीब ,
चोट पर चीख होती अमीर हो चाहे ग़रीब !
भूख प्यास से प्राणी तड़प जाता होता बेह़ाल ,
अन्न जल देता शांति अमीर हो चाहे ग़रीब !
नींद सताये थकान पर सेठ किसान मज़दूर को ,
जम्हाई आती बार बार अमीर हो चाहे ग़रीब!
दो आंख कान हाथ पैर नथुनी एक नाक,
देखना सुनना पकड़ना चलना अमीर हो चाहे ग़रीब!
सूंघना सांस लेना समान एक मुख तालु ज़ुबान,
बोलना स्वाद चखना समान अमीर हो चाहे ग़रीब!
हृदय में नहींं होती हड्डी तन अस्धि पंजर ,
बहती लाल रक्त धारा अमीर हो चाहे ग़रीब!
रज वीर्य मल मूत्र लार पसीना अश्रु धारा ,
जीवन जीने का जुगाड़ अमीर हो चाहे ग़रीब!
मालिक ने मानव बनाया मानव बना हिंदू मुस्लिम,
सिख ईसाई बोध जैन अमीर हो चाहे ग़रीब!
जल थल अगन गगन वायु का धर्म नहीं ,
‘कागा” जाति मानव की अमीर हो चाहे ग़रीब!
अजब गज़ब
एक मिट्टी का पुतला ब्रह्मण क्षत्रीय वैश्य शूदर,
ऊंच नीच नहीं सब समान सांप छिपकली छछुंदर
!जैसा गुण वेसी जाति जैसा तुख़्म वेसी तास़ीर,
कोई काला कोई गौरा कोई भौंडा कोई सुंदर!
सबका तन हाड मांस का बहती रक्त धारा,
सबका मालिक एक बसता मन मष्तिक के अंदर!
हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई जैन बोध यहूदी पारसी
कोई बनाता चर्च गुरुद्वारे स्तूप कोई मस्जिद मंदिर!
कोई करे पैड़ पौधों की पूजा तुलसी पीपल,
कोई अग्नि वायु जल कोई सूरज सितारे चंद्र!
कोई बंदगी करे कैलाश पर्वत शिव पार्वती की,
कोई गंगा यमुना सरस्वती प्राग राज नहाता समुंदर!
कोई दिखाये कठपुतली का खेल उंगलियों पर ‘कागा”
बाजीगर अपनी बाज़ी का खेल नचाये बेबस बंदर!
मां ममता
धनवान के घर शिशु जन्म लेता रोता हुआ,
दीन के घर शिशु जन्म लेता रोता हुआ!
रज वीर्य के मिश्रण से होता मानव उत्पन्न,
जीव जंतु पशु पक्षी करती प्रकृति उत्पन्न!
भोग विलास की माया दो काया का मिलन,
काम वासना की तृपति नर नारी का मिलन!
नौ माह पलता जीव मां की कोख में ,
रक्त मूत्र में लथपथ मां की कोख में !
नाभि नाल से मिलता रस निचोड़े नाड़ी संचार,
जेसा अन्न वेसा मन होता शरीर में संचार !
प्रथम होता पुतला रक्त का लोथड़ा बिना हाड़,
धीमे धीरे बन जाता हृदय अंग बिना हाड़!
भूख से बिलबिला रोता नैन मूंद होंठ हिलते,
बिना दांत मुख पोपला जीभ लाल होंठ हिलते!
कहते गुंजी किलकारी घर आंगन में सजी रंगोली,
कन्या पर छाज बजी पुत्र पर धनाधन थाली!
शिशु रोया मां मुस्काई मन मगन नैनों चमक,
लपक लिपट ललचाई निरख मुखड़ा दर्शन प्रसन्न दमक!
प्रसव पीड़ा भूली फूलों नहीं समाई देख संतान,
आलंगन किया आनंद भया सीने लगा अपना संतान!
स्तन खोल अपना पिलाया दूधा स्नेह प्रेम से ,
चूम चेहरा झूम उठी गोद भली प्रेम से!
‘कागा’ कोख सरीखा सुख नहीं कोई जग मे़,
सांपों को भी प्यारी होती संतान जग में !
हार-जीत
हार जीत एक सिक्के के दो पेहलू ,
घ्रणा प्रीत एक सिक्के के दो पेहलू !
मनो-बल ऊंचा रख ख़ुशी ग़मी में ,
नियत नीति एक सिक्के के दो पेहलू!
आह भरते गहरी जब चोट लगती ज़ोर ,
आह वाह एक सिक्के के दो पेहलू!
वाह वाह होती जब होती जीत हमारी,
ताली गाली एक सिक्के के दो पेहलू!
जीत पर जशन हार पर मातम मनाते,
जशन मातम एक सिक्के के पेहलू!
सुरज उगता उजाला होता ढलने पर अंधेरा,
उजाला अंधेरा एक सिक्के के दो पेहलू!
कृष्ण काला राधा गोरी प्रेम अनंत ‘कागा”
काला गोरा एक सिक्के के दो पेहलू!
शिष्टाचार
भृष्टाचार बन गया शिष्टाचार हम कहां जायें,
अत्याचार बन गया शिष्टाचार हम कहां जायें!
ग़रीब का जीवन जीना हुआ मुश्किल मुह़ाल,
दुराचार बन गया शिष्टाचार हम कहां जायें!
किसान कंगाली की कगार पर बड़ा ग़मगीन,
दुर्व्यवहार बन गया शिष्टाचार हम कहां जायें!
बहिन बेटियां सुरक्षित नहीं अपने घरों मेंं,
बलात्कार बन गया शिष्टाचार हम कहां जायें!
मज़दूर कामगार को नहीं मिलती मज़दूरी मुनासब,
बेगार बन गई शिष्टाचार हम कहां जायें!
कुंऐं में घोली भांग पीते एक पानी ,
बेरोज़गार बन गया शिष्टाचार हम कहां जायें!
अड़ोस पड़ोस रिश्ते नाते भृष्टाचार की भेंट,
गुनाहगार बन गया शिष्टाचार हम कहां जायें!
बिचोलिये बन करते दलाली लेन देन लफ़ंगे,
तकरार बन गया शिष्टाचार हम कहां जायें!
संस्कार सभ्यता संस्कृति का नामो निशान नहीं,
अपचार बन गया शिष्टाचार हम कहां जायें!
रक्त के रिश्ते दरहम बरहम नेस्तो नाबूद,
व्यभिचार बन गया शिष्टाचार हम कहां जायें!
मां बाप से मन मुटाव ससुराल साझा,
बेकार बन गया शिष्टाचार हम कहां जायें!
बहिन भाई बुरे साला साली सगा प्रेमी ,
उधार बन गया शिष्टाचार हम कहां जायें!
ग़रीब ग़ुरबा हा़ल तक ग़ैरत मंद ‘कागा”
शाहूकार बन गया शिष्टाचार हम कहां जायें
पारखी
भजन कीर्तन भेड़ क्या जाने तार तंदूरे की,
बीन धुन भैंस क्या जाने तार तंदूरे की!
तिलक चंदन कुमकुम भाल पर शोभा देता सुंदर ,
अदरक स्वाद बंदर क्या जाने तार तंदूरे की!
चम्पा फूल खिला गहरी गंध महका घर आंगन ,
भंवरा नहीं आये निक्ट जाने तार तंदूरे की!
गधा खाये मिश्री मर जाये तड़प लोट पोट ,
चंदन रस मधु नहीं जाने तार तंदूरे की!
कुत्ते को ह़ज़म नहीं होता घी गाय का ,
नाबीन को आईना केसा जाने तार तंदूरे की!
जहां नहीं पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि ‘कागा”
जिन खोजा उसने पाया जाने तार तंदूरे की!
समीक्षा
क्या खोया क्या पाया करो अपनी समीक्षा,
अपने गिरेबान में झांक करो अपनी परीक्षा!
मानव जीवन मिला अनमोल हीरा माणक रतन ,
पत्थर बदले बिक नहीं जाये करो जतन!
समाज सेवा एक बहता दरिया गहरा पानी,
डुबकी लगा मोती खोजें गौ़ता़ भीतर पानी !
लहरें गिनने का लाभ क्या बेठे किनारे,
छलांग मार कूद पड़ें छोड़ उठें किनारें!
राजनीति के रंग मंच पर चलते मोहरे,
खेल शतरंज का दाव पेच चलते दोहरे!
लेखा जोखा स़ाफ़ नहीं मत दान किया,
पहचान नहीं नादान निकला मत दान किया!
चयन किया चाल बाज़ दग़ा बाज़ का,
सिर पीट रहे चयन धोखे बाज़ का!
‘कागा’ कुल्हाड़ी मारीअपने हाथों पैरों पर,
पछता रहे कर बेठे भरोसा ग़ैरों पर !
मानव जीवन
इच्छाएं अनंत शांत नहीं होती अंतिम सांसों तक,
आकांक्षाएं जाग्रत शांत नहीं होती अंतिम सांसों तक!
पांच तत्व पुतला जल थल अगन गगन पवन ,,
रूप रस गंध शब्द स्पर्श अंतिम सांसों तक!
तीन गुण रजो तमो सतो संग पच्चीस प्रकृति,
काम क्रोध लोभ मोह अहंकार अंतिम सांसों तक!
पांच ज्ञान इंद्रियां नासा चक्षु कर्ण रसना चर्म ,
क्षुधा तिरष्णा निद्रा वासना भावना अंतिम सांसों तक!
नौ द्वार का महल भीतर जीव आत्मा बिराजित ,
आवा-गमन हर पल घड़ी अंतिम सांसों तक!
रज वीर्य मेलाप रचना बनाई काया माया ‘कागा”
हाड मांस रक्त नाड़ी संचार अंतिम सांसों तक!
मन चंगा
मन चंगा तो कठोती में गंगा ,
नहीं पंगा दंगा कठोती में गंगा!
मिटा नहीं मन का मेल मलीन,
नहाये नीर निर्मल कठोती में गंगा !
संत रविदास फेरे माला मन की,
हर घड़ी पल कठोती में गंगा!
मछली मगर मछ जल चर जीव,
कीचड़ उगता कमल कठोती में गंगा !
मात पिता के चरणों में त्रिवेणी,
संगम घाट अटल कठोती में गंगा!
ढौंग पाखंड आडम्बर पौंगा पंथी परम्परा,
करते कपट छल कठोती में गंगा!
एक बूंद की माया काया ‘कागा”
रज वीर्य जल कठोती में गंगा!
ख़ुदी
ख़ुदी को खो चुका खोज रहा ख़ुद को,
बे-ख़ुदी में गुम खोज रहा ख़ुद को !
शाशे की चमक दमक देख बहक ठिठक गया,
अस़ल कोहिनूर बेश-क़ीमती ख़ोज रहा ख़ुद को !
बहार आई बुलबुल त़ोता मीना का बदला मिज़ाज ,
बेरूख़ी शोख़ी का शिकार खोज रहा ख़ुद को !
ख़ज़ां का ख़ोफ़ भूल गये जोखम जान को,
रूह़ रोया ज़ार-ज़ार खोज रहा ख़ुद को !
मोस़ूल चैन सुकून पर दर्दे दास्तान दफ़ा हुए,
बेवफ़ा बदगुमान मग़रूर नादान खोज रहा हूं ख़ुद को !
इंसान दुश्मन इंसान का ओर नहीं कोई ‘कागा”
हज़ारों के हुजूम में खोज रहा हूं ख़ुद को!
इम्तहान
इंसान की अस़लियत का इम्तहान आफ़्त आने पर ,
इंसान की ओक़ात का इम्तहान आफ़्त आने पर!
नील गाये रहती मोह़ब्बत स़ोह़ब्बत से मिल जुल,
भाग जाती बद-ह़वास होकर आफ़्त आने पर!
भेड़ें रहती झुंड में यक-मुश्त ख़ामोश ख़ुदार,
हिलती डुलती नहीं भेड़िये की आफ़्त आने पर!
जब आते आंधी त़ूफ़ान सुनामी बारिश पड़ते ओले,
इंसान छोड़ देता साथ अचानक आफ़्त आने पर!
शहद के छत्ते से करता कोई छेड़-खानी,
टूट पड़ती मखियां बन हमलावर आफ़्त आने पर!
इंसान बड़ा ख़ुद ग़र्ज़ फ़र्ज़ निभाता नहीं अपना,
पकड़ा हाथ साथ छोड़ देता आफ़्त आने पर!
शेर रहता अकेला अपनी ह़िफ़ाज़त करता ख़ुद ‘कागा”
दहाड़ सुन भाग जाते भगोड़े आफ़्त आने पर!
आप का अंत
आप का अंत हुआ उदय हुआ भाजपा का,
कमल खिला ताज हिला प्रकाश हुआ भाजपा का!
जनता कराह रही थी सालों से बड़ी बेह़ाल ,
झाड़ू बिखर गया हुआ तिनका तार-तार बेह़ाल!
चारों ओर चमक उठा चमन दिल दिल्ली का ,
महक उठा माह़ोल चहक चमन दिल दिल्ली का !
दिल्ली का दर्द दूर हुआ चमक गये चेहरे,
भर गये भावना से घाव लगे थे गहरे!
केजरीवाल का घमंड हुआ चकना-चुर ख़ुशियां भरपूर!
सपने होंगे साकार भाजपा सरकार में अति भरपूर!
मोदी की गारंटी पर जनता ने किया विश्वास,
ग़रीब अमीर नर नारी में जागा आत्म विश्वास!
हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई धर्म सब एक मत,
भाजपा की रीति नीति से रहे समस्त सहमत!
भाजपा पर भरोसा जताया जनता ने मन से ,
अब विकास की जमना बहेगी मन मगन से !
डब्ल इंजन की सरकार द्वारा होगी काया कल्प,
भाजपा का होग सालों आधा अधूरा पूरा संकल्प !
शीश महल शराब घोटाला आम जन पर आतंक,
धराशाही धर्म विरोध नया युग आया पुराना अंतर!
‘कागा’ कुंभ प्रयाग राज पवित्र स्नान का प्रभाव ,
आप का पाप अंतिम भाजपा मिटा देगी अभाव !
दास्तान ए ग़म
दास्तान ए ग़म कोई सुनने वाला नहीं ,
दास्तान ए दर्द कोई सुनने वाला नहीं !
ज़ुल्म सितम की आबो हवा गर्म,
ज़ोर ज़बरदस्ती कोई सुनने वाला नहीं!
ज़ालिम ज़हर घोल रहा जीना मुश्किल,
धींग दस्ती कोई सुनने वाला नहीं !
पिंजरे में क़ैद कर रखे परिंदे,
आह आवाज़ कोई सुनने वाला नहीं!
ग़ुलामी की हथकड़ियां हाथों में बांधी,
सिसक स़दा कोई सुनने वाला नहीं!
पैरों में जकड़ी बेड़ियां बेकस ‘कागा”
चलना मजबूर कोई सुनने वाला नहीं!
प्राचीन परम्परा
गौरों से मुक्ति मिल गई कालों से शेष ,
गै़रों से मुक्ति मिल गई चंडालों से शेष!
फूट डाल लूट डालो लुटेरों की चाल पुरानी ,
चुग्गा डाल पकड़ डालो पाराधी की चाल पुरानी!
धर्म के नाम पर ऊंच नीच छूआ छूत,
पूजा पाठ धूप ध्यान लगाते ललाट भभूत अवधूत ,
भगवा धारण किया हरण सीता का रावण ने,
मांग भिक्षा स्वांग रचा किया षड़यंत्र रावण ने!
अहलिया का सत्तीतव नष्ट किया छल कपट से,
मारीच स्वर्ण हिरन बना झूठ छल कपट से !
द्रोपदी का चीर हरण खचा-खच सभा में ,
कृष्ण ने लाज बचाई कौरव पांडव सभा में !
बाली सु्ग्रीव दोनों सगे भाई दोनों में दुराव,
सुग्रीव की पत्नि हथियाई बाली ने हुआ दुराव !
राम ने बाण मारा बाली को छुप कर,
लाज दोबारा लोटाई पैड़ के पीछे छुप कर !
कैकई ने कोप किया मंथरा की चाल पर,
राम को बनवास भरत को राज चाल पर !
‘कागा‘आज कल समय सर्व कुरीतियों की जड़,
नीति नियत का पतन करो जतन काटो जड़!
ग़रीबी
ग़रीब ज़रूर हूं मगर बेज़मीर नहीं,
ग़रीब ज़रूर हूं मगर बेग़ैरत नहीं!
खाने को रोटी पीने को पानी ,
नस़ीब नहीं होता मगर बेशऊर नहीं!
नंगा बदन पैबंद लगा चीत्थड़ा लिबास ,
लंगोटी में लिपटा मगर बेशर्म नहीं!
पैरों में बवाई फटी छाले फफोले,
बिना जूतम पैजार मगर बेजान नहीं!
अ़र्श नीचे बसेरा मेरा फ़क़्त सहारा ,
रेत धूल बिछोना मगर बेज़ुबान नहीं!
मेरी बेबसी बेकसी का मज़ाक़ ‘कागा”
उड़ाते लोग हरदम मगर बेह़य्या नहीं !
दुश्मन
दुश्मन दहलीज़ पर खड़ा दस्तक दे रहा,
दुश्मन दरवाज़े पर खड़ा दस्तक दे रहा !
भेष बदल भगवा धारी चोर चंडाल चोकड़ी,
भिखारी बन चोखट खड़ा दस्तक दे रहा!
नश्तर पर लगा ज़हर घोल रहा हरदम,
त़बीब बनकर तुरंत खड़ा दस्तक दे रहा!
मुखोटा चेहरे पर ओढ़ कर चाल बाज़,
लुटेरा लफंगा लूटने खड़ा दस्तक दे रहा!
चोट से ज़ख़्मी चीख़ रहे थे नदार्द,
हम दर्द बन खड़ा दस्तक दे रहा!
हम ठहरे भोले भाले दुश्मन बड़ा चालाक ,
गुमराह करता ग़ज़ब खड़ा दस्तक दे रहा!
ख़बरदार जाल बिछा बेठा मकार दाना डाल ,
शिकारी बन शातिर खड़ा दस्तक दे रहा!
मुठ्ठी में बंद नमक मरहम के बदले,
पट्टी बंधन बहाने खड़ा दस्तक दे रहा!
पीढ़ी दर पीढ़ी पीड़ा देता रहा ‘कागा”
दोस्त बन ख़ामोश खड़ा दस्तक दे रहा!
ज़ख़्म
जिस्म के ज़ख़्म भर गये दिल के ताज़ा हैं,
मरह़म से ज़ख़्म भर गये दिल के ताज़ा है!
ज़ख़्म बेह़द गहरे ग़ज़ब थे मवाद निकल रहा था,
बांधी पट्टी लगाया मरहम माक़ूल दिल के ताज़ा है!
चोट लगी चीख कर चिल्ला पड़े सिसक ससुबक कर,
वक़्त का तकाज़ा चुस्त दुरस्त दिल के ताज़ा है!
यदा-कदा याद आती लगे हरे भरे ज़ख़्मों की,
दिल दहल कर तड़प जाता दिल के ताज़ा है !
बद अल्फ़ाज़ ने बदला दर्द भरा दिल का दास्तान,
अंखियां हो गई नम ग़मगीन दिल के ताज़ा है!
निशान बाक़ी नज़र आते बदन पर चोट के ‘कागा”
दिल के दिखाई नहीं देते दिल के ताज़ा है!
क्रांति
चिंगारी सुलग चुकी ज्वाला भभक जाना बाक़ी है
धूआं उठने लगा शोला धधक जाना बाक़ी है !
जलते अंगारों पर चलना सीखो आग ज़नी फेली,
नफ़रत का लावा लपटें लपक जाना बाक़ी है !
ज़ात पात का ज़हर घोल करते माहोल आलूदा ,
तेअस़ब की तेज़ तपिश धमक जाना बाक़ी है !
बराबरी के बुनियाद पर अलगाव का अलाव जलाते,
बग़ावत की भट्टी को फफक जाना बाक़ी है!
ख़ुशी का ख़ज़ाना नेकी का नज़राना नेस्तो नाबूद,
बर्बाद करते आबाद बस्तियां सुबक जाना बाक़ी है!
बेग़ैरत बेईमान बेशऊर बेज़मीर बेवफ़ा करते जफ़ा ‘कागा”
अपने बदल हुए पराये दुबक जाना बाक़ी है!
संसार
संसार एक सागर जिसका कोई अंत छोर नहीं,
दुख सुख की जोड़ी कोई अंत छोर नहीं!
मानव भटक अटक जाता बीच चलती राह में,
तन दुखी मन दुखी कोई अंत छोर नहीं!
काम क्रोध लोभ मोह अहंकार के वशी भूत,
धन दुखी संतान दुखी कोई अंत छोर नहीं!
काया माया छाया प्रकृति की देन चित्त चंचल,
मकड़ जाल में फंसता कोई अंत छोर नहीं!
कोई तन मन धन वचन जीवन सुखी अति,
कोई चंद्र मुखी चमके कोई अंत छोर नहीं!
विधाता ने साधन सम्पन्न बनाया किसी को कंगाल ,
सूरज मुखी के समान कोई अंत छोर नहीं !
कोई दीन दुखी दरिंदगी भरा कराहे हरदम ‘कागा”
ज्वाला मुखी जर्जर जीवन कोई अंत छोर नहीं!
घर आपका
खाना पीना कुछ नहीं घर आपका हैं,
बोलना डोलना कुछ नहीं घर आपका है !
बंधन रखना रस्सी से मज़बूत खूंटे में,
भूखे प्यासे कुछ नहीं घर आपका है!
भूख से बिलबिला उठे बच्चे तड़प कर,
चीख चिल्लाना कुछ नहीं घर आपका है!
पेट चिपक गया पीठ से घबराना नहीं ,
पसलियां दिखती कुछ नहीं घर आपका है!
नंगा बदन बेटी बहु के फटे कपड़े,
सर्दी गर्मी कुछ नहीं घर आपका है!
घर की बात घर में उपटार नहीं ,
गिला शिक्वा कुछ नहीं घर आपका है!
पंच सरपंच प्रधान प्रमुख विधायक सांसद हमारा ,
आह परवाह कुछ नहीं घर आपका है!
सरकार सत्ता सम्पति संसाधन पर क़ब्ज़ा ‘कागा’
मांग फ़रियाद कुछ नहीं घर आपका है!
कुंभ मेला
सालों बाद आया कुंभ सनातन संस्कृति का समागम ,
आस्था का केंद्र बिंदु सनातन संस्कृति का समागम !
विश्व गुरु बन रहा भारत भव्य देश हमारा ,
चलो हम भी डुबकी लगायें भव्य देश हमारा!
गंगा यमुना सरस्वती संगम प्रयाग राज पवित्र धाम ,
करें स्नान शुभ महुर्त में नहायें पवित्र धाम!
मिले मुक्ति भक्ति शक्ति युक्त बनायें तन उज्जवल,
पाप संताप मिट जायें पल में मन निर्मल !
साधु संत पंडित पूजारी भगवा धारी जटा धारी,
नागा बाबा नर नारी अघोरी ओघड़ सिद्ध ब्रहमचारी!
आचार्य शंकराचार्य मठाधीश महंत महात्मा ऋषि मुनि तपस्वी,
जमघट जमावड़ा तट पर संस्करी शिष्टाचारी तेज तपस्वी !
चतुर्थ वर्ण में भेद भाव झगड़ा रगड़ा नहीं ,
आने जाने की छूट कोई अगड़ा पिछड़ा नहीं!
‘कागा’ पुख़्ता प्रबंधन सरकार का चाक चोबंद चौकसी,
भय मुक़्त सुंदर वातावरण चोखी चुस्त दुरस्त चोकसी !
याद किया करो
यदा-कदा याद किया करो नाचीज़ बंदे को,
गाहे-बगाहे याद किया करो नाचीज़ बंदे को !
हम साया हम रहते बसते अगल बग़ल में ,
सोच विचार याद किया करो नाचीज़ बंदे को !
मेरा अस़ल घर क़बर दो गज़ ज़मीन मुक़र्र ,
उल्फ़त से याद किया करो नाचीज़ बंदे को !
मेला लिबास कफ़न दो गज़ कपड़ा सादा सफ़ेद ,
बिना जेब याद किया करो नाचीज़ बंदे को!
ग़ुरूर नहीं कर बदगुमान मग़रूर बन फ़ानी दुनिया ,
इस्म खाक याद किया करो नाचीज़ बंदे को!
उजड़े चमन के माली हम ग़म हमारी ग़िज़ा ,
ज़िक़्र कर याद किया करो नाचीज़ बंदे को!
नेकी कर साथ देगी बाक़ी रह जायेगा पीछे ,
नियत नेक याद किया करो नाचीज़ बंदे को!
मौत मुम्किन है कोई रोक नहीं सकता जनाब,
नहीं ठहराव याद किया करो नाचीज़ बंदे को!
हम होंगे दफ़न कफ़न समेट क़बर मे़ ‘कागा”
आप जलोगे याद किया करो नाचीज़ बंदे को!
बसंत पंचमी
बसंत पंचमी पर्व पर देते हार्दिक बधाई,
बसंत पंचमी पर्व पावन देते हार्दिक बधाई!
ऋतु शीत गई आई क्रांति बसंत बहार,
पर्व पर गर्व घनेरा देते हार्दिक बधाई!
कोहरा छाया धूजणी छूटी जो़र बर्फ़ जमी,
ओस की बूंदें बरसी देते हार्दिक बधाई!
पशु पक्षी जीव जंतु चुप चाप चरते,
सूखा घास दाना पानी देते हार्दिक बधाई!
चींटियां चुन चुन लेते एक अनाज कण,
इकट्ठा करते बिल्लों में देते हार्दिक बधाई!
दृष्टि बदली दृश्य बदला सृष्टि का सौंदर्य,
मंद नथुनी आती सुगंध देते हार्दिक बधाई!
पौधे लता टहनी फूल कलियां खिल उठी ,
भंवरा झूमे रस चूसे देते हार्दिक बधाई!
मोर मोरनी नाचे गाये गीत संगीत ‘कागा”
बसंत पंचमी मोज मनायें देते हार्दिक बधाई!
नशा-ख़ोर
नशा नहीं कर नादान नशा नाश की जड़़ ,
नशा नहीं कर नाकाम नशा नाश की जड़़ !
अमल डोडा चरस गांजा भांग कोकीन दारू नसवार ,
मिटा देगा नामो निशान नशा नाश की जड़ !
हीरोईन एमडी हु़क़ा चिल्म चुरुट बीड़ी सिग्रेट जर्दा ,
करता धन बदन नुक़स़ान नशा नाश की जड़!
हस्तियां बस्तियां मस्तियां चढ़ जाती नशा की भेंट ,
बिक जाते घर सामान नशा नाश की जड़!
जोश जवानी चकना-चुर होता नशेड़ी इंसान का,
घर परिवार रहता परेशान नशा नाश की जड़ !
सपने सुहाने होते अधूरे ह़ालात बनते ख़राब ‘कागा”
जान गंवा रहे जवान नशा नाश की जड़!
बसंत ऋतु राज
ऋतुओं का राजा बसंत आया झूम कर ,
ख़ुशियों का ख़ज़ाना संग लाया झूम कर!
शीत ऋतु का प्रभाव धीमे थमने लगा ,
बसंत ऋतु का रंग रूप जमने लगा !
पवन चलने लगी सुर मयी ऋतु बदली,
आभा मंडल की स़ूरत मूर्त शोभा बदली!
नई कोमल कोंपल कलियां खिल कर मुस्काई ,
त़ौत़ा मीना बुलबुल तितलियां मिल कर मुस्काई !
बाग़बान बसंत देख मन चित्त हुआ प्रसन्न ,
रंग बरंगी फूल खिले बगिया दुर्लभ दर्शन!
सुगंधित हुआ सारा वातावरण महक मन भावन,
चहक रहीं चिड़ियां चूचं करती तन पावन !
‘कागा” कोयल करे कूह कूह मधुर तान,
मोर नाचे पंख फेला करे मधुर तान !
ख़ानदान
गहरी जड़ें खोद नहीं काट दरख़्त गिर जायेगा,
नींव फत्थर खोद नहीं निकाल मह़ल गिर जायेगा!
माता पिता की सेवा कर तन मन वचन से ,
बेदख़ल बेइज़्ज़त कर नहीं निकाल घर बिखर जायेगा!
पाल पोस कर बड़ा किया लायक़ बनाया इंसान,
जोरू का ग़ुलाम नहीं निकाल नस्ल उजड़ जायेगा!
मां बाप की दुआऐं भाग्य बदल देती हैं ,
अपनी दिल से नहीं निकाल भविष्य बिगड़ जायेगा !
बीवी की बात सुन हम सफ़र ज़िंदगी की,
दिमाग़ से दूर नहीं निकाल वरना उखड़ जायेगा!
नाज़ नख़रे झेले हर ख़्वाहिश पूरी की ‘कागा’
सोच विचार से नहीं निकाल संवर निखर जायेगा!
छल कपट
घमंडी घड़ियाली आंसू बहा रहे है बेदर्द लोग ,
पाखंडी जाली आंसू बहा रहे हैं बेदर्द लोग !
चोर को चोरी का इशारा शाहूकार करते सावधान ,
ख़ुद ख़ाली आंसू बहा रहे है नामर्द लोग!
कश्ती चलती पानी पर पानी घुसे ख़त़रा जान,
किसान कंगाली आंसू बहा रहे है हमदर्द लोग!
दुनिया की दिलों में बस जाना दर्द नहीं ,
बाग़ माली आंसू बहा रहा हैं मर्द लोग !
टहनी टूट जाये शख़ से जुड़ती नहीं दोबारा ,
फूल कली आंसू बहा रहे है ज़र्द लोग!
क़ुदरत का करिश्मा वक़्त ने करवट बदली ‘कागा”
मस्त मवाली आंसू बहा रहे हैं शर्द लोग!
मानव स्वार्थी
मानव महान महारथी मानव महा स्वार्थी,
मानव महान परमार्थी मानव महा सारथी!
प्रशंसा पर पिघल जाता जैसे मोम,
स्वंय हित्त की सोचता बड़ा स्वार्थी!
आलोचना पर उबल जाता ज्वाला मुखी ,
आग बबुला भभक जाता बड़ा स्वार्थी !
अपनी पीठ अपने हाथों से थपाता,
करता गुण-गान निजी बड़ा स्वार्थी!
पग -पग पर करता पाप पापी,
गंगा घाट जाता नहाने बड़ा स्वार्थी!
ग़रीब को देता गाली करता अपमान ,
अमीर को आदर सम्मान बड़ा स्वार्थी!
मीठा गटक जाता कड़वा देता थूक,
नोटंकी करता पाठ पूजा बड़ा स्वार्थी!
मानव दानव बन जाता यदा-कदा
करता अर्चना प्रार्थना आरती बड़ा स्वार्थी!
चोरी चकोरी लूट खसोट हत्या व्यभिचार,
मांगने माफ़ी तीर्थ यात्रा बड़ा स्वार्थी !
माथा टेकने मंदिर मस्जिद चर्च जाता,
करता इबादत आराधना बड़ा स्वार्थी!
गिरेबान में झांक देखता नहीं ‘कागा”
छवि अपनी काली कलोटी बड़ा स्वार्थी!
परिचय
प्रतिभा को परिचय देने की ज़रूरत नहीं होती ,
प्रतिष्ठा को परिचय देने की ज़रूरत नहीं होती!
सूरज उदय होने से प्रकाशित होता सारा वातावरण,
सूरज को परिचय देने की ज़रूरत नहीं होती!
आभा मंडल आलोकित होता चांदनी की चमक से,
चांद को परिवार देने की ज़रूरत नहीं होती !
घर जगमग जाता अंधेरे में दिया जलाने पर ,
दीपक को परिवार देने की ज़रूरत नहीं होती!
चमन महक जाता रंग बरंगी फूल खिलने पर ,
गुलाब को परिचय देने की ज़रूरत नहीं होती!
हंस चुगे मोती बगुले गटके मच्छी फ़ितरत ‘कागा’
मोर को परिचय देने की ज़रूरत नहीं होती!
एह़सास
एह़सान का बदला एह़सास से चुकाओ,
एह़सास का बदला एह़सान से चुकाओ!
धरती गोल घूमती रहती चारों ओर ,
भलाई का बदला अच्छाई से चुकाओ!
स़ुबह़ होती शाम होती हर रोज़ ,
नेकी का बदला नेकी से चुकाओ !
दाना दफ़न ज़मीन में देता नतीजा ,
क़ुरबानी का बदला क़ुरबानी से चुकाओ !
अलादीन का चिराग़ रोशन करता माह़ोल,
रोशनी का बदला रोशनी से चुकाओ !
जादू की छड़ी पर भरोसा नहीं ,
मदद का बदला मदद से चुकाओ !
बातूनी करते बकवास बहकी बातें ‘कागा”
अरमान का बदला ईमान से चुकाओ!
जन सुनवाई
जन सुनवाई का दौर जारी नतीजा नहीं मिलता,
आहत को रहत नस़ीब नहीं नतीजा नहीं मिलता!
ग़रीब दर बदर भटक रहा इधर उधर उदास,
ह़क़दार ह़क़ से मह़रूम मायूस नतीजा नहीं मिलता!
महनकश करते कड़ी मह़नत मज़दूरी मुश्किल माह़ोल मे़ ,
पसीने का वाजिब पगार नहीं नतीजा नहीं मिलता!
मुफ़्त पानी बिजली अनाज बांटने का लालच बदस्तूर ,
तालीम तहज़ीब बेह़द महंगी ह़क़ीक़ी नतीजा नहीं मिलता!
किसान करता काम तपती धूप दुपहरी बारिश मेंं ,
भरता भंगार अनाज से भाव नतीजा नहीं मिलता!
अमीर ग़रीब की खाई तमाम लम्बी चोड़ी ‘कागा”
दब्बू पर दबंग का दबाव नतीजा नहीं मिलता!
इमदाद
ज़रूरत मंद की मदद कर मददगार बन,
दर्द मंद की मदद कर मददगार बन!
आफ़त अचानक आती है किसी इंसान पर,
दिलो जान से मदद कर ख़िदमतगार बन!
बुरा वक़्त आता है ज़िंदगी में ज़ालिम,
नेक नियत से मदद कर यादगार बन!
मत़लबी कन्नी काट जाते ममुस़ीबत लम्हों में,
तन मन से मदद कर जानदार बन!
सितमगर सितम करते फ़ित़रत उनकी चंद रोज़,
ग़ैरत मंद की मदद कर शानदार बन!
इमदाद याद रहती बाक़ी भूल जाते ‘कागा”
ग़रीब गुरबा की मदद कर ख़बरदार बन!
गण तंत्र दिवस
छब्बीस जनवरी गण तंत्र पर्व मिल जुल मनायें ,
गण तंत्र की महिमा निराली मिल जुल मनायें!
भारत का संविधान लागू हुआ स्वतंत्र देश में ,
धर्म निर्पेक्ष धारणा तन मन वचन से मनायें!
गोरों की ग़ुलामी से मुक़्ति मिली सौग़ात सुंदर,
तिरंगा हमारा बुलंद जनता को हार्दिक शुभ कामनायें!
राष्ट्र पति ध्वज फहराये आन बान शान से,
देश के हर कोने में ज़ोरदार जशन मनायें!
राष्ट्र गान गूंजे गगन में ऊंचा स्वर आकाश ,
जय भारत माता की बच्चा बुज़ुर्ग महान बनायें!
सौगंध इस मिट्टी की महक मानवता की ‘कागा’
भारतियों की हर मानव प्राणी को नेक तमनायें !
दिल नादान
दुनिया वाले दिल नहीं चेहरा देखते है,
दिल वाले चेहरा नहीं दिल देखते है !
बखान होता नीला रंग नैन गगन कजियारे,
बिजली कौंध रात को चमके दांत उजियारे!
नाक नुकीली होंठ लाली गाल लाल गुलाबी ,
काले बाल भंवरा जेसे चाल मोरनी शबाबी!
भाल पर लाल बिंदिया दोनों भौंहों बीच ,
सू़रत मूर्त सोहनी मन मोहनी सखियों बीच!
चित्त चंचल जगमग रहा जोभन रंग रूप,
मन मचल तन बदन बने छाया धूप !
‘कागा” कड़वा बोल कोयल मधुर मीठी वाणी,
चुलबुली मचाये खलबली बोल सुंदर मीठी वाणी !
भूखे प्यासे
हम भोजन के भूखे नहीं मगर प्यार के ,
हम पानी के प्यासे नहीं मगर प्यार के !
देखो दया की दृष्टि से दृश्य बदल जाये,
हम पद के भूखे नहीं मगर प्यार के!
ईर्ष्या की आग भभक रही ज्वाला बन कर,
हम धन के भूखे नहीं मगर प्यार के!
जुगनु करते विद्रोह सूरज के विरूध मिल कर,
हम सत्ता के भूखे नहीं मगर प्यार के!
हम करते सब का सम्मान अपमान क़तयी नहीं ,
हम प्रशंसा के भूखे नहीं मगर प्यार के!
हम ग़रीब ज़रूर है बेग़ैरत बद तमीज़ नहीं ,
हम ख़ुशामद के भूखे नहीं मगर प्यार के !
हम क़द्र-दान करते क़द्र समस्त का ‘कागा”
हम घूस के भूखे नहीं मगर प्यार के !
स्वभाव
मिंयां मुंह मिठ्ठु मत बन दुनिया जानती है,
चाल चेहरा चित्र चरित्र सब दुनिया जानती है।
चाहती कुछ ओर सोचती कुछ ओर अंदाज़ निराला,
गिरगिट जैसे रंग बदलना राज़ दुनिया जानती है।
झूठा झांसा प्यार का नफ़रत की आग भड़काते ,
इरादे दावे नेक नहीं दोगलापन दुनिया जानती है।
जाति धर्म का वर्चस्व स़दियों पुराना रस्मो रिवाज ,
दग़ा बाज़ फ़ित़रत तेरी आदत दुनिया जानती है।
गिड़गिड़ा कर गिरते क़दमों में करते हाथा जोड़ी,
फिर करते माथा फोडी़ सच्चाई दुनिया जानती है।
चुनावों में चोखट चूमते घूमते घर घर पहुंच,
बन जाते बाद में अनजान दुनिया जानती है।
पेहले करते मीठी बातें बाद में कड़वी ‘कागा”
जीत गये बने प्रमुख प्रधान दुनिया जानती है।
वक़्त बादशाह
कब तक ग़ुलाम गिरी करोगे अपना अंदाज़ रख ,
कब तक चमचा गिरी करोगे अपना अंदाज़ रख!
ज़मीर का अमीर बन नेक नियत आला इंसान,
कब तक पराया ग़ुलाम रहोगे अपना आवाज़ रख!
तख्तो ताज रस्मो रिवाज बदल दे पुराना दस्तूर,
कब तक दोस्त दोगले अपना हम राज़ रख!
अ़दावत कर उल्लुओं से बग़ावत नहीं बुलबुल से ,
कब तक त़ौत़े बनोगे अपना जान बाज़ रख !
साज़िश करते वो लोग जिनक वजूद वक़ार नहीं,
कब तक चुंगल में क़ैद अपना लिह़ाज़ रख!
तलख़ लह़ज़ा देख उनसे तकरार नहीं कर ‘कागा”
कब तक नाराज़ होंते रहोगे अपना नाज़ रख !
बेबस बेटी
मुझे अपने पिया घर जाना है,
मुझे अपने जिया घर जाना है!
पापा की परी मां की ममता ,
दादी की लाड़ली नानी की नम्रता!
कोमल कली चुलबुली तितली फुलवारी की,
खिली बनी फूल गुलाब फुलवारी की !
चंचल चिड़िया चुग रही चुग्गा आंगन,
मां बाप की रंगीन रंगोली आंगन !
उड़ चली बिना पर पंख फुर्र ,
अब जाना ज़रूर समय हुआ मुक़र्र!
आया पिया घर आंगन जिया बेक़रार,
सज धज बेठ डोली मन बेक़रार!
रोती बिलखती सखी सहेलियां मां बाप,
दस्तूर दर्दीला विदाई करते मां बाप !
मायका मेरा मुक़ाम नहीं कोई ठिकाना,
आना जाना रहेगा ससुराल अस़ल आशियाना!
‘कागा’ मां बाप की याद रहेगी ,
जब-तक जीवित मैं याद रहेगी!

कवि साहित्यकार: डा. तरूण राय कागा
पूर्व विधायक
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