बात

बात

बात

**

रात हुई
ना बात हुई
क्या बात हुई?
कुछ खास हुई!
नाराज हुई
नासाज हुई
ऐसी क्यों हालात हुई?
बड़ी खुश थी!
जब मुलाकात हुई
फिर इस खामोशी की
वजह क्या हुई?
जो वो रूठ गई
क्या सचमुच मुझसे कुछ भूल हुई?
क्या बात ही कोई चुभ गई?
जाने एकदम क्यों वो चुप हो गई?
ऐसे तो ना चलेगा!
बातों से ही हल निकलेगा
खामोशी दूरियां बढ़ाएंगी
गलतफहमियां बढ़ती जाएंगी
मन में घाव कर जाएंगी
बातें ही बात बनाएगी
मुश्किल हालात से निकाल लाएगी
प्रेम की गाड़ी फिर से पटरी पर दौड़ाएगी
बहारें फिर से जीवन में लौट आएंगी।

 

?

नवाब मंजूर

लेखक-मो.मंजूर आलम उर्फ नवाब मंजूर

सलेमपुर, छपरा, बिहार ।

यह भी पढ़ें :

जिंदगी

Similar Posts

  • उबारो गणपति | Ubaro Ganpati

    उबारो गणपति ( Ubaro Ganpati ) हे गणपति बप्पा!गणनायक। विघ्नहर्ता सिद्धि विनायक।। हम तो हैं भक्त प्रभु नादान। आए हैं शरण दयालु जान।। रखिए प्रभु हमारा भी मान। दीजिए हमारी ओर ध्यान।। हमको निहारिए सुखदायक। हे गणपति बप्पा!गणनायक ।। भटक रहे जग की माया में । मैल चढ़ रहा इस काया में ।। अंधकारमय है…

  • सड़क

    सड़क   पहुंच सुदूर क्षितिज धरा तक सुंदर रेखा मात्र दिखती हूं, श्याम वर्णी स्वस्थ सलोने गात दिन रात अटखेलियां खेलती हूं, पकड़ पगडंडी की राह पाया चतुर्भुज रूप चंचला आगे बढ़ती,संवरती हूं अनुपम अवतरित छटा, अव्यवस्थित पर अति आर्द्र शीत की उष्णता में तपती हूं।। अवस्थापन से हर्षातिरोक्ति हुयी कब जब मेरे कतरों की…

  • हृदय के गाँठ | Kavita hriday ke ganth

    हृदय के गाँठ ( Kavita hriday ke ganth )   1. हृदय के गाँठ खोल के,आओ बात बढाते है। परत दर परत गर्द है, आओ उसे उडाते है। ये दुनिया का है मेला,भीड मे सब अन्जाने से, पकड लो हाथ मेरा तो,दिल की बात बताते है।   2. खुद लज्जाहीन रहे जो, वो तेरी क्या…

  • मुक्तिपथ

    मुक्तिपथ चल पड़ा हूँ मैं,बंधनों की राख से उठकर,स्वप्नों के नभ को छूने जहाँ विचार, वाणी और विवेकस्वाधीन साँसें लेते हैं। नहीं चाहिए अबवह शांति,जो चुप्पियों की बेड़ियों में बंधी हो,न वह प्रेम,जो स्वार्थ के कटघरों में सज़ा काटे। मैं चाहता हूँएक उजासजो भीतर से फूटे,एक सत्यजो भय से नहीं, आत्मा से उपजे। संस्कारों की…

  • अभाव | Abhaav

    अभाव ( Abhaav )   अंधेरा न होता तो सवेरा न होता होता न दिन तो रात भी न होती यही तो है सच्चाई भी जीवन की होता सबकुछ तो कुछ भी न होता.. न होती किसी को जरूरत किसी की न किसी को किसी की पहचान होती न होती भूख किसी को न प्यास…

  • कागज और नोट | Kagaz aur Note

    कागज और नोट  ( Kagaz aur note )    बचपन में पढ़ने का या अच्छा कुछ करने का मन कहां? और कब? होता है। पर मां समझाती थी एक ही बात बताती थी पढने से कुछ करने से पैसा आता है सहूलियत आती है और ज़िंदगी सुधर जाती है। चड़ पड़ा बस्ता लिए स्कूल को,…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *