Avsar

अवसर | Avsar

अवसर

( Avsar ) 

 

अतीत को हवा तो नही दी जाती
पर,अतीत को भुलाया भी नही जाता
उड़े हों वक्त के परखच्चे जहां
उसे भी तो राख मे दबाया नही जाता

माना बदलाव नियम है प्रकृति का
तब भी तो ढलना ढालना होता है
न चाहे यदि बदलना कभी एक तो
दूसरे को भी खुद मे बदलना होता है

कट्टरता मे विवेक नही होता
सहनशीलता मे कट्टरता नही होती
सुख जाते हैं वो दरख़्त हरे भरे
जिनकी जड़ें मजबूत नही होती

खंडहर होते हैं गवाह आंधियों के
पर,आंख के अंधों को दिखते नही
मर ही गया हो जब स्वाभिमान जिनका
कौन कहता है वो कल भी बिकते नही

आज आपका,कल वक्त किसी और का
भरोसा करें भी कैसे,दोगले खून का
जागो,जागकर देखो कल को अपने
कल देगा न अवसर एक भी जून का

 

मोहन तिवारी

( मुंबई )

यह भी पढ़ें :-

गुस्ताखी | Gustakhi

Similar Posts

  • मतदान करना | Matdan Kavita

    मतदान करना ( Matdan karna )   बात मानो हमारी सारी जनता । वोट डालने तो जाना पड़ेगा।। लोकतंत्र की यही है जरूरत। इसे मजबूत करना पड़ेगा।। यह जो अधिकार सबको मिला है। यही कर्तव्य करना पड़ेगा ।। चाहे लाखों हों काम वोट के दिन। पर समय तो निकालना पड़ेगा।। एक-एक वोट रहता जरूरी ।…

  • लक्ष्य

    लक्ष्य   है दुनिया में ऐसा कौन? जिसका कोई लक्ष्य न हो।   तृण वटवृक्ष सिकोया धरा धरणीपुत्र गगन हो।   प्रकृति सभी को संजोया कण तन मन और धन हो।   खग जल दिवा-रजनी बाल वृद्ध जन व पवन हो।। है दुनिया ०   सब संसाधन यहीं हैं,सही है, कहां दौड़ते ऐ विकल मन…

  • प्रतिशोध | Pratishodh

    प्रतिशोध ( Pratishodh )   मै हार नही सकता फिर ये, जंग जीत दिखलाऊंगा। फिर से विजयी बनकर के भगवा,ध्वंजा गगन लहराऊगा।   मस्तक पर चमकेगा फिर सें, चन्दन सुवर्णा दमकांऊगा। मै सागर जल तट छोड़ चुका पर,पुनः लौट कर आऊँगा।   जी जिष्णु सा सामर्थवान बन, कुरूक्षेत्र में लौटूंगा। मैं मरा नही हूँ अन्तर्मन…

  • यक्ष प्रश्न | Yaksha Prashna

    यक्ष प्रश्न ( Yaksha Prashna )    परिवार हि समाज की वह इकाई है जहां से ,स्वयं समाज और देश का निर्माण होता है व्यक्ति ही एक मे अनेक और अनेक मे एक का प्रतिनिधित्व करता है…. प्रश्न तभी है की क्या एक व्यक्ति ही समाज का आधार है या,समाज ही व्यक्ति का ? हां,दोनो…

  • बता दो | Bata Do

    बता दो ( Bata Do ) पत्थर दिल तो नहीं हो तुम वह बर्फ भी नहीं हो जो पिघल जाए ताप पाकर बहती प्रवाह मय धारा भी नहीं हो जो कर दे शीतल समीर को तब क्या हो तुम क्या सिर्फ कल्पना मात्र हो मस्तिष्क की या कोई एहसास हो धड़कन की या सिर्फ सपने…

  • सौगंध मुझे है इस मिट्टी की | Desh prem ki kavita

    सौगंध मुझे है इस मिट्टी की ( Saugandh mujhe hai is mitti ki )     सौगन्ध मुझे है इस मिट्टी-की कुछ ऐसा कर जाऊॅंगा, अपनें वतन की सुरक्षा में दुश्मनों को धूल-चटाऊॅंगा, नक्सली हों चाहें घुसपैठी इन सबको मार गिराऊॅंगा। ऑंधी आऍं चाहें तूफ़ान आऍं मैं चलता ही जाऊॅंगा।।   साहस और ज़ुनून के…

One Comment

  1. Bhut achi hai aap ki kavitayen 🙏🙏🙏🙏🙏🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *