Chadhate suraj

चढ़ते सूरज | Chadhate suraj

चढ़ते सूरज

( Chadhate suraj )

 

चढ़ते सूरज की सवारी मेरे सिर पे आ गई ।
हम सफर थी मेरी परछाई उसे भी खा गई ।।

 

आपको जुल्मों का कर के तजुर्बा तारीफ में ।
कर रहा था बयां कड़वाहट जुबां पे आ गई ।।

 

सहन करने के अलावा और कुछ वश में नहीं ।
हादसों के बीच में इतनी अकल तो आ गई ।।

 

आ गया आगाज से अंजाम की जानिव सफर ।
जो चली तहरीर झवले से कफन पर आ गई ।।

 

इन्तजारे  यार  बस्ले  मौत  का  बाइस  बना ।
इश्क की अंजाम तक ‘कौशल’ कहानी आ गई ।।

 

✍?

 

लेखक : : डॉ.कौशल किशोर श्रीवास्तव

171 नोनिया करबल, छिन्दवाड़ा (म.प्र.)

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ग़ज़ल | Ghazal par Ghazal

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