Ananad Asawle Poetry

आनंदा आसवले की कविताएं | Ananad Asawle Poetry

बढ़ना सीखो

लिखते लिखते चलना सीखो,
चलते चलते बढ़ना सीखो।
रुकना मत तूम राहों में अब,
हर मुश्किल से लड़ना सीखो।।धृ।।

काग़ज़ पे उतरे ख्वाब जो तेरे,
उन्हें हकीकत बनाना सीखो।
हर गिरने को सीढ़ी समझकर,
मंज़िल तक जाना सीखो।।१।।

लिखते लिखते चलना सीखो,
चलते चलते बढ़ना सीखो…..

थोड़ा दर्द, थोड़ा सुख होगा,
हर रंग में जीना सीखो।
आंधी आए या हो तूफ़ाँ,
जैसे दीपक, जलना सीखो।।२।।

लिखते लिखते चलना सीखो,
चलते चलते बढ़ना सीखो…..

हर एक शब्द में शक्ति रखो,
हर सोच में उजियारा देखो।
दिल की आवाज़ को पहचानो,
सपनों से फिर नाता रखो।।३।।

लिखते लिखते चलना सीखो,
चलते चलते बढ़ना सीखो…..

जब थक जाओ, रुक मत जाना,
थोड़ा हँसना, थोड़ा गाना।
जो पाया है, उसे संजोकर,
नया सवेरा फिर से पाना।।४।।

लिखते लिखते चलना सीखो,
चलते चलते बढ़ना सीखो…..

योग मिटाए रोग

योग से रोज तुम खिलते रहो,
रोग को जड़ से ही मिटाते रहो।
शरीर ही आत्मा का सच्चा साथी,
रिश्ता यह प्रेम का सदा निभाते रहो।

साँसों की लय में जब मन समाए,
तन, मन, आत्मा तब एक हो जाए।
योग का दीपक जलाओ हृदय में,
अंधियारे जीवन से प्रकाश आए।

चित्त की चंचलता को जब बांधा जाए,
प्रत्येक आसन में शांति का भाव समाए।
न भावों में उलझो, न राग-द्वेष में डूबो,
योग से जुड़ो, सत्य की राह अपनाइए।

ना केवल व्यायाम, ना बस कोई क्रिया,
योग है भीतर की अनमोल साधना।
हर दिन को तप, हर क्षण को ध्यान बना दो,
अपने अस्तित्व से एकत्व का गान बना दो।

तन सुदृढ़, मन शांत, और आत्मा निर्मल,
योग बनाता जीवन को सुंदरतम सरल।
नित दिन योग करके खुद को सजाओ,
सुख-दुख से परे अंतर की ज्योति जलाओ।

मां का आंचल

माँ कोई तस्वीर नहीं, एहसास है,
हर दर्द का एक मीठा उपवास है।
वो चुप रहकर भी सब कह देती थी,
बिना माँगे ही सबकुछ वह देती थी।

थक गया जब जीवन की राहों में,
झुक गए अब मेरे कंधे चाहों में।
एक जगह थी जो शांत रहीं सदा,
वो माँ की गोद थी, खुदा से जुदा।

ना शिकायत, ना कोई सवाल,
सिर्फ ममता की चादर बेहाल।
जब दुनिया ने पीठ मोड़ी मुझसे,
माँ ने ही सीने से लगाया मुझसे।

जब भी दुनिया डराने लगी,
माँ के आँचल ने मुझे छुपा लिया।
ना कोई ढाल थी, ना तलवार थी,
बस उसकी ममता थी जिसने बचा लिया।

उसके हाथों में दुआओं की सौगात थी,
हर शब्द में बस मेरे लिए ही बात थी।
वो चुप रही, पर मैं तो समझ गया
माँ के बिना सभी को अधूरा साया।

जागतिक महिला दिन

8 मार्च को जागतिक महिला दिवस,
बड़ी धूमधाम से मनाया जा रहा है।
सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक,
स्वतंत्रता से उनको सजाया जा रहा है।

आज ध्यान से पढ़ाई कर रही कुंवारी,
पदों को सम्मानित करते चली सवारी।
एक शक्ति, प्रेरणा और उम्मीद से भरी।
बढ़ रही है आगे आज की युग में नारी।

नारी की उपलब्धियों पर एक नजर,
लैंगिक समानता का बढ़ाता असर।
दुनिया में फैल रही नारी की खबर,
उनकी बुद्धि और ताकत का असर।

आज की सारी महिलाएं पुरुषों से,
कंधों से कंधा मिलाकर चल रही है।
विज्ञान, तंत्रज्ञान आदि क्षेत्रों में भी,
कम से कदम मिलाकर बढ रही है।

जल-थल-वायु पर छोडी अपनी पहचान,
देवी दुर्गा और भक्ति में मिरा सी महान।
जिसके आंचल में पले राम-श्याम महान,
रही न अबला अब बदली उसकी पहचान।

तुम ही हो जननी सृष्टि की निर्माता,
चलती रहो अब कदम आगे बढ़ाता।
विश्व महिला दिन की बधाईयां देता,
गाता रहा है महिलाओं की सदा गाथा।

नारी जननी जगत की

नारी को बोझ अपना समझ रहे हो क्यों?
गर्भ को कोख में ही अब मिटा रहे हो क्यों?
स्त्री भ्रूण के हत्यारे अब बन रहे हो क्यों?
जन्मदात्री को जन्म से पहले मिटा रहे क्यों?

निर्जन स्थल पर स्वबचाव कर न सके नारी,
नोच रहे दानव बनकर नराधम बलात्कारी;
दासी बनाकर नारी पर कर रहे जुलम भारी,
वही जननी जग की अधिष्ठात्री पूजनीय नारी।

‌प्यार जताकर उसके ही किए गए टुकड़े,
नारी बिना किसी का भी घर नहीं उजड़े;
मां के सिवा कोई जिंदगी का पाठ नहीं पढ़ें,
देवी रूप नारी का अन्याय के खिलाफ लड़े।

बनाकर रखा नारी को केवल भोग वस्तु,
चाहते हैं कामना तब देवी भी कहे तथास्तु;
कई रूप में नारी ही रखतीं आनंदी वास्तु,
नर करते हैं अपमानित तभी कहे तथास्तु।

नारी पर मत रखिये अब कोई भी वक्रदृष्टि,
नारी में ही शक्ति और संसार की दूर दृष्टि;
नारी हो या नर सदा रखिये सब पर समदृष्टि,
दोनों ही पूरक सदा इनसे ही निर्मित सृष्टि।

रिश्ता अपना पराया

रिश्तेदार जितने भी नजदीक रहते,
उतने ही वह प्यार से दूर लौट जाते।
रिश्तेेदार जितने भी हमसे दूर रहते,
उतना प्यार पाने के लिए मजबूर होते।

अपने रिश्ते हमें सदैव पराए हीं लगते,
पराए रिश्ते ही हमारे लिए अपने लगते।
यहां अपने कोई भी कदर नहीं करते,
यहां सदैव पराए हीं अपनी कदर करते।

आज अपनों से ही ज्यादा हमें डर लगता,
और पराया यहां कायम हमसफर बनता।
आजकल अपना वहीं हमें सपना लगता,
और सपना वही हमें अपना लगने लगता।

खून का रिश्ता ही यहां दुश्मन बन जाता,
पराया रिश्ता यहां हमेशा दोस्त बन जाता।
अपना हमेशा यहां अपनों को लूटने लगता,
दूर का रिश्ता ही हमेशा हमारी मदद करता।

आनंदा आसवले, मुंबई
पत्ता: साईभक्ती चाल, रूम नं. 1, आनंद नगर, अप्पा पाड़ा,

कुरार विलेज, मालाड (पूर्व) मुंबई-400097

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