Pita chhand

पिता | Pita chhand

पिता

( Pita )

कृपाण घनाक्षरी

 

पिता प्रेम का सागर,
अनुभवों का खजाना।
शिक्षा संस्कार देकर,
देते जीवन संवार।

 

सबका देते साथ वो,
हंस हंस बतियाते।
दरिया दिल पिता का,
करते खूब दुलार।

 

पिता संबल हमारा,
पीपल की ठंडी छांव।
झरना वो प्यार भरा,
बहती स्नेह बयार।

 

संघर्षों से भिड़ जाते,
हर आंधी तूफान में।
राहत का ठिकाना वो,
मेरा है प्यारा संसार।

?

कवि : रमाकांत सोनी सुदर्शन

नवलगढ़ जिला झुंझुनू

( राजस्थान )

यह भी पढ़ें :-

फूल और कांटे | Phool aur kaante | Kavita

Similar Posts

  • गीले नयन | Geele Nayan

    गीले नयन ( Geele nayan )  हो गये गीले नयन, बीता हुआ कुछ याद आया। मूल प्रति तो खो गई, उसका सकल अनुवाद आया। चित्र जो धुंधले हुये थे इक समय की धूल से। आ गया झोंका पवन का खिल उठे फिर झूल से। जो हुआ, कैसे हुआ सब कौन छल कर चल दिया। व्यथित…

  • कहीं किसी रोज | Kahin kisi roz | Kavita

    कहीं किसी रोज ( Kahin kisi roz )   आओ हम चले कहीं मिले कभी किसी रोज। महफिल जमाकर बैठे मौज से करेंगे भोज। पिकनिक भ्रमण करें घूमे हसी वादियो में। झूमे नाचे गाए हम जा बेगानी शादियों में। सैर सपाटा मौज मस्ती आनंद के पल जीये। खुशियों के मोती वांटे जीवन का रस पीये।…

  • बेमौसम बरसात | Be Mausam Barsat par Kavita

    बेमौसम बरसात ( Be mausam barsat )    ओला आंधी तूफां आए, घिर आई काली रात। धरती पुत्र सुस्त हो गए, हुई बेमौसम बरसात। फसल खड़ी खेत रबी की, आने को हुई वैशाखी। जमीदार मुंह ताक रहा, अब कर्ज चुकाना बाकी। बिन बुलाए मेहमान आए, ज्यों बेमौसम बरसात। अपने भी मुंह फेर रहे, ना पूछे…

  • इंसान स्वयं को तू पहचान | Insan par kavita

    इंसान स्वयं को तू पहचान! ( Insan swayam ko to pehchaan )  ऐ इंसान स्वयं को तू पहचान! जन्म हुआ किस हेतु तुम्हारा ? इस दुनिया जहान में, मानव खुद को तू पहचान रे। पेश करो तू मानवता की मिशाल, टिकते वही धरा पर जिनके होते हृदय विशाल। ऐ इंसान स्वयं को तू पहचान, विनम्रता…

  • नाकाम | Kavita Nakaam

    नाकाम ( Nakaam ) दुनिया की उम्मीदों पर खरा ना उतर सका मैं। ज़िंदा रहते खुद को मरा ना समझ सका मैं। अपने कद का अंदाज़ा सदा रहा मुझे। अफसोस है कि खुद से बड़ा ना बन सका मैं। एक उनके लिए, और दूसरा अपने लिए ऐसे दोहरे चरित्र का प्रहसन ना पहन सका मैं।…

  • सावन | Sawn par Kavita

    सावन ( Sawan ) सावन सरस सुखमय सुधा बरसा रहा, कलियन के संग मधुकर बहुत हर्षा रहा।।   नभ मेघ गर्जत दामिनी द्युतिया रही, प्रिय कंत केहि अपराध बस न आ रहा।।   ज्येष्ठ की सूखी धरा तरुणित हुयी, मोरनी संग मोर बहु सुख पा रहा।।   बारिश की शीतल बूंदें तन जला रही, हे…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *