वो रोज दुनिया की

वो रोज दुनिया की चौखट पे बिकता है !

वो रोज दुनिया की चौखट पे बिकता है !

न हिन्दू दिखता है न मुस्लिम दिखता है
वो जो रोटी के लिये लड़ता हुआ आदमी है
वो रोज दुनिया की चौखट पे बिकता है !

अपने काम से अपने राम से
निशदिन पड़ता है जिसका वास्ता
अपनी रोजी से अपने रोज़े से
अलहदा नहीं है जिसका रास्ता
उसकी आदत को
उसकी चाहत को
उसकी गैरत को
उसकी नीयत को
मत बांटो ! इतिहास के पन्नों में
कि वो तक़दीर हाथों से खुद लिखता है !

बच्चों की सदा बुजुर्गों की दवा
सबकी सुनता हुआ वो नेक इंसान है
बहन की दशा मां की मनशा
घर की चिंताओं से जो परेशान है
उसकी हालत को
उसकी सुरत को
उसकी शिरत को
उसकी मूरत को
मत देखो ! मजहब के चश्मों में
कि वो सबक ज़िन्दगी से ही सिखाता है !

मैदे की महक सेव‌ई की सुंगध
हर रसोई में खनकतीं हैं चूड़ियां
आरती की घड़ी अंजान की बेला
हर अवसर पे चमकतीं हैं चूड़ियां
उसकी जन्नत को
उसकी आयत को
उसके देवत को
उसके भारत को
मत बांधो ! नफ़रत के नारों में
कि वो हिंसा के बीच अक्सर चीखता है !

सुरेश बंजारा
(कवि व्यंग्य गज़लकार)
गोंदिया. महाराष्ट्र

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