उड़ान | Udaan
उड़ान
पक्षी अपने गीत के बदले तोड़ लेता है धान की दो बालियाँ लौट जाता है आसमान के घने घोंसले में
अनपहुँच अन्वेषा की आँखें क्षितिज के विराग को छूकर लौट आती हैं फिर से अपने अभीष्ट के अन्तिम आश्रय में
डैने सन्तुलित करते हैं दूर से दूर खिसकती नीलिमा की उदार सान्द्रता और फिर से पाने की आस्था में निश्चेष्ट पड़ी हरित की स्पर्धा को
सहज आवाजाही करते सन्तुलन को तोड़कर दृष्टि परिसर की सभी दिशाओं से कलरव लौट जाते हैं धान-खेत की प्रतीक्षा को छूकर पुनः इच्छा से परे महाकाश के मध्य-बिन्दु में थिर और सन्तुलित प्रत्यय की एकनिष्ठता में
जीवन विवर्तित होता रहता है समय की अराजकता में उपलब्धियाँ जाकर आश्रय ढूँढ़ती हैं मँडराती जिज्ञासा के युग्म आधार में।

बीएल भूरा भाबरा
जिला अलीराजपुर मध्यप्रदेश
यह भी पढ़ें :-







