आश हम्द की शायरी | Aash Hamd Shayari

दोस्ती इक चराग़

दिल में जो इक चराग़ है, वो दोस्ती का है।
ग़म में भी जो निभा दे, वो साथ दोस्ती का है।

साए की तरह साथ जो हरदम रहे सदा
भूलकर भी न भूले वो दोस्ती का वादा

बे-लफ़्ज़ बात हो तो भी सब कुछ समझ ले वो
हमारी ख़ामोशियों को भी हमेशा ही सुन ले वो

ख़ुशियों में झूम ले, ग़मों में रो भी ले साथ
जीने का फिर मज़ा दे, वो दोस्ती का है हाथ

जो ऐब भी दिखाता है, मगर आईने की तरह
सच बोलकर वफ़ादारी निभाए, साए की तरह

काँटों पे भी चले तो हो चेहरे पे उसके तबस्सुम
जो दुःख में भी दवा दे, वो ही बन जाए मरहम

पूछो अगर ‘आश’ से के क्या चीज़ ख़ास है ?
जो रूह को सुकूं दे, बस वो दोस्त हमशनास हैं।

.“रिश्तों की बुनियाद”

हर एक रिश्ता फ़क़त अल्फ़ाज़ से तो बनता नहीं।
दिल से दिल तक सिलसिला जज़्बात से चलता नहीं।

जो भरोसे के चिराग़ से भी ना हो रौशन कभी,
ऐसा रिश्ता सिर्फ़ कुछ हालात से तो बनता नहीं।

एक तबस्सुब, एक नज़र, एक लम्हा ख़ामोशी का,
यह वो जुगनू है जो रात-ओ-रात निकलता नहीं।

रिश्ते मिट जाते हैं, अगर नींव में दरार पड़ जाए,
घर मोहब्ब्त का कभी माली-औकात से बनता नहीं।

ज़ख़्म देना हो अगर, तो दूर रहना ही बेहतर है,
साथ हर बार तल्ख़ बात से ही तो… छूटता नहीं।

जो समझते हैं सिफ़र लफ़्ज़ों की तहरीरें सारी,
उनसे रिश्ता बस किताबों की बात से बनता नहीं।

हर तबस्सुम की तह में दर्द सा भी शामिल रहा,
हर अश्क़ किसी शर्त पर बरसात में भीगता नहीं।

दिखावे की नहीं है ये कोई तिजारत ‘आश ‘
रिश्ता दिल का है, किसी सौगात से बनता नहीं

.“बदरा आई”

छाए हैं बड़े दिनों के बाद यह बदरा।
आए हैं लगाके जैसे आँखों में कजरा।

सूखी ज़मीन पे छा गई है हरियाली।
खुशियों में जैसे झूम रही हैं डाली डाली।

चिड़ियों की चहचहाहट से गूंजा है गगन।
झूमे हैं कोयल मोर पपीहा नाचे हैं मन ।

बारिश की बूँदें धरा को यूं भिगो रही हैं।
सहरा को जैसे सैराब वह कर रही हैं।

पेड़ों की डालियाँ बन गईं हैं जैसे झूले।
हर शाख पर पंछियों का झुंड हैं झूमे।

मन मस्त मलंग बना उड़ा जा रहा है।
झमझम बरसती बूँदों को ख़ुद में समा रहा है।

बरसों बाद आज खुलकर बरस रहे बदरा।
सराबोर हुआ तन, धुल गया गया है कजरा।

.“ख़ामोश कहकशां”

पलते हैं ख़्वाब कहकशां की गोद में,
चलते हैं उजाले चुपचाप तारों के संग में।
नीले अम्बर की छाँव में, है राहत बसी,
ख़ुदा की कोई दुआ हो जैसे अनकही।

हर सितारा ही दास्तानें हज़ारों कहता है,
वक़्त की नब्ज़ पे लम्हा-लम्हा बहता है।
देखे चाँद भी झाँककर इस सफ़र को,
कहकशां की बाहों में सुकून के पहर को।

लामहदुद आसमां की ये प्यारी झलक,
मन में भर देती है नयी हलचल, नयी चमक।
कभी गुनगुनाए वो गीत कोई अधूरा सा,
टिमटिमा कर दर्द बयां करे अपना पूरा सा।

हर राहगीर को कहकशां तू राह दिखाती है,
सफ़र मुश्किल हो या आसां तू ही हमराही है।
बहुत ही शोर है तुम्हारी ख़ामोशी में भी,
लफ़्ज़-लफ़्ज़ नुमायां है तेरी सरगोशी में भी।

“प्रेम मय जगत”

प्रेम से रौशन यह जगत सारा हो।
दिलों में उठता प्रेम का फव्वारा हो।

फिर न कहीं बात हो नफ़रत की
सारे जहान में अम्नो-फिज़ा हो।

प्रीत के रंगों से रंगीन हो दुनिया,
साथ फिर मोहब्बतों का कारवाँ हो।

माँ के दुआओं के जैसी हो छाँव,
ज़िंदगी जैसे खिलता गुलसिताँ हो।

रंज-ओ-ग़म को भूलकर आगे बढ़ें,
हर निगाह में मुस्कुराहट की दास्तां हो।

हाथों में हाथ रहे हमेशा अपनों के,
मिटे ग़म, ख़ुशियों का सिलसिला हो।

अलगाव की न चले कहीं कोई ज़िक्र,
प्रेम मय हो ये धरा, प्रेममय आसमां हो।

“निश्छल माहौल बनाएं”

चलो ! हम स्वप्न कुछ ऐसा सजायें
नफ़रतों का नहींं प्रेम का दीप जलाएं
स्वर शांति का हो हर दिशा में जहाँ,
ऐसा निश्छल वातावरण हम बनायें

हो न कोई शोर, न हो कोई घाव,
बसती हो सुख की हर दिल में छांव।
छल का पानी हो न जहाँ नज़रों में,
बस अपनापन हर बात में गहराएँ

मुहब्बतें हों जहाँ गले लगाने को,
पंछी आयें सुबह गीत सुनाने को।
धरती हँसे, अम्बर मुस्काए,
ऐसी सजीव धरा हम सजायें

भेदभाव की न हो कोई दीवार,
ज़ुबां से निकले न कटु व्यवहार।
हर इंसान को हम इंसान समझें
मन से मानवता को हम अपनाएं

चलो ! करें शुरू छोटे क़दमों से,
मुस्कुराहट बाँटें हर अम्ल से।
हर नफरतों को पिघलाते जाएं
चाहत हर दिल में बसाते जाएं।

हम ऐसा निश्छल माहौल बनायें
बस! प्यार, मोहब्बत का जहाँ बसायें।

टेक्नोलॉजी

टेक्नोलॉजी ने जहाँ
ज़िन्दगी को आसान किया है,
वहीं बहुत सी असुविधाओं से भी
दो-चार किया है।

ए.सी की ठंडी हवाओं ने
गर्मी से राहत तो दिलाई
मगर…जिस्म को हद से ज़्यादा
कमज़ोर किया है…….

रूम हीटर से सर्दियों की
शिद्दतें महसूस ना होती,
धूप की नर्म सी गर्माहट को भी
बदन से महरूम किया है

मोबाइल फ़ोन ने जहाँ
दूरियों को बदला है नज़दीकियों में
वहीं अपनों को भी
अपनों से दूर कर दिया है।

टेक्नोलॉजी अच्छी तो है, मगर
हानिकारक भी कम नहीं
कर दिया सुकून ख़त्म दिलों का
हँसी से ज़िंदगी को बेज़ार कर दिया है

.“इल्म की धूप”

कुछ भी नहीं है, इल्म से ज़्यादा चमकदार ।
इसकी रौशनी में, चमकता हमारा किरदार ।

मन के अंधेरे में पहुँचे जब इल्म की रौशनी ।
शब्दों में सत्यता की जान भर जाती दोगुनी ।

सत्य की राह पे चलते हुए मिलती दुश्वारियां ।
उनसे निपटने की हिम्मत दें इल्म की दुनियां ।

पशु-पक्षी, पेड़-पौधे,फूल पत्ती और कलियां ।
बताते, इनके पास भी है इल्म की तितलियां ।

ज़रूरी नहीं है सिर्फ़ किताबें ही सबक़ पढ़ाएं ।
नुक्ते लगाना तो हमें ज़िंदगी ने ही हैं सिखाए ।

जबतक हम जहालत की स्याही में रंगे रहेंगे ।
सही ग़लत को समझने से क़ासिर बने रहेंगे ।

आओ !‌ हम इल्म की धूप की किरणें बन जाएं ।
अपनी रौशनी से अंधेरे दिलों को नूर कर जाएं ।

“योग”

मन की उलझन, तन की थकन
योग है हर मुश्किल का हल।
जो लाए जीवन में नित्य संतुलन,
योग ही है वो अमूल्य धन।

जिस्म को जान से जोड़ता है जो,
भीतर की शक्ति पर उड़ता है जो।
कोई ढोंग नहीं, न स़िर्फ व्यायाम,
आत्मा का सच्चा संवाद है योग।

पहली किरण से होती है शुरुआत,
योग ही मन को करता है शांत।
हों पलकें बंद, ध्यान में डूबे रहें हम,
सांसों में हो सुकून की घड़ियां चंद।

21 जून मनता यह दिवस महान,
दिलाया विश्व को जिसने एक पहचान।
स्वस्थ जन-जन, भारत का अभियान,
भारत ने ही दिया विश्व को योग का वरदान।

आओ मिलकर हम लें एक प्रण,
योग से संवारे हम जीवन का हर क्षण।
न सिर्फ़ एक दिवस, न है यह सिर्फ़ पर्व,
योग ही बने जीवन का परम गर्व।

संघर्ष ही जीवन है

संघर्ष ही जीवन है इसके साथ ही आगे बढ़ना है,
एक बार चल पड़े हैं तो अब पीछे नहीं मुड़ना है।

ररुकावटें मौज बन आती ही जा रही हैं राहों में,
क़ैद है ज़िंदगी जैसे इस दुनिया की निगाहों में,

इन नज़र के सलाखों को हर हाल में तोड़ना है,
जब चल पड़े हैं तो अब पीछे नहीं मुड़ना है।

पांव में पड़ रहे हैं छाले, फिर भी हम चल रहे हैं,
सारी तकलीफों को तज कर हम आगे बढ़ रहे हैं,

अब इस दर्द को ही अपनी ताकत मुझे बनाना है,
जब चल ही पड़े हैं तो अब पीछे नहीं मुड़ना है।

“सुनो ऐ जिंदगी” तुम और कितना मुझे सताओगी,
गिराओगी जितना और उठता ही मुझे पाओगी,

ज़िन्दगी तुझको तो अब मेरे संग संग ही चलना है,
जब चल पड़े हैं तो अब पीछे नहीं मुड़ना है।

लाख जतन करले कोई अब मुझे डिगा नहीं सकता,
चट्टानी इरादों को अब तो मेरे मिटा नहीं सकता,

पत्थरों पर चलकर ही मंजिल तक मुझे पहुंचना है,
एक बार चल पड़े हैं तो अब नहीं पीछे मुड़ना है।

ज़िन्दगी क्या है

सबकी अपनी सोच है, अपना ही नज़रिया है,
ज़िंदगी है एक सफ़र, और ख़्यालों का दरिया है,

तदबीर करें ऐसी , बनाए मोहब्बतों की दुनिया,
सुर्खरु लौटें घर, बेहतरीन आमाल बने ज़रिया,

कभी सोचा ज़िन्दगी क्या है, क्यों आए जहां में,
क्यों भेजा हमें ख़ुदा ने, इस किराए के मकां में,

मज़लूमों पर रहम का, जज़्बा हो हमारे दिल में,
यूँ ही नहीं आज़माता ख़ुदा, डालकर मुश्किल में,

मत रखो दिलों में रंज़िशें, ये ज़िन्दगी तो फ़ानी है,
मोहब्बतें बाँटें पल में हयाते-परिंदे को उड़ जानी है!

Aash Hamd

आश हम्द

पटना ( बिहार )

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