बेवफा जमाने को | Bewafa jamane ko

बेवफा जमाने को

( Bewafa jamane ko )

 

न गुनगुनाया करो, तुम मेरे फसाने को।
याद जब मेरी नहीं ,बेबफा जमाने को।।

 

अपना बस्ता वो खिलौने, वहीं पे बेच दिए
घर से निकला था इकरोज़,जब कमाने को।

 

है अजीब शहर ,यहाँ पर मत आना
यहाँ न राह कोई घर को लौट जाने को।।

 

उसने मेहनत से, गोदाम सारे भर डाले
जिसके बच्चे तरस रहे हैं, चार दाने को।।

 

अब तल्ख उससे मैं नहीं रूठा
पता है वो नहीं आता, कभी मनाने को।।

 

यहाँ तो सबके पास, इक नयी कहानी है
सुनेगा कौन “चंचल”, तेरे तराने को।।

 

🌸

कवि भोले प्रसाद नेमा “चंचल”
हर्रई,  छिंदवाड़ा
( मध्य प्रदेश )

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