वंदना माँ शारदे की
वंदना माँ शारदे की
कुछ ऐसा प्रखर प्रकाश हुआ ।
जगमग सारा आकाश हुआ ।।
उर में आंनदित लहर उठी ,बह रही सुरभि भी कल्याणी ।
क्या उतर रही है शिखरों से ,अब श्वेत कमल वीणापाणी ।
सुरभित कुसमित है भूमंडल,नख शिख तक यह आभास हुआ ।।
जगमग——-
छँट जायेगी हर आँगन से ,तम की छाया काली-काली ।
पुलकित होगी नव सुमनों से,वन-उपवन की डाली-डाली ।
माँ की अनुकम्पा से जग में,अवतरित अटल विश्वास हुआ।।
जगमग——
शारद वीणा झंकारों से ,सब ज्ञान दीप जल जायेंगे ।
रजनी के माथे पर क्षण में, सिंदूरी रज मल आयेंगे ।
इन विमल धवल परिधानों से,सच कहता हूँ मधुमास हुआ।।
जगमग——
हर एक दिशा भय के बादल,अब डोल रहे काले-काले ।
संसृति में अजगर घूम रहे ,उर में विनाश का विष पाले ।
मिट जायेगी माँ गहन निशा ,तम के दैत्यों का नाश हुआ ।।
बरसा दो मेघ-सुधा माँ तुम,मानस घट हैं रीते – रीते ।
अंतर मन सबके झूम उठें, विचलित हैं दुख पीते-पीते ।।
किंचित करुणा से ही साग़र, जन-जीवन में उल्हास हुआ।।
जगमग सारा आकाश हुआ ,कुछ ऐसा प्रखर प्रकाश हुआ ।।

कवि व शायर: विनय साग़र जायसवाल बरेली
846, शाहबाद, गोंदनी चौक
बरेली 243003
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