पौधे की कीमत

पौधे की कीमत

संध्या मैडम ने बच्चों को संबोधित करते हुए कहा, “बच्चों कल पर्यावरण दिवस है। कल हम सभी शिक्षक व बच्चें पर्यावरण संरक्षण की शपथ लेंगे तथा बाकी लोगों व बच्चों को भी पर्यावरण संरक्षण हेतु प्रेरित करेंगे। पर्यावरण दिवस के अवसर पर सभी बच्चे अपने घर से एक-एक पौधा लेकर आएंगे और उसको स्कूल में लगाएंगे।

आप सभी उस पौधे की बिल्कुल अपने बच्चे की तरह देखभाल करेंगे, उसको खाद व पानी देंगे। उसको मुरझाने या मरने नहीं देंगे। जिन बच्चों के पौधे 14 नवंबर तक बेहतर स्थिति में होंगे, उन सभी बच्चों को बाल दिवस पर विशेष उपहार दिए जाएंगे।”

यह सुनकर सभी बच्चे बहुत उत्साहित हो गए, आखिर मैडम ने अंत में पुरस्कार देने वाली बात जो बोल दी थी।

उन्हीं बच्चों में एक बच्चा अरुण भी था। उसमें चोरी करने की बुरी आदत थी। वह भी सोच रहा था कि वह किस पेड़ का पौधा लेकर आएगा?? अचानक उसके मन में एक विचार आया। उसे ध्यान आया कि वासुदेव मंदिर के पीछे एक नर्सरी है जिसमें बहुत सुंदर सुंदर फूलों के, फलों के पौधों की कलम लगी हुई हैं।

क्यों न, वह कल सुबह, स्कूल जाने से पहले ही नर्सरी से एक पौधे की कलम चुरा कर ले जाये और फिर उसको स्कूल में लगा दे। जब वह पौधा बड़ा होगा तो कितना अच्छा लगेगा ना?? यह सोचकर वह मन ही मन प्रफुल्लित होने लगा।

अगले दिन सुबह सुबह अरुण नर्सरी से पौधे की कलम चुराने निकल गया। तभी उसने देखा कि नर्सरी को चारों तरफ से कंटीली झाड़ियों व तारों से सुरक्षित किया गया है ताकि कोई जानवर वगैरह उसको नुकसान न पहुंचा सके। वह जैसे तैसे नर्सरी में घुसा और बरगद के पेड़ की एक कलम चुरा ली।

वापसी में कलम चुराकर जल्दबाजी में झाड़ियों से बाहर निकलने की कोशिश में उसकी शर्ट फट गई। नर्सरी के मालिक ने उसको बरगद के पौधे की कलम चुराते हुए देख लिया था। उसने उस समय उससे कुछ ना कहा और चुपचाप शॉर्टकट रास्ते से निकलकर अरुण को चुपके से पकड़ लिया और उससे कड़कदार आवाज में बोला,

“चोरी करता है… यही सिखाया है तेरी मम्मी पापा ने… कहां रहता है?? चल आज तुझे पुलिस के हवाले करके आता हूँ…!”

यह सुनकर अरुण जोर जोर से रोने लगा और कहने लगा, “मुझे पुलिस को मत दो। मैं सच-सच सब कुछ बता दूंगा।” फिर उसने रोते-रोते संध्या मैडम की सभी बातें और पर्यावरण दिवस के बारे में उनको बताया। अरुण की बातें सुनकर नर्सरी के मालिक ने अरुण को समझाया,

” बेटा, पर्यावरण संरक्षण हेतु पौधे लगाना अच्छी बात है, लेकिन चोरी करके पौधे लगाना बहुत गलत बात है। अगर तुम मेरे पास आते… मुझे पूरी बात बताते… तो मैं फ्री में भी तुम्हें पौधे दे देता पर तुमने ऐसा नहीं किया… तुम जैसे अच्छे बच्चे से मुझे ऐसी उम्मीद नहीं थी।”

अरुण ने कहा,

“अंकल मुझे माफ कर दो। आगे से मैं चोरी नहीं करूंगा। इस पौधे के रुपए मैं आपको अपने पापा से लाकर दे दूंगा। मेरा घर आगे दूसरी गली में है।”

नर्सरी का मालिक, अरुण को समझाते हुए बोला,

“बेटा, नेक काम के लिए तुम्हें यह पौधा मैं अपनी मर्जी से दे रहा हूँ। मुझे इसके रुपये भी न चाहियें परन्तु तुम मुझसे यह वादा करो कि कभी चोरी नहीं करोगे। अगर तुम चोरी ना करके, एक अच्छे व नेक इंसान बनोगे तो मुझे खुशी मिलेगी। कोशिश करना कि यह पौधा कभी मुरझाने ना पाए, यही इस पौधे की कीमत होगी।”

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा

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