दुर्गे माँ

भीड़ भक्तों की मय्या तेरे द्वार है

भीड़ भक्तों की मय्या तेरे द्वार है

भीड़ भक्तों की मय्या तेरे द्वार है
इनकी कश्ती फँसी आज  मझधार है

जब भी भक्तों पे संकट की आई घड़ी
दुर्गे माँ ने लिया तब ही अवतार है

दैत्य दानव दरिंदों के संहार को
माँ उठाती सदा अपनी तलवार है

झूमते नाचते धुन पे गरबे की सब
हर्ष उल्लास भरता ये  त्यौहार है

आये हैं सब दुखी तेरे दरबार में
पास तेरे दया का जो भण्डार है

माँ के जयकारे से ही फ़कत कामिनी
मेरी नैया भंवर से हुई पार है

डॉ कामिनी व्यास रावल

(उदयपुर) राजस्थान

यह भी पढ़ें:-

Similar Posts

  • बस आज बस | Bas Aaj

    बस आज बस ( Bas aaj bas )    जद्दोजहद दुश्वारियां कुछ कश्मकश बस आज बस मैं गुनगुनाना चाहती बजने दो कोई साज़ बस। वो फ़िक्र रंजो गम ज़फा तन्हाइयों की बात को तुम छोड़ दो जो हैं ख़फा रहने दो अब नाराज़ बस। हो गुफ्तगू तो बात कुछ लग जाती है उनको बुरी हमने…

  • ज़िंदगी बदरंग है | Ghazal Zindagi Badrang Hai

    ज़िंदगी बदरंग है ( Zindagi Badrang Hai )   नफ़रतों से प्यार की अब जंग है हर ख़ुशी से ज़िंदगी बदरंग है अंजुमन में कुछ हुआ ऐसा यहाँ देखके ही रह गया दिल दंग है ख़ाक कर दे दुश्मनों को ए ख़ुदा कर रहा जो मुफलिसों को तंग है अंजुमन में कर रहा वो फ़ासिला…

  • नाम तेरा | Naam Tera

    नाम तेरा ( Naam Tera ) नाम तेरा सदा गुनगुनाता रहा । मन ही मन सोचकर मुस्कराता रहा ।। जब कभी ख्वाब में आप आये मेरे । रात फिर सारी घूँघट उठाता रहा ।। क्या हुआ मुश्किलों से जो रोटी मिली । प्रेम से तो निवाला खिलाता रहा ।। बद नज़र है जमाने की सारी…

  • बेवफ़ा ही सब मिले है | Bewafa hi Sab Mile Hai

    बेवफ़ा ही सब मिले है ( Bewafa hi sab mile hai )    है गिला उस दोस्ती से ? दिल भरा नाराज़गी से वो नज़र आया नहीं है आज गुज़रा उस गली से छोड़ दें नाराज़गी सब तू गले लग जा ख़ुशी से ये वफ़ा देती नहीं है मोड़ लें मुंह आशिक़ी से गुल उसे…

  • हो रही है | Ho Rahi Hai

    हो रही है ( Ho Rahi Hai ) कहीं उल्फ़त ही उल्फ़त हो रही है।कहीं नफ़रत ही नफ़रत हो रही है। कहीं आराम से सोते हैं लीडर।कहीं मेह़नत ही मेह़नत हो रही है। उन्होंने ह़ाल क्या पूछा हमारा।मुसर्रत ही मुसर्रत हो रही है। न रोटी है न पानी है न बिजली।मशक़्क़त ही मशक़्क़त हो रही…

  • कर दे जो दूर ग़म

    कर दे जो दूर ग़म कर दे जो दूर ग़म को किसी में हुनर नहींयारब क्या ग़म की रात की होगी सहर नहीं तड़पे जिगर है मेरा ये उनको ख़बर नहींये आग इश्क़ की लगी शायद उधर नहीं घर से निकलना आज तो मुश्किल सा हो गयामहफ़ूज नफ़रतों से कोई रहगुज़र नहीं चलती है चाल…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *