बचपन | Bachpan

बचपन

( Bachpan ) 

ना जाने हम कब बडे होगये,
माँ पकड़ के उगली चलना सिखाती थी।
आज खुद ही चलने के काबिल हो गये,
कल हम बच्चे थे, आज ना जाने इतने बड़े हो गये..
परिवार से दूर हो गए दोस्तो से पास हो गये,
वो बचपन मेरा था बहुत ही खुबसुरत |
पल मे हँस लिया करते थे, पल मे रो दिया करते थे।
ना ही कोई था इतना बोझ रिति रिवाजो का,
ना थी किसी भी जिम्मेदारी की फिक्र हमें
पेपर के वक्त हो जाती थी थोड़ी टेंशन सी
लेकिन फिर वही पेपर के बाद वो ही मस्ती
हंसते खेलते मुस्करा लिया करते थे ||
आज भी वो बचपन बहुत याद आता है
याद आते है वो बचपन के दोस्त और वो पल
कहते है बीते हुए पल कभी लौटकर नहीं आते
मुझे आज भी बहुत याद आते है वो बचपन के दिन
काश कोई मुझे लौटा दे वो मेरा खेलता हुआ बचपन.

नौशाबा जिलानी सुरिया
महाराष्ट्र, सिंदी (रे)

यह भी पढ़ें :-

अध्यापिका | Adhyapika

Similar Posts

  • हे! माॅं | Kavita Hey Maa

    हे! माॅं ( Hey Maa )   हे मां आ जा तू फिर से तेरे आंचल में छिप जाऊं , मैं बैठ गोंद में तेरे फिर देख तुझे मैं पांऊ। तू लिए वेदना असीमित पाली भी मुझको कैसे? तेरी त्याग तपस्या करुणा नैनों से झरते आंसू गिरते तेरे आंचल में मैं भूल जिसे ना पाऊं।…

  • सुकून की जिंदगी | Chhand sukoon ki zindagi

    सुकून की जिंदगी ( Sukoon ki zindagi ) मनहरण घनाक्षरी   दो घड़ी पल सुहाने, सुकून से जीना जरा। गमों का भी दौरा आये, हंस हंस पीजिए।   सुख से जियो जिंदगी, चैन आए जीवन में। राहत भरी सांस ले, खूब मजा लीजिए।   भागदौड़ सब छोड़, होठों से मुस्कुराइये। सुकून की सांस मिले, जियो…

  • ऐसी वो अनपढ़ पीढ़ी | Kavita Aisi wo Anpadh Pidhi

    ऐसी वो अनपढ़ पीढ़ी  ( Aisi wo anpadh pidhi )   हम है! हिन्दी भाषा के लेखक, कोई न समझे हमें चाहें बेशक। घूमती है यह एक बात मस्तक, कोई मिल जाये नूतन शीर्षक।। दिन में मिलता ना हमें आराम, रात्रि लिखनें में करतें है ख़राब‌। कब हुई आधी कब भौर ये हुई, मुझे लगा…

  • उसकी औकात | Kavita Uski Aukat

    उसकी औकात ( Uski Aukat ) करते हैं काम जब आप औरों के हित में यह आपकी मानवता है करते हैं आपके लिए लोग जब काम तो यह आपकी महानता है बड़े खुशनसीब होते हैं वो लोग जिन्हे फ़िक्र और की होती है बदनसीब तो बेचारे खुद के लिए भी कुछ कर नही पाते इच्छाएं…

  • किताबी ज्ञान | Geet kitabi gyan

    किताबी ज्ञान ( Kitabi gyan )   जीवन का अनुभव सच्चा है झूठा है अभिमान ढाई आखर प्रेम का सच्चा व्यर्थ किताबी ज्ञान सभ्यता संस्कार जीवन में व्यवहार सिखाते हैं किताबी ज्ञान के दम पर मानव ठोकरें खाते हैं हम तूफां से टकराते हैं माना पुस्तक मार्गदर्शक राह सही दिखलाती है असल जिंदगी में तो…

  • धरा हरसाई | Chhand Dhara Harsai

    धरा हरसाई  ( मनहरण घनाक्षरी )    वसुंधरा मुस्काई है, ऋतु बसंत आई है। खिलने लगे चमन, बहारें महकती। झूम उठी धरा सारी, नाच रहे नर नारी। पुष्प खिले भांति भांति, चिड़िया चहकती। अवनी अंबर सारे, नभ मे दमके तारे। वादियों में गूंज रही, धमाले धधकती। हरी भरी हरियाली, घर घर खुशहाली। रंगों की रंगत…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *