सन्तुष्टि

‘सन्तुष्टि’

2 साल बाद एक दिन राजेंद्र ने अपने मित्र एवं पूर्व शिक्षक साथी संतोष को कॉल की और उनसे पूछा-

“संतोष भाई, कैसे हाल-चाल है? घर परिवार में सब ठीक है?”

“सब बढ़िया है राजेन्द्र भाई। तुम सुनाओ।” संतोष ने कहा।

“हमारे यहाँ भी घर परिवार में सब ठीक हैं भैया। तुमसे बात किये हुए काफी दिन हो गए थे, आज सोचा कि संतोष सर के हाल-चाल मालूम कर लूँ? कैसी चल रही है नौकरी बड़े भाई, अब तो खूब मजे ले रहे होंगे?” राजेन्द्र बोला।

“राजेन्द्र भाई, यूँ समझ लो कि टाइम काट रहे हैं मिर्जापुर में।” दुखी मन से संतोष ने कहा।

“क्यों? क्या हुआ? कोई दिक्कत?” राजेन्द्र ने सवाल किया।

“क्या बताऊं? नौकरी जैसी भी है, अब तो करनी पड़ेगी। कोई और चारा भी तो नहीं है। अच्छी खांसी गृहजनपद की प्राइमरी स्कूल की नौकरी छोड़कर यहाँ आकर फस गया। अब तो उम्र भी हो गई है। 46 साल का हो गया हूँ। कोई दूसरी नौकरी का फॉर्म भी नहीं भर सकता। अब तो पूरी जिंदगी इसी में गुजारा करना पड़ेगा।” यह बताते हुए संतोष की आवाज में दर्द था।

“कैसी बातें कर रहे हो संतोष? यह नौकरी तो तुम्हारी अपनी पसंद की है। तुम्हें याद है कि हम दोनों का ही सेलेक्शन अपने घर से 500 किलोमीटर से भी ज्यादा दूर PGT में नवोदय विद्यालय में हुआ था। मैंने तो सोच रखा था कि अगर पड़ोस के जनपद में तैनाती मिलती है तो ही ये नौकरी छोडूंगा, नहीं तो मैं इसी बेसिक की नौकरी में खुश हूँ।

तुमने नवोदय विद्यालय मिर्जापुर में नौकरी करना पसंद किया। मुझे याद है, तुमने कहा था कि प्राइमरी में आगे बढ़ने का स्कोप नहीं है। छोटे बच्चों को पढ़ाने में तुम्हारा दिमाग खराब होता है, छोटे बच्चे ज्यादा शोर मचाते हैं। तुमको कहीं ना कहीं सैलरी भी प्राइमरी में कम लगती थी।

नवोदय में तुमको ₹10000 बढ़कर मिल रहे थे। तुम्हारी नज़र में रुपये की बहुत वैल्यू थी। ‘समय के साथ-साथ, इंक्रीमेंट के साथ साथ रुपये और बढ़ते चले जाएंगे और एक दिन यह सैलरी का अंतर काफी विशाल हो जाएगा’ ऐसा तुमने कहा था। मैंने तुमसे कितना मना किया था कि घर पर ही बेसिक विभाग में सहायक अध्यापक की नौकरी करते रहो, ज्यादा लालच करना ठीक नहीं है।

लेकिन तुम ना माने और अपना घर परिवार छोड़कर 700 किलोमीटर दूर जाकर मिर्जापुर नवोदय विद्यालय ज्वाइन कर लिया। मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि अब ऐसी कौन सी दिक्कत आ गई कि यह नौकरी तुम्हें अच्छी नहीं लग रही? और तुम सिर्फ समय काट रहे हो?

अब तो बड़े बच्चों को पढ़ाने में कोई दिक्कत ना होती होगी। अगर थोड़ी बहुत दिक्कत होती भी है तो क्या हुआ, रुपये तो तुम्हारी पसन्द के मिल रहे हैं?” राजेंद्र ने संतोष पर तंज कसा।

“स्कूल बढ़िया है। बच्चे भी ठीक है। लोगों की बोली में अंतर है बस। तनख्वाह भी बेसिक से लगभग ₹12000 ज्यादा है। लेकिन भाई अपना घर, अपना घर ही होता है। बेसिक में रहकर मुझे बड़ी पोस्ट और ज्यादा पैसे नजर आते थे। इनके चक्कर में मैंने क्या-क्या गंवा दिया? इसका एहसास मुझे अब हो रहा है।

पिताजी की 6 माह पहले मृत्यु हो गई है। माताजी बीमार रहती हैं। माताजी वहीं गृह जनपद में रहती हैं। मेरे साथ पत्नी और दोनों बच्चे रहते हैं। मैंने मम्मी पापा से काफी कहा कि मेरे साथ यहाँ रह लो लेकिन वे नहीं माने। वे अपना अंतिम समय अपने परिवार, दोस्तों के बीच बिताना चाहते थे।

अभी पीछे भी दो बार मम्मी की हालत काफी खराब हो गई थी। उनको अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था। मुझे यहां से छुट्टी ना मिल पाई। मैं चाह कर भी उनकी देखभाल न कर सका। मैंने वहीं करीब में रहने वाले अपने दोस्तों से माता को एडमिट करवाया और हॉस्पिटल का ऑनलाइन पेमेंट किया।

आए दिन उनकी तबीयत खराब रहती है। वे चाहती हैं और मैं भी चाहता हूँ कि उनके अंत समय में, बुढ़ापे में.. मैं उनके निकट रहूँ, उनके लिए कुछ करूँ…उनका ध्यान रखूँ। मगर मैं मजबूर हो गया हूँ। दिन-रात, सोते-जागते हमेशा मां-बाप, रिश्तेदारों, दोस्तों का ही ख्याल रहता है। उनके बारे में ही सोचता रहता हूँ।

मेरा कोई और भाई तो है नहीं, इसलिए सब जिम्मेदारी मेरे कंधों पर है। कितने हसीन दिन थे वे जब मैं बेसिक में नौकरी करता था, मात्र 45 मिनट में स्कूल से घर वापस आ जाता था। दोस्तों, रिश्तेदारों और परिवार को भरपूर समय दे पाता था। आज स्थिति बिल्कुल उलट है। मुझे इस बात का बड़ा मलाल रहता है कि मैं यहां परिवार से इतनी दूर क्यों आ गया?

वहीं घर में परिवार के साथ रहकर मजे से नौकरी करता। लेकिन आगे बढ़ने की महत्वाकांक्षी सोच और ढेर सारा पैसा जब आंखों के सामने हो… तो इंसान परिवार, रिश्तेदारों, दोस्तों को ताक पर रख देता है और बाद में जब उसे होश आता है तो पछताने के सिवा कुछ नहीं होता।

यही मेरे साथ हो रहा है। अच्छा हुआ जो तुमने नवोदय विद्यालय की नौकरी छोड़कर, घर पर ही बेसिक शिक्षा विभाग में नौकरी करना उचित समझा। कितना सही निर्णय था तेरा। काश मैं भी तेरी तरह दूरदृष्टि सोच का होता। तू किस्मत वाला है जो परिवार के साथ बैठकर रोटी खा रहा है।

यहाँ तो यही नहीं पता, कब घर जाना होगा? सिर्फ गर्मियों और जाड़ो की छुट्टियों में ही घर जा पाता हूँ। इस बीच अगर परिवार में कोई दिक्कत हो जाये तो साल में मिलने वाली 14 छुट्टियां सिर्फ आने-जाने में ही खर्च हो जाती है। मैं चाहकर भी घर पर माताजी के पास रुक नहीं पाता।”

संतोष बोलता जा रहा था और राजेंद्र चुपचाप उसकी बात सुन रहा था।

“यार तू सही कहता था कि व्यक्ति में संतोष होना बेहद जरूरी है। ज्यादा की चाहत में अपने चैन व सुकून में आग लगा लेना ठीक नहीं है। घर से बाहर अगर 15000 फालतू भी मिल रहे हैं तो वह किसी काम के नहीं क्योंकि बाहर रहने, खाने में इंसान उससे कहीं ज्यादा खर्च कर देता है।

उसके बाद बस भाग दौड़, हाय तौबा लगी रहती है। सुकून नाम मात्र के लिए नहीं मिलता। नई जगह जाकर फिर नए दोस्त बनाने में कोई मजा नहीं है। ऐसे दोस्त प्रोफेशनल होते हैं। केवल व्यक्तिगत फायदे की वजह से हमसे
जुड़ते हैं। सच्चे और अच्छे दोस्त बचपन के ही होते हैं जो जीवन के अंतिम समय तक, हर मोड़ पर निस्वार्थ भाव से हमारा साथ निभाते हैं और जरूरत पड़ने पर सवाल जवाब नहीं करते।”

“चल ज्यादा मत सोच, परेशान ना हो। खुद को ठीक कर। ज्यादा सोचने से भी दिमाग खराब रहता है। अब तो बस यही कहूंगा कि नौकरी तो करनी ही है, चाहे रो कर कर लो या हंसकर। छोड़ तो सकते नहीं। अच्छा, ये बता भाभी और बच्चे ठीक हैं?”

“तुम्हारी भाभी की भी थायरॉइड की दवा चलती रहती है। बच्चों ने भी बहुत दुखी कर रखा है। एक व्यक्ति हमेशा इन पर नजर रखने और ध्यान रखने के लिए चाहिए। तुम्हें तो पता ही है कि जब मेरी यहाँ पोस्टिंग हुई तो मेरा छोटा बच्चा 8 माह का था। बड़ा बच्चा तो गृह जनपद अमरोहा में ही घर पर अपने दादा-दादी के बीच रहकर पल गया।

उसका तो हमें पता ना चला। सुबह से शाम तक कोई ना कोई लाड़-प्यार-दुलार करके बच्चे को अपनी गोद में उठाये फिरता था, लेकिन इन छोटे बच्चों ने तो जीना हराम कर दिया। पहले स्कूल में जाकर बच्चों को पढ़ाओ, थक हारकर घर पर आओ तो बच्चों को संभालो।

तब जाकर श्रीमती जी खाना बना पाती हैं। बच्चों की वजह से रात में भी नींद पूरी नहीं ले पाते। यहाँ रहकर सारा दिन बच्चों में और घर के कामों में ही लगे रहना पड़ता है। इसलिए दो सालों से अपने किसी दोस्त से बात नहीं कर पाया। 1 मिनट के लिए भी आराम नहीं है। कई बार तो घर पर भी बात नहीं कर पाता हूँ।

तूने आज काल की, हाल-चाल पता किया तो अच्छा लगा। तुझसे अपने मन की बात बोलकर हल्का महसूस कर रहा हूँ। अब तू बता। मैं ही बोले जा रहा हूँ। तेरे यहाँ तो सब कुशल मंगल हैं?”

“जी भैया, सब ठीक हैं। मैंने तो यही सोच रखा था कि संतोष तो मुझे भूल गया है। पहले जब स्कूल जाते थे तो रास्ते में मुलाकात और बात हो जाती थी। मैंने सोचा- संतोष तो बात करेगा नहीं। मैं ही हर बार की तरह कॉल करके उससे उसका हाल-चाल पता कर लूँ। तुमसे बात करके मुझे भी अच्छा लगा। इस बार छुट्टियों में घर आना। हो सके तो मिलकर जाना। अगर घर ना आ सको तो मुझे बता देना। मैं तुमसे मिलने खुद तुम्हारे घर पहुँच जाऊंगा।”

“पक्का-पक्का। मैं इस बार छुट्टियों में तुमसे मिलने जरूर आऊंगा और तुम्हारे साथ-साथ हम अपने दोस्त सुरजीत के घर भी चलेंगे। वहीं बैठकर पंचायत मारेंगे। ठीक है राजेन्द्र भाई।”

“ठीक है भैया। चलो फोन रखता हूँ। अपना ध्यान रखना।” यह कहकर राजेंद्र ने फोन कट कर दिया।

शिक्षा:- संतोष सबसे बड़ा धन है, जिसे प्राप्त कर लेने के बाद सभी धन “धूल के समान” हो जाते हैं। संतुष्टि प्राप्त करने वाला व्यक्ति धन और भौतिक सुख सुविधाओं का अभाव होने पर भी हर हाल में खुश रहता है। लालच की वजह से व्यक्ति कभी भी संतुष्ट नहीं हो पाता और धनवान होते हुए भी गरीब बना रहता है।

असंतुष्टि की वजह से जीवन की सुख शांति गायब हो जाती है, फिर इंसान के पास पछताने के अलावा कोई चारा नहीं रहता। इसलिए हमें अपने बच्चों को शुरू से ही कम में ही संतोष करना सिखाना चाहिए। परिवार के साथ रहना, परिवार के साथ खाना और परिवार के बीच रहकर अपना सुख-दुख बांटना किस्मत वालों को ही नसीब होता है।

मां-बाप पूरी जिंदगी अपना खून पसीना बहाकर, अपना सुख चैन गंवाकर हमें कामयाब बनाते हैं। ऐसे में हमारा भी फर्ज बनता है कि हम उनको अंतिम समय में बेसहारा ना छोड़े, उनका सहारा बनें, उनकी देखभाल करें क्योंकि कल को हमें हमारे बच्चों से भी यही उम्मीद रहेगी।

मात्र चंद रुपए के लालच में मां-बाप, परिवार को छोड़कर बाहर बस जाना समझदारी भरा निर्णय नहीं होता। बहुत बार देखा गया है कि मां-बाप की चिता को भी अपने बेटे के द्वारा अग्नि नसीब नहीं होती। कृपया ऐसा करने से पहले, अपनी दूरदर्शी सोच से.. जिंदगी के हर पहलू के बारे में सोच-समझकर निर्णय लें और सबसे महत्वपूर्ण बात ‘संतोषी’ बनें।

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा

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