चीर हरण (ककहरा)
चीर हरण (ककहरा)

चीर हरण (ककहरा)

 

कुरुवंश सुवंश में आगि लगी

कुरुपति द्युत खेल खेलावत भारी।

 

खेलने बैठे हैं पांच पती

दुर्योधन चाल चलइ ललकारी।

 

गुरुता गुरु द्रोण की छीन भई

संग बैठे पितामह अतिबलकारी।

 

घर जारत है फुफकारत है शकुनी

जस मातुल कुटिल जुवारी ।

 

चुपके-चुपके कछु बात करें

दुर्योधन करन लजात नहीं है।

 

छिपती डरती हम जात मरी

अंधरा बहिरा मरि जात नहीं है।

 

जिनके बलभार संसार डरे

पांच पती बतियात नहीं है।

 

झकझोरि मरोरि के खींचत है

दुशासन मानत बात नहीं है।

 

टूटिहीं पनवां जइहीं जनवां

बिरना तब आई के का करब्य।

 

ठठरी हमरी जइही उघरी

बहिन गोह राइ का पइब्य।

 

डटि चीर दुशासन खींचत है

अब देर लगाइ के का पइब्य।

 

ढरकी अंखियां न फटी छतिया

ई सुदर्शन ताइ के का करब्य।

 

तकती रहिया हम हारि गयी

लजिया अब जाइ रही बनवारी।

 

थतिया हमरी अंगुरी में बंधी

सुतवा मुरवा सब काहे बिसारी।

 

दस सहस बल हारि रहे

अब चीर बढ़ाई रहे गिरधारी।

 

धरती पर पाप उतारन के हित

बहु अवतार लिये हैं मुरारी।

 

🌻

लेखक: शेष मणि शर्मा “इलाहाबादी”
प्रा०वि०-बहेरा वि खं-महोली,
जनपद सीतापुर ( उत्तर प्रदेश।)

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