बुलावा माँ का
बुलावा माँ का
कहाँ पिकनिक मनाने को वो नैनीताल जाता है,
बुलावा माँ का आये तो वहां हर साल जाता है,
खुले बाज़ार में जबसे बड़े ये मॉल हैं यारों,
दुकानों से कहाँ फिर कोई लेने माल जाता है,
बहुत तारीफ करता है सभी से माँ की तू अपने,
मगर कब पूछने तू अपनी माँ का हाल जाता है
रसूखों ने उठाया फ़ायदा नित हम शरीफ़ो का
ज़रा सी भी खता हो तो बज़ा वो गाल जाता है
खुदा भी तो न पहले से रहे अपने यहाँ यारों
मुरादें आज तो अपनी सभी वो टाल जाता है
खता जब सुन ली हो मैय्या सजा फिर क्यों नही देती
पलट कर देख लो छुपकर तुम्हारा लाल जाता है
किसी की बात पर इतना भरोसा मत प्रखर करना
जो बातों का तुम्हीं पर जाल अपना डाल जाता है

( बाराबंकी )
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