इन्सान तेरे-मेरे में उलझ जाता है

इन्सान तेरे-मेरे में उलझ जाता है

‘इन्सान तेरे-मेरे में उलझ जाता है’

हे इन्सान तू अकेला ही आता है,
तथा अकेला जहाँ से चला जाता है।
तू यहाँ सदैव कुछ खोता व पाता है,
नित तेरे-मेरे में उलझता जाता है।

हे इन्सान तू स्वयं का भाग्य-विधाता है,
साँसों की चलती रहती है कहानी।
मिलते तथा बिछड़ते हैं इस पथ में,
तू छोड़ जाता है अपनी निशानी।

केवल वक़्त ही अपना साथी होता है,
जीवन का अर्थ केवल आना–जाना है।
वक़्त का एक-एक क्षण अनमोल है।
ये वक़्त खो दें तो पछताते जाना है।

हे इन्सान ग़र तू अच्छे कर्म करेगा,
तो मरने के बाद भी ज़िन्दा ही रहेगा।
स्वयं के लिए जिया तो क्या जिया?
इन्सान वही जो औरों के लिए जीता रहेगा।

सूर्यदीप

( कवि, साहित्यकार व शिक्षित समाज-सुधारक, समाजसेवी, मानवतावादी, प्रखर चिन्तक, दार्शनिक )

नवोदय लोक चेतना कल्याण’समिति – बागपत

यह भी पढ़ें :-

Similar Posts

  • सवालों के घेरे में | Sawalo ke Ghere Mein

    सवालों के घेरे में ( Sawalo ke ghere mein ) जहां तक संभव हो आपसी संबंधों के बीच में आप निर्णायक ना बने आज नहीं तो कल हल हो ही जाएगी उनकी समस्याएं किंतु आप आ सकते हैं सवालों के घेरे नीयत किसी की भी साफ नहीं माहौल हावी है सभी पर कोई कहीं से…

  • समर | Samar

    समर ( Samar )    हर दर्द की दवा नहीं मिलती हर डालियों में फूल नहीं खिलते हर चमन से आती है बहार, मगर हर चमन को माली नहीं मिलते कभी और से तो कभी खुद से भी सफल शुरू करना जरूरी होता है जरूरी है उजाला भी रात के अंधेरे में मगर चांद से…

  • सफर जिंदगी का गुजरता रहा | Safar Zindagi ka

    सफर जिंदगी का गुजरता रहा ( Safar zindagi ka guzarta raha )   हौसला अंतर्मन में जोश भरता रहा। बहारों से मौसम भिगा संवरता रहा। हमने मोती लुटाए जहां में प्यार भरे। सफर जिंदगी का यूं ही गुजरता रहा। मुश्किलों में पथिक कदम धरता रहा। दीन दुखियों की पीर नित हरता रहा। भरी झोली दुआओं…

  • कलम का पुजारी | Kalam ka pujari | Kavita

    कलम का पुजारी ( Kalam ka pujari )   नजर उठाकर देखो जरा, पहचान लीजिए। कलम का पुजारी हूं, जरा ध्यान दीजिए।   शब्दों की माला लेकर, भाव मोती पिरोता हूं। कागज कलम लेकर, मैं सपनों में खोता हूं।   गीत गजल छंद मुक्तक, दोहा चौपाई गाउं। मनमंदिर मांँ शारदे, पूजा कर दीप जलाऊं।  …

  • पुरुष हो जाना | Kavita purush ho jana

    पुरुष हो जाना ( Purush ho jana )    पुरुष के लिए कहा आसान रहा ” पुरुष हो जाना ” सबको खुश रखना सब को समझ पाना सबको संभालना उसकी कोशिश रही, सब कुछ सरल बनाना हां पुरुष ही है ” खुशियों का खजाना ” ।। पुरुष के लिए कहा आसान रहा ” पुरुष हो…

  • वर्षा ऋतु | Varsha Ritu

    वर्षा ऋतु ( Varsha ritu )    रिमझिम फुहारों से दिल फिर खिलेंगे, मेघों के काँधे नभ हम उड़ेंगे। बात करेंगे उड़ती तितलियों से, भौंरों के होंठों से नगमें चुनेंगे। चिलचिलाती धूप से कितना जले थे, मिलकर बरखा से शिकायत करेंगे। पाकर उसे खेत -खलिहान सजते, आखिर उदर भी तो उससे भरेंगे। धरती का सारा…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *