Samar

समर

( Samar ) 

 

हर दर्द की दवा नहीं मिलती
हर डालियों में फूल नहीं खिलते
हर चमन से आती है बहार, मगर
हर चमन को माली नहीं मिलते

कभी और से तो कभी खुद से भी
सफल शुरू करना जरूरी होता है
जरूरी है उजाला भी रात के अंधेरे में
मगर चांद से ही रात नहीं गुजरती

तनहाई में तनहा मान लेना ठीक नहीं
रास्तों का साथ तो रहता ही है सदा
मुकाम तक तो पहुंचते हैं कदम ही
जन्नत में चरवाहा पहुंचता है पहले ही

धारा प्रवाह का रास्ता खोज ही लेती है
ठहर जाते हैं जल जो पोखर में अगर
गिजबीजाते कीड़े ही नजर आते हैं उसमे

पौरुष से हि होती है जीत समर में
जिंदगी में मोहताजगी हरा ही देती है
लिखने को उठ जाए कलम अगर
तो लिखने को पन्ने खोज ही लेती है

 

मोहन तिवारी

( मुंबई )

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