योग
योग
( दोहा आधार छंदगीत )
श्वास और प्रश्वास से, समता भाव निखार।।
योग मिलन है मुक्ति है, योग ही शाश्वत सार।
समय निकालो योग का, करिए प्राणायाम।
स्वस्थ्य शरीर रहे सदा, चित्त वृत्ति परिणाम।।
ध्यान धारणा यम-नियम, आसन प्रत्याहार।
योग मिलन है मुक्ति है, योग ही शाश्वत सार।
चित्तवृत्ति को साधकर, स्थिर करता योग।
आसन विविध प्रकार के, रखते हमें निरोग।।
ध्यान योगबल सूत्र का, करिए खूब प्रसार।।
योग मिलन है मुक्ति है, योग ही शाश्वत सार।
पूरा शास्त्र विधान ये, षटदर्शन में एक।
दिया पंतजलि ने हमें, योग ज्ञान नित नेक।।
अन्तरमन की साधना, शक्ति का संचार।
योग मिलन है मुक्ति है, योग ही शाश्वत सार।

श्रीमती अनुराधा गर्ग ‘ दीप्ति ‘
जबलपुर ( मध्य प्रदेश )







