गणपत लाल उदय की कविताएं | Ganpat Lal Uday Poetry

विषय सूची

मां नील सरस्वती का प्रतीक

बहुत निराली और रहस्यमयी है जिसकी ये कहानी,
समुद्र मंथन से प्रकट हुआ सुना बुजुर्गो की ज़ुबानी।
उन 14 रत्नों में से एक है ऐसा कहते समस्त ज्ञानी,
हरसिंगार पारिजात शेफाली कहते कोई रातरानी।।

कल्पवृक्ष भी कहते इसको जो रोपा गया इन्द्रलोक,
संपूर्ण रात सुगंध बिखेरता फूल जिसका इन्द्रलोक।
आमतौर पर यह देर शाम अथवा रात में है खिलता,
कई रोगों में लाभकारी पौधा लाये कृष्ण नरलोक।।

फूल पत्ते छाल और लकड़ी इसके है बेहद उपयोगी,
ज्वर जोड़ों के दर्द सूजन जैसी बिमारी में सहयोगी।
नीचे बैठकर मन्नत मांगने से कहते होती है वह पूरी ,
तुलसी के संग घर में लगाने से होता शुभ संयोगी।।

शास्त्रों में कहा है इससे नकारात्मक ऊर्जा दूर होती,
धन घर में आता मानसिक तनावों से मुक्ति मिलती।
कुदरत का है अजब करिश्मा आनंद अनुभूति होती,
सायटिका पीड़ित को इससे कष्ट से मुक्ति मिलती।।

पुष्प देने वाला वृक्ष है यह जो 50 फिट ऊंचा जाता,
सफ़ेद फूलों से सुसज्जित केसरिया डंडी जो रहता।
नारंगी लाल केन्द्र सफेद फूल शरद ऋतु में खिलता,
मां नील-सरस्वती प्रतीक वृक्ष 5000 साल रहता।।

एक भारतीय आत्मा

हिंदी साहित्य के प्रख्यात कवि, लेखक व पत्रकार,
सरल ओजपूर्ण खड़ी-बोली प्रवाहमयी रचनाकार।
राष्ट्रभक्ति कविताओं के कारण जीतें ढ़ेरों पुरस्कार,
पद्मभूषण से सम्मानित आप हुए भारत सरकार।।

०४ अप्रेल १८८९ को जन्मे होशंगाबाद मध्यप्रदेश,
देश प्रेम एवं भगवत प्रेम का दिया जिन्होंने संदेश।
प्रभा पत्रिका का संपादन शुरु कर किया श्रीगणेश,
अत्यंत लोकप्रिय हुई रचनाएं जिनकी देश प्रदेश।।

“एक भारतीय आत्मा” से भी है उनकी ये पहचान,
तीन आयाम मुख्य थें सृजनात्मक यात्रा के दौरान।
पहला पत्र-पत्रिका संपादन, दूसरा साहित्य सृजन,
तीसरा उनका प्रत्यक्ष रुप से करना ये व्याख्यान।।

संस्कृत-गुजराती, बांग्ला, अंग्रेजी का किया पढ़ाई,
स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहकर भूमिका निभाई।
प. माखनलाल चतुर्वेदी था उस महापुरुष का नाम,
सांस्कृतिक सचेतता, विनम्रता से पहचान बनाई।।

आज माखन लाल चतुर्वेदी नाम से है ढ़ेरों संस्थान,
उनके गद्य पद्य प्रसिद्ध कृतियों से मिलता है ज्ञान।
साहित्य के देवता समय के पाॅंव व कृष्णार्जुन युद्ध,
पुष्प की अभिलाषा अमर राष्ट्र अग्निपथ बखान।।

पढ़ना इन खिताबों को

भूत व भविष्यकाल दोनों की सैर किताबें कराती है,
बेहतरीन विकास के लिए उपयुक्त किताबें होती है।
अपने अनुभव एवं लेखन से लेखक जिसे सींचते है,
ज्ञान कल्पना रचनात्मक का स्रोत किताबें होती है।।

पढ़ना इन्हीं किताबों को आगे सबको यह बढ़ाती है,
बेरोज़गार से मुक्त कराकर रोज़गार यह दिलाती है।
गणित अंग्रेजी विज्ञान विषयों मे हिन्दी हमें भाती है,
सामाजिक भूगोल सामान्यज्ञान पहचान बढ़ाती है।।

एक रचनाकार की रचनाओं का यह एकान्तवास है,
कागज़ का पन्ना न समझें इससे ही मंज़िल पास है।
मानसिक शान्ति के लिए मानव थेरेपी या ईलाज है,
जब रचता है यह कवि रचना बन जाता देवदास है।।

ज्ञानी बनने के लिए हजारों किताबें पढ़नी पड़ती है,
नियमित इन्हें पढ़ने पर याददाश्त बढ़ोतरी होती है।
अगर रात्रि में पढ़ते है तो सुकून भरी निंद्रा आती है,
कठघरे में खड़े व्यक्ति को भी बाहर खींच लाती है।।

यह समस्त किताबें एक दर्पण की तरहा ही होती है,
जो संवेदनशील, संतुलित व आत्मनिर्भर बनाती है।
इसी के पन्नों में सबक सपने दर्द हंसना उपलब्धि है,
सबको अपना मुखोटा जो साफ-साफ दिखाती है।।

गेहलपुर हिंगलाज माता

मनोकामनाएं सारी पूर्ण करती यह माता हिंगलाज,
हज़ारों साल पुराना मंदिर जो गेहलपुर में है आज।
शांति एवं सुकून मिलता जहां ऐसा पवित्र ये स्थान,
प्राचीन कथानुसार प्रथम कुलदेवी चारण समाज।।

मूल स्थान का प्रतीक मंदिर है ब्लूचिस्तान में आज,
उसी का दुर्लभ जागृत रुप यह अजमेर राजस्थान।
अरांई क्षेत्र में पड़ता है ये जिसके खुल रहें ढ़ेर राज़,
केन्द्र बनकर कर रहा ये मानव जाति का उत्थान।।

प्राकृतिक सौन्दर्य से घिरा है नाग पहाड़ी पर स्थान,
कोसों दूर से दर्शन करने आते श्रृद्धालु इसी स्थान।
लगता है हर वर्ष यहां मेला होते रहते कई अनुष्ठान,
वर्षो की तपस्या पश्चात साधुबाबा का टूटा ध्यान।।

तुम्हारे चमत्कार को नमस्कार गेहलपुर वाली माता,
श्रृद्धालुओं का सिर जहां पर स्वतः ही झुक जाता।
है अलौकिक शक्ति तुम्हारी होते अनुष्ठान-जगराता,
गोरखजी को खेलता बच्चा मटके में मिल जाता।।

गेला रावल रखा साधुबाबा ने उस बालक का नाम,
आगे चलकर गेलेश्वर रावल से जाना गया ये धाम।
कठोर तपस्या के कारण मातारानी ने दिया वरदान,
निवास करूंगी एक पहर बनेंगे सारे बिगड़े काम।।

गुरु तेग बहादुर साहिब जी

धर्म सुरक्षा के ख़ातिर,
जीवन कर दिया न्योछावर।
हिन्द की चादर कहलाएं,
आज गुरु जी तेग बहादुर।।

गुरु हरगोबिंद साहिब जी पिता,
और नानकी जी थी माता।
नाम बचपन त्यागमल था इनका,
अमृतसर में जन्म हुआ गुरुवर का।।

स्वभाव इनका संत समान,
लेकिन तलवार बाजी में थे महान।
अडोल चित और निर्भय था भाव,
कई कई घंटो करते भक्ति भाव।।

प्रेम भाईचारा और एकता,
शांति क्षमा और सहनशीलता।
इनका दिया था इन्होने बहुत सन्देश,
प्रथम दर्शन धर्म एवं सत्य ही विजय।।

जौहर दिखाएं खूब तलवार से,
अपने पिता के साथ मिलकर के।
गुरु नानक वचनों का अनुसरण किए,
सिखों के यह नवें गुरु हुए।।

ख़त्म करो जीमण का रिवाज़

ख़त्म करो अब युवा-पीढ़ी ये जीमण का रिवाज़,
अहम भूमिका है आपकी आज समस्त समाज।
बड़े लम्बे समय से चल रही ऐसी कुप्रथाएं आज,
अंतर्मन के दीप जलाएं दो जीवन को परवाज़।।

जगमग हो सबका ये आंगन बचाओ स्वाभिमान,
क़र्ज़ उठाकर लाते है मृत्यु-भोज का ये सामान।
हरदिन किसी न किसी का घर हो रहा है ख़राब,
बंद करों आधुनिक-आडंबर न उड़ो आसमान।।

चिंताजनक रूप ले रहे आज इस तरह के काज,
अनावश्यक खर्चा न करो बनों ऐसी ये आवाज़।
नुख्ता-पहरावणी शादी-सगाई दहेज साज बाज,
मिटाओ रूढ़िवादी परम्परा हर एक ये समाज।।

आज गरीब-गरीब रह रहा अमीर हो रहा अमीर,
सोना चांदी गगन छू रहा मजदूर हो रहा अधीर।
अब तो संभलो युवाओं कन्याकुमारी से कश्मीर,
देख रहे समझ रहे फिर क्यों बन रहे हो बधिर।।

महफूज़ रखो यह सम्पदा जिसे पुरखों ने बनाया,
साधारण सा काम किया न ऋण लेकर गमाया।
मदद करो बहन-बेटी की यह वक्त ऐसा है आया,
दिखावें पर कोई न जाए कविता से समझाया।।

जी हां मैं वही अरावली हूं

जी हां मैं वही अरावली हूं,
जो सर्दी का जाड़ा सहती हूं।
बारिश के कहर को रोकती हूं,
और गर्मी लू का आघात झेलती हूं।।

जी हां मैं वही अरावली हूं,
जो पीढ़ियों से सुरक्षा देती हूं।
चुप-चाप दर्द सबका सहती हूं,
ॠषियों की तपो भूमि कहलाती हूं।।

जी हां मैं वही अरावली हूं,
जो सूरज का ताप सहती हूं।
फल-फूल व गोंद, मेवे देती हूं,
राजस्थान गुरू शिखर कहलाती हूं।।

जी हां मैं वही अरावली हूं,
जो कई जड़ी बूटियां देती हूं।
देहली से गुजरात तक फैली हूं,
स्वास्थ्य सुधारकर दीर्घायु करती हूं।।

जी हां मै वही अरावली हूं,
जो खंड-खंड अब हो रही हूं।
मौन रहकर सर्वस्व लुटा रही हूं,
राष्ट्रनिर्माण में सहयोगी बन रही हूं।।

अरावली ना खो देना

मुझे बचाओ मुझे बचाओ कोई हमारी आवाज़ सुनो,
भविष्य-बचाओ अपना व मेरा नहीं कोई जाल बुनो।
जीवन की रेखा कहलाती हूं मुझको न आघात करो,
असर इसका भयावक होगा सुनलो आज सब जनो।

बिलख रही आज टूट रही सब को जीवन देने वाली,
न कोख उजाड़ो हत्यारों में सबको सुरक्षा देने वाली।
कैसे बचाऊं में जल जंगल, जीव जानवर, हरियाली,
आवाज़ बनों न ख़ामोश रहो मैं हूं रक्षक नही काली।

इस दुनिया की पर्वत-श्रृंखला में एक मैं ही जिन्दा हूं,
इतिहास में रह जाऊंगी जो आज ऊंची यह चोटी हूं।
अभी भी वक्त है बचालो मुझको मैं जिंदा वरदान हूं,
फिर स्वास्थ्य वायु प्रदूषण महामारियों का सैलाब हूं।

भारी पड़ेगा प्रत्येक जीव को मुझसे छेड़छाड़ करना,
जंगल उजाड़कर जल संकट, धूलभरी आंधी सहना।
करोड़ों वर्षों से देती रही में कभी किसी से ना लिया,
समय व साम्राज्य बदला मैं ना बदली भाईयों बहना।

लिखो लेख, आलेख, कविता अरावली को खो देना,
लिखना मेरे गुण अवगुण दिया लिया सभी लिखना।
लिखना भक्षक कौन थें मेरे ये भूख लगी चबा लिया,
दर्दनाक अध्याय है लेकिन सत्य बात ज़रुर लिखना।

जन्मदिवस लड्डू गोपाल का

चलों आज जन्मदिवस मनाएं लड्डू गोपाल का
भादौ मास अष्टम तिथि समय आ गया रात का
कारागृह में जन्म हुआ उस वसुदेव के लाल का
काम तमाम करने आया जो क्रुर मामा कंस का

खुल गए ताले स्वत ही देख स्वरूप भगवान का
देवगणों ने फूल बरसाया किया स्वागत आपका
प्रसन्न हुए नर-नारी सारे सुन नाम तारणहार का
काली अंधियारी रात थी मौसम भी बरसात का

यमुना का जल स्तर बढ़ गया डर था उफ़ान का
वासुदेव घबराएं नहीं द्वार खट-खटाया नन्द का
खुशियां छाई गोकुल में जब पता चला बात का
धन्य हुई ब्रजभूमि सारी देख मुख नन्दलाल का

कोई कहे गोपीनाथ तुमें कोई मनोहारी राधा का
कोई नंदकिशोर पुकारें कोई माखनचोर आपका
कोई नटखट ग्वाला कहें तो कोई रूप विष्णु का
माखन, मिश्री भोग लगाता पर भूखें है भाव का

हर कोई दिवाना है आज कृष्ण आपके नाम का
कई असुरों का नाश कर भला किया संसार का
आज कारागृह में सेवारत है उदय दास आपका
एक बार स्वप्न में देखा विराट रुप हमनें आपका

हिन्द का कोहिनूर

हे वीर शहीदों है आपको कोटि-कोटि प्रणाम,
अतुलित बल से खदेड़े आपने दुश्मन तमाम।
अमर ज्योत जलती रहेगी आपके सवेरे शाम,
मुस्तेद सदा रहकर आपने दिया इसे अंजाम।।

नही डाले हथियार आपने यह प्रत्यक्ष प्रमाण,
लू चले, बारिश चले या शीत लहर की बाण।
जिम्मेदारी जो दिए आपको निभाए अविराम,
अंगारों पर चलते गए चाहें निकल गए प्राण।।

डगमगाएं नहीं पांव तुम्हारे हे देशभक्त महान,
तान सीना खड़े रहें ना घुसने दिया अनजान।
उस रक्तबीज की तरह लाए तुम ऐसा तूफ़ान,
अर्द्धसैनिक बल के रूप में आज ये पहचान।।

रहें सदा घर की चौखट से आप बहुत ही दूर,

वसुन्धरा की इस गोद में चढ़े है शीश भरपूर।
मरते मरते भी बोलें हो जय हिन्द आप जरुर,
कहलाते है इसलिए आप हिन्द का कोहिनूर।।

तुम ही हो असली हीरों

शत-शत वंदन है आपको हे सीमा के प्रहरी,
शोर्य गाथा लिखी है हमनें आज ये तुम्हारी।

अदम्य-साहस दिखलाकर तूने रची कहानी,
छोड़कर परिवार निभा रहे तुम जिम्मेदारी।।

दिल में कोई डर नहीं चाहे बरसे गोली बारी,
गूॅंजे घाटी कश्मीरी या नक्सली करें तैयारी।

देते हो सब को प्रेरणा तुम नर चाहें हो नारी,
राष्ट्र रक्षा एवं एकता की है जो जवाबदारी।।

दिन दोपहरी शाम हो चाहें रात हो ये अंधेरी
हर दिन नई चुनौतियों हेतु रखते हो तैयारी।

न नेता हो न अभिनेता न हो तुम अधिकारी
ऑंधी तूफान बाढ़ में सेवा रखते हो जारी।।

तुम ही हो असली हीरो रक्षक एवम पुजारी,
देव दूत बनकर करते हो सुरक्षा यह हमारी।

आने ना देते ऑंच किसे, बन जाते त्रिपुरारी,
सेवा देते रहते हो कश्मीर से कन्याकुमारी।।

रंग गया है तन मन मेरा

रंग गया है तन मन मेरा इस देश भक्ति के रंग में
एक बार सब जोर से बोलो जयहिंद मेरे संग में।
याद करो उन वीरों को जो शहीद हो गए जंग में
मरते दम तक लड़ते रहें आजादी की उमंग में।‌।

शोर्य प्रेरणा देता है हम सब को उनका बलिदान
अमृत-महोत्सव मना रहा ये आज़ाद हिंदुस्तान।
शांति प्रेम व वीरता का सब करो आज गुणगान
प्रेम की गंगा बहा गए वो देशभक्त ऐसे महान।।

उनके कारण घूम रहें है आज निर्भय होकर हम
झेली है कई चुनौतियां पर डगमगाया ना क़दम।
ना रूकें ना थके देश भक्तों ने दिखाया दम खम
काॅंप उठी रूह गोरों की तब भागे उल्टे क़दम।।

आज विभिन्न-धर्म व वेश-भूषा वाला भारत देश
राष्ट्र प्रतीक तीन रंगो वाला झंडा जिसमें विशेष।
रक्त से सींचा है इसको सभी अमर हो गए नरेश
गीता बाईबल कुरान गुरूग्रंथ सबका समावेश।।

अब धर्म बताने आ रहें है

अब धर्म बताने आ रहें है हम तुझको पाकिस्तान,
तेरी सात पुश्तें भी याद रखेगी जिसको ए शैतान।
सुन लेना आवाज़ हमारी ये खोलकर अपने कान,
दिखाएगा अपना जौहर अब दहाड़कर हिंदुस्तान।।

उबल रहा है खून सभी का बहन बेटी भाभीजान,
भ्रमणकर्ताओ को मारकर तुझे क्या मिला शैतान।
नमन है नारी के सिंदूर को जो दे दिए है बलिदान,
बदला हर सिंदूर का लेंगे बोल रहें हम सीना तान।।

समझाएंगे सिंदूर का मतलब हमारे फौजी जवान,
प्रतिशोध की ज्वाला लेगी ये आतंकियों की जान।
पहले ये ट्रेलर देखना शायद आ जाए तुझमे ज्ञान,
जल थल वायुसेना के संग अर्द्धसैनिकबल महान।।

बदल देंगे मानचित्र तेरा बन जाएगा तू क़ब्रिस्तान,
गरजेगा जब राफेल हमारा लोग रह जायेंगे हेरान।
हाहाकार मचेगा चारों ओर ना रहेगा नामोनिशान,
चुन-चुनकर मारे जाओगे इस महा युद्ध के दौरान।।

अब भी समय है समझ जा वरना आयेगा तूफ़ान,
भारत-देश महान है हमारा एवं रहेगा सदा महान।
शूरवीर महाराणा प्रताप व शिवाजी की है संतान,
सामने से ललकार पश्चात वार करते यह पहचान‌।।

ऑपरेशन सिंदूर

आज लहूं देश का खोल रहा पहलगाम की घटना से,
अब ना रुकेंगे घुसकर मारेंगें तेरे ही घर हथियारों से।
काटेंगे और कुचलेंगें अब तुझको हम अपनें पाॅंवो से,
ऐसा ताबीज़ कर देंगे बचके रहना हम पहरेदारों से।।

कर देंगे अब ध्वस्त ठिकाने हिजबुल जैश लश्करों के,
ऑपरेशन सिंदूर चलाकर देंगे ज़वाब तुम हत्यारों के।
लेगा अब प्रतिशोध भारत तुम पाकिस्तानी ग़द्दारों से,
ईंटों का ज़वाब पत्थर से देंगे तुम जैसे मक्कारों के।।

अब बचा नही सकता कोई देश तुम जैसे शैतानों को,
रक्त की नदियां बहा देंगे उजाड़ देंगे तुम्हारे अड्डों को।
प्रतिउत्तर बिगुल बज गया मिल गया फरमान हमको,
ये आतंकवाद मिटाने के लिए करेंगे ऑपरेशनो को।।

ये कायरों वाला काम किया अब बख़्शा नही जायेगा,
निर्दोषों को मारने वाले तू अब चैन से ना रह पायेगा।
क्या-क्या कर सकता है भारत अब तुझको बताएगा,
तुम्हारी धरती को क़ब्रिस्तान ये हिंदुस्तान बनायेगा।।

अब एक-एक कतरे का हिसाब लेंगे हमारे नौजवान,
निकल पड़े है कफ़न बाॅंधकर जो है आन बान शान।
शान्ति की भाषा समझ न आई तुझे अरे ओ बेईमान,
गीदड़ की तरह लोग बिलखेगे अब तेरे पाकिस्तान।।

भगवन विष्णु अवतार परशुराम

भगवन हरि विष्णु के आप थें ऐसे छठवें अवतार,
राम समान शक्तिशाली थें रखते फरसा हथियार।
वीरता का साक्षात उदाहरण एवम नाम परशुराम,
अहम भूमिका निभाये थें जो त्रेतायुग एवं द्वापर।।

जो अपना गुरु भगवान शिव-शंकर को मानते थें,
महेन्द्र गिरी पर्वत जाकर कठोर तपस्या किए थें।
प्रसन्न होकर भोलेनाथ दिव्य अस्त्र इनको दिए थें,
जिनसे युद्ध निपुणता अजय रहें वरदान पाए थें।।

ब्राह्मण कुल में जन्में पर युद्ध में अधिक रुचि थी,
पूर्वजों के निर्देश से शिव जी की तपस्या की थी।
बैसाखमास में शुक्लपक्ष की तृतीया को जन्में थें,
सप्तऋषि जमदग्नि पिताजी व माता रेणुका थी।।

इस रोज लगातें है भक्तगण जगह-जगह भण्डारे,
रामभद्र भार्गव भृगुपति भृगुवंशी नाम से पुकारे।
मंदिरों में हवन-पूजन के आयोजन भी रखें जाते,
भोजन-प्रसादी का लाभ उठाते लगाते जयकारे।।

बढ़-चढ़कर करते इस-रोज अधिकांश लोग दान,
भीष्म, द्रोण व कर्ण को इन्होंने दिया शस्त्र ज्ञान।
इस दिन किये गए पुण्य का मिलता पुण्य अपार,
अनसुलझे इनके बहुत रहस्य परशुराम भगवान।।

अप्रैल शोर्य दिवस

केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल मे यह दिन भी है ख़ास,
असाधारण कार्य करके रचा जवानों ने इतिहास।
ऐसा रचा इतिहास कि लड़ते रहे वो अंतिम श्वास,
साल था वह १९६५ ये ०९ तारीख अप्रेल मास।।

शोर्य दिवस से जानते है आज हम सभी जिसको,
छोटे समूह ने धूल चटाया अनगिनत दुश्मनों को।
अविश्वस्नीय साहस दिखाया मार-भगाया उनको,
लक्ष्य हासिल नही करने दिया पाक शत्रुओं को।।

ब्रिगेड थी पूरी हथियार भी उनके पास आधुनिक,
केवल १५० जाॅंबाज लड़ते रहें अपने लक्ष्य तक।
सेवा और निष्ठा है जिनका प्रथम-परम ये कर्तव्य,
१२ घन्टो में हार मान ली पाक सैनिक गए थक।।

तब से प्रतिवर्ष मनाता है के रि पु बल यह दिवस,
कच्छ के गुजरात में दिखाया जिसने यह साहस।
३४ घुसपैठियों को मार-गिराया चार ज़िंदा पकड़े,
लेकिन अपने ६ जवानों ने शहादत दी हंस-हंस।।

इस दिन उन वीर शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती,
उनकी वीरता सम्मान में प्रतियोगिता रखी जाती।
सभी राज्यों की पुलिस इसरोज उत्सव है मनाती,
स्मारकों पर हार चढ़ाकर बहादुरी गाथा सुनाती।।

अभिनंदन हिन्दू नव वर्ष

अभिनंदन है अभिनंदन हिन्दू नव वर्ष अभिनंदन,
भौतिक सुख सुविधाएं लाना करते है हम वंदन।
हॅंसी-खुशी संग बीतें यह वर्ष ना हो कैसा बन्धन,
मेहनत किसी की व्यर्थ न जाएं हे मेरे रघुनंदन।।

गौरव-शाली दिन है यह जो अतीत यादें दिलाता,
अपनी जड़ों से जुड़ें रहने की राह हमें बतलाता।
चैत्र-शुक्ल प्रतिपदा के संग गुड़ी-पड़वा है आता,
ग्रहों का दुर्लभ संयोग ज्योतिषी दृष्टि बतलाता।।

सृष्टि का आरम्भ किया इस-दिन ही वह विधाता,
महत्वपूर्ण पर्व है यह जो १२ महिनों बाद आता।
दुनियाभर में ख़ूब तैयारियां इस उपलक्ष में होता,
श्रीराम का राज्याभिषेक इस दिन ही हुआ था।‌।

इसदिन ही सम्राट विक्रमादित्य संभाले कार्यभार,
भारतीय पंचांग काल निर्धारण का बना आधार।
चैत्र वैशाख जेष्ठ अषाढ़ श्रावण भाद्रपद आश्विन,
कार्तिक मार्गशीर्ष पौष माघ फागुन है आधार।।

कई नामों से जानते है हम आज इस उत्सव को,
विक्रमी संवत सृष्टि संवत दिन हर्ष उल्लास को।
शक्ति-भक्ति के नौ दिन नवरात्र शुरु इसदिन को,
नव संवत्सर गुड़ीपड़वा उगादि व चेटीचंड को।।

वसंत ऋतु आई खुशहाली छाई

वसंत ऋतु के आने से घर घर में छाई खुशहाली,
चहुॅं और सुगंध फैलीं कोई कोना बचा न ख़ाली।
ओढ़ चुनरियाॅं आज वसुंधरा लग रही है निराली,
देख फ़सल को तृप्त हुआ आज यह वन माली।।

बाग-बाग हो गया है दिल देखकर यह हरियाली,
पीली-पीली सरसों लहराई गेहूॅं में आई ये बाली।
इन रंग-बिरंगे फूलों पर आज तितलियां मॅंडराई,
गून्जन करते भंवरे आकर बैठ रहें डाली-डाली।।

कर लिया श्रृॅंगार धरा ने धूम वसंतऋतु की छाई,
ठिठुरन से अब मिली है राहत धूप-सुहानी आई।
तापमान भी बदल गया है नही ठंड नही गरमाईं,
पतझड़ वालें सभी दरख्तों में नई कोपलें आई।।

सम्पूर्ण दुनिया में सबसे प्यारा हमारा भारत देश,
शास्त्रों में भी वसंत-ऋतु को जगह दिया विशेष।
नयी स्फूर्ति लेकर आया यह माघ माह और मेघ,
चली लेखनी आज हमारी ये पुलकित-परिवेश।।

माॅं सरस्वती महिमा आपकी जग में है अपरंपार,
जीवन हमारा करें सार्थक हम खड़े आपके द्वार।
रचते रहें रचनाएं शिक्षाविद मानें कभी नही हार,
बुद्धि, कला, ज्ञान देकर हमारा भी करों उद्धार।

नारी है सबसे महान

इस जगत में यह नारी है सबसे महान,
करना सब सदा उसका मान-सम्मान।
करता है देवलोक भी उनका गुणगान,
करना नही भूल से जिसका अपमान।।

गृहलक्ष्मी एवं अन्नपूर्णा यह कहलाती,
समस्त परिवार का पालन भी करती।
सहज एवम सरल प्रतिमूर्ति कहलाती,
अपनों के लिए हर ग़म ये सह जाती।।

प्यार और ममता है जिसमें ये भरमार,
चलता नही जिसके बिना यह संसार।
अकल्पनीय काम भी सहज कर देती,
पुरुष के जीवन का यह नारी आधार।।

यह त्याग एवं समर्पण की है प्रतिमूर्ति,
जिनके बिना चलता नही घर गृहस्थी।
फुलवारी ऑंगन की ये नारी कहलाती,
जिसके समान धरा पे ना कोई साथी।।

सभी क्षेत्र में इन्होंने यह क़दम है रखा,
प्रेम की पुस्तक जो खोलकर ये रखा।
काली दुर्गा व लक्ष्मी सब इसके है रुप,
माॅं बहन पत्नी एवं बेटी रुप में दिखा।।

महाकुंभ में गोता

चलों आज हम लगा आएंं इस महाकुंभ में गोता,
गंगा, यमुना, सरस्वती का संगम जहां पर होता।
भीड़ लगी है साधु सन्तों की जहां है बड़ी महत्ता,
हवनकुंड की शुद्ध हवा का है सभी को न्यौता।।

दूर-दूर से आ रहें है यहां बनाकर टोलियां जत्था,
कुंभ नहाकर पुण्य कमा रहें सब टेक रहें मत्था।
संत संन्यासी नागा साधुओं का दर्शन यहां होता,
पावन उत्सव मना रहें आज शासन और सत्ता।।

प्रथम स्नान पौष पूर्णिमा द्वितीय मकर सन्क्रान्त,
तृतीय मौनी-अमावस चतुर्थ वसंत पंचमी स्नान।
पंचम माघ पूर्णिमा है छः महा-शिवरात्रि की रात,
अखंड-अखाड़ा तपस्वियों का माना है विज्ञान।।

हाथों में कमण्डल, चिमटा-डमरू इनके है रहता,
आध्यात्मिक शुद्धि के लिए श्रृॅंगार ये भी करता।
भस्म रमाएं पूरे शरीर में ललाट चंदन लेप रहता,
ऑंखो में सुरमा, गलें में रूद्राक्ष पहने ये रहता।।

सारा श्रृंगार होता है यह शिव शंकर को समर्पित,
१२ वर्ष में आएं महाकुंभ लोग गाते भजन गीत।
भास्कर और चंद्रमा से मिलती ऊर्जा मानव हित,
सूरज की प्रथम किरण से पहले नहाते है नित।।

महाकुंभ का शाही स्नान

चलों चलें हम सब मिलकर अब करनें शाही स्नान,
अमृत की बूंदे जहां गिरी थी वो है यह चार स्थान।
प्रयागराज हरिद्वार उज्जैन नासिक है जिनके नाम,
महाकुंभ का आयोजन है सदियों पुराना विधान।।

पवित्र घड़े का पर्व भी कहते पुरानी कथा अनुसार,
संस्कृति-परम्पराओं का संरक्षण है जिसमे शुमार।
औषधीय गुण बढ़ जाते है इस महाकुंभ के दौरान,
वैज्ञानिक भी बता रहें इसकी महिमा अपरम्पार।।

खुशियों से तुम सजा दो अपनें आने वाले कल को,
महाकुम्भ का हिस्सा बनों भक्तों पाओगे मोक्ष को।
१२ वर्षों के पश्चात बनता है इस महाकुंभ का योग,
जहाॅं करोड़ों श्रद्धालु धोते स्नान से खुद रोग को।।

भारत में आयोजित होता है ये विशाल, भव्य मेला,
मुख्यतः साधु-संत साध्विया तपस्वी रहते है चेला।
तांता लगता है तीर्थ यात्रियों का जगह-जगह ठेला,
हिन्दू ग्रंथों में लिखा है अमरत्व-मंगलकारी बेला।।

पौष पूर्णिमा से होता है इस महाकुंभ का शुभारंभ,
पवित्र डूबकी लगाकर भक्त कहते भोले बम-बम।
सब पापों से छुटकारा मिलता दुःख दर्द होता कम,
समुद्रमंथन उपरांत प्राप्त हुआ था ये अमृतकुंभ।।

सूर्यास्त को भी करें प्रणाम

चलों आज हम ढलते हुएं इस सूर्य को करें प्रणाम,
साॅंझ हो गई संस्कारों व संस्कृति का करें सम्मान।‌
भानु दिनकर भास्कर दिवाकर मार्तंड इसका नाम,
समय से आकर बाॅंटता यह सबको ज्ञान-समान।।

सम्पूर्ण-विश्व को महकाता ये रखता सबका ध्यान,
हाजिरी अपनी रोज़ देता पर ना करता अभिमान।
अकेले रहने की हिम्मत भी यह देता सूर्य भगवान,
कोयल मोर पपीहा बुलबुल भी गाते हैं गुण‌गान।।

रोज़ उदय होता है इनका एवम रोज़ाना यही काम,
अंधकार को मिटाकर करता जग को प्रकाशवान।
अनुशासन का ये आधार है ना लेता कोई भी दाम,
ख़ुद जलकर सुख शान्ति देता ये सूरज भगवान।।

लेता है हर व्यक्ति आपका हर रोज़ उगते हुएं नाम,
जल चढ़ाकर पूजन करता नहीं करता कोई शाम‌।
सूर्योदय की जैसे करें सभी सूर्यास्त को भी प्रणाम,
दार्शनिक दृष्टि से देखो कभी करता यह विश्राम।।

हर्षित होता है जग सारा देखकर आपको आसमां,
मुरझाऍं फूल भी खिल जातें आती मुख-मुस्कान।
दिखते हो आते-जाते चारों दिशाओं में लाल लाल,
सर्दियों में ये धूप पाकर आ जाती बदन मे जान।।

संदेशा है जवान का

ना चल ज्यादा बोझ लादकर क्रोध, अभिमान का,
स्वयं पर काबू रख लो भैया संदेशा है जवान का।
ना सुलगाओ तप्ती-भट्टी हाथ जला लोगे आपका,
छिप-छिपकर न वार करों पक्का रहो ज़ुबां का।।

इन सम्बन्धों के ताले को हथौड़े की चोट ना मारो,
सच्चाई की इस लड़ाई में सत्य का साथ देने का।
माना कि हम सख़्त है पर जल्दी पिघल भी जाते,
कभी मेरी याद आये तो एक काॅल कर देने का।।

यह कलयुग है भाईजी इसमे कर्म को पूजा जाता,
होशियार व कपटी व्यक्तियों से बचकर रहने का।
घमंड बहुत भूखा रहता खुराक़ जिसकी है रिश्ता,
अच्छाईयां देखनी है तो सलाह उसकी लेने का।।

देखना है कौन देता यह मुश्किल में साथ आपका,
कुटुंब छोड़कर जा रहें हों ध्यान कहां है आपका।
सोच-समझकर पांव रखो दीप-जलाओ प्यार का,
अशांति को दूर भगाओ माहौल रखो शान्त का।।

छोड़ रहें हो साथ हमारा विचार किया न बात का,
मेरे दिल के कोने में जबकि नाम लिखा आपका।
ये दिल विक्षिप्त हो रहा शायद इतना ही साथ था,
देखकर भी अंधे बन रहें पता ना चला राज़ का।।

संविधान का निर्माता

ख़ुदा का नूर बनकर आया वह संविधान का निर्माता,
सबको समान अधिकार मिले जिनका ये अरमां था।
चुप-चाप गरल पीता रहा पर दिलाकर रहा समानता,
ख़ुद पढ़ो फिर सबको-पढ़ाओ ऐसा जो कहता था।।

तुम आज झुक जाओ कागज की पुस्तकों के सामने,
फिर कल को देखना दुनियां झुकेगी आपके सामने।
आपका इनसे अच्छा हम दर्द कोई भी ना हो सकता,
मुश्किलें आसान होगी जब पुस्तकें होगी ये सामने।।

आओ अब कुछ तो अपनें आप में यह बदलाव करों,
शेर की तरहां घर से निकालो व वैसे-ही दहाड़ करों।
आखिर कब-तक भीगी बिल्ली बनकर घरों में रहोंगे,
वैसे ही बहुत देर हो गई अब निर्णय में देर ना करों।।

चाहें रुखा सूखा खालों पर दोस्त क़लम को बना लो,
ना छोड़ना उसका साथ इस-तरह की ढाल बना लो।
लिख डालो तुम इतिहास कि‌ वह फरिस्ता कहलाओ,
सबसे पहले इसके लिए ये पढ़ाई की आदत डालो।।

जागो और जगाओं सब अपना अपना आत्मविश्वास,
हिन्दू मुस्लिम, सिख ईसाई सब लो आराम से श्वास।
हम सभी के लिए समान है ये लोकतंत्र का संविधान,
बाबा साहब लड़ता रहा जिसके लिए अंतिम श्वास।।

संविधान दिवस

सबसे बड़ा लिखित संविधान संसार में भारत का है,
सरकार व नागरिकों में जो संबंध स्थापित करता है।
कठोरता एवं लचीलेपन का यह अनूठा उदाहरण है,
संपूर्ण देश की शासन व्यवस्थाएं नियंत्रित करता है।।

अमेरिका के संविधान समान भारत का संविधान है,
कही लिखित है कही अलिखित पर देश चलाता है।
सब देशों में सर्वोत्तम कानून ये संविधान ही होता है,
इसी से सभी देशों की ये शासन व्यवस्था चलता है।।

सब देशों के संविधान की अलग-अलग विशेषता है,
जिनमें जाति धर्म वंश लिंग भेद-भाव नही रहता है।
सार्वभौम वयस्क मताधिकार की जिनमे व्यवस्था है,
जो सभी नागरिकों के लिए राजनैतिक समानता है।।

संविधान सभा का निर्माण ड्राफ्टिंग कमेटी करता है,
संशोधित लिस्ट देखें तो भारत पहले नंबर आता है।
जिसमें ४६५ अनुच्छेद, २५ भाग, १२ अनुसूचियां है,
डॉ अंबेडकर जी को जिसका जनक माना जाता है।।

जो २६ नवंबर १९४९ को यह बनकर तैयार हुआ है,
लिखनें में जिसको दो वर्ष ११ माह १८ दिन लगे है।
जिसके बाद ये २६ जनवरी १९५० को लागू हुआ है,
मौलिक सिद्धांतों के खातिर बाबा कई रातें जागे है।।

अनमोल है मानव जीवन

कभी फुर्सत मिले तो पढ़ लेना हमारी यह रचना,
किस्मत पर कभी ना रोना सदा हॅंसते ही रहना।
नही होता है पूर्ण कभी हर इन्सान का ये सपना,
हो सके तो मेहनत की आदत डालते ही रहना।।

धूप-छाॅंव, सर्दी-गर्मी और वर्षा में ख़्याल रखना,
एक दूजे को सफ़ल देखकर जलन नही रखना।
अनमोल है मानव जीवन किरदार अच्छा रखना,
हो सके तो सबसे ही ये अच्छे व्यवहार रखना।।

कभी किसी की चापलूसी व चुगली नही करना,
ये संबंध अच्छे रखने हेतु चाहें ख़ुद झुक जाना।
रखना अच्छी सोच मन में यह खोट नही रखना,
हो सके तो कष्ट में तू किसी का मरहम बनना।।

लिख रहा हूं बीता वृत्तान्त ये कैसा लगा बताना,
वास्तविकता कभी ना बदलती यह याद रखना।
बन जाना ये मोम पिघलना पड़ें तू पिघल जाना,
दीपक नही ज्योति बनना उजाला करते जाना।।

यह जीवन का सत्कर्म कभी भी व्यर्थ ना जाता,
धन दौलत लाख कमाएं सुख चैन नही मिलता।
बात में दम है संपूर्ण विश्व इस बात को जानता,
हो सके तो इंसान बन ये स्वर्ग उसे ही मिलता।।

देवताओं की ‌दीवाली

भारतवर्ष के त्योंहारों की यह बात है बड़ी निराली,
कार्तिक माह में पूर्णिमा को मनातें है देव दीवाली।
हंसी ख़ुशी संग मनातें है कोई पर्व न जाता ख़ाली,
काशी की पावन धरा पर उतरे मनाने देव दीवाली।।

एक वक्त त्रिपुरासुर दैत्य का बढ़ गया यह आतंक,
ऋषि मुनि नर नारी एवं देवो के लिए बना घातक।
तब भगवान शंकर ने काटा उस असुर का मस्तक,
उसी ख़ुशी में बधाई देने आए देवगण काशी तक।।

हिन्दू पंचांगो के अनुसार तब आऐ थें वहां देवगण,
है आज भी वहां पर उन देवगणों के कमल चरण।
आतें है हर वर्ष ज़हां देव दीवाली को भ्रमण करने,
मिलता है आशीष उन्हें और पाते ईश्वर की शरण।।

मुख्य रुप से काशी में जो गंगा तट पे मनाई जाती,
जिस दिन चारों और काशी में सजावटे की जाती।
गंगा घाट के चारों और मिट्टी के दीये जलाएं जातें,
शुभ-मुहूर्त और पूजन विधि से पूजा ‌कराई जाती।।

होती है मनोकामनाएं पूर्ण जो भक्त यहां पर आते,
दीपदान करके वहां देवताओं की कृपा दृष्टि पाते।
होता है महत्वपूर्ण इस दिन का गंगा नदी मे स्नान,
रोग दोष एवं कष्ट-पीड़ा उन सभी के दूर हो जाते।।

अब तो करलो मुलाक़ात

ना जाने इस परिवार को यह किसकी नज़र लगी,
वर्षों का प्यार और अपनापन भूला दिए है सभी।
जो शक्तिशाली, सर्वव्यापी एक परिवार था कभी,
आज मौन व्याकुल अपने भवन मे बैठें है सभी।।

सोचता हूॅं कल नया सूर्य निकलेगा तो बात होगी,
मिट जाएंगे वे गिले-शिकवे जब मुलाक़ात होगी।
नई ज़िंदगी की शुरूआत फिर परिवार संग होगी,
वह नफरतों की दीवार टूटकर चकनाचूर होगी।।

शायद यह आरज़ू समस्त परिवार वालों की होगी,
अगर किसी को ठेस लगी है तो वो भी दूर होगी।
नजदिकी फिर से बढ़ेंगी दूरी पल भर में दूर होगी,
वह सारे ग़म हम सौंप देंगे जब मुलाकातें होगी।।

शिकायतें तो बहुत सारी होगी एक-दूसरे के लिए,
लेकिन सिले हुए होट कौन खोले बताने के लिए‌।
परीक्षा में आएं पेचीदा सवाल सा हो गया जीवन,
मुॅंह से दो शब्द निकल न रहे ये अपनो के लिए।।

अब तो करलो मुलाक़ात गुजरी बातें रख दे ताक,
आखिर में एक रोज़ मिल जाएंगे हम-सब ख़ाक।
फिर नही कहना कहां है उस महापुरूष की राख,
कर ले यारा दो बात ना रख लम्बी अपनी नाक।।

मुश्किलों को हॅंसकर सहलो

गुजर जाएंगे संकट के पल मानव तू धीरज तो धर,
मोह माया का विचार त्याग दे न घूम तू इधर उधर।
मुश्किलों को हॅंसकर सहलो हौंसले की उड़ान भर,
ये सपने भी हकीकत होंगे बन जा तू ऐसा निड़र।।

यह अनुभव ही सबकों सिखाता ना हो यार निराश,
व्यर्थ चिंताओ से कुछ ना होता है चिराग़ तेरे पास।
यह परिवर्तन ही डराता एवं परिवर्तन से है विकास,
आज जो है उसके पास कल होगा वही तेरे पास।।

सुख दुःख एक जोड़ा है जो सबके जीवन में आता,
हारा वही जो लड़ा नही यह समझाता वो विधाता।
मुश्किलों से गुज़रकर ही तो हर-व्यक्ति है चमकता,
अपनी मंज़िल ख़ुद बनाकर गगन-तारों को छूता।।

कुछ न बिगड़ा अभी भी ये समय तेरे पास बहुत है,
इम्तिहान में असफलता पाना क्या नई यह बात है।
ईर्ष्या नफरत क्रोध को आने देना ना अपनें पास है,
पहुॅंच उस पड़ाव पर श्री-नारायण तुम्हारे साथ है।।

ये लड़ाई है ख़ुद की ख़ुद से चाहों तो जीत जाओगे,
ऐसी मुश्किलें तो नर जीवन में अनेक तुम पाओगे।
अगर नही देखोगे पीछे मुड़कर आगे बढ़ते जाओगे,
रखो उम्मीद ख़ुशी की तो मुश्किल हारते पाओगे।।

क्या होती है केवाईसी

क्या होती है यह केवाईसी करना इस पर विचार,
संस्थाएं जिसका कर रही है लगातार यह प्रचार।
क्या क्या इसके नियम है और क्या शर्तें स्वीकार,
जानकारी और उद्देश्य बताऊॅं आज मैं दो-चार।।

अपनें ग्राहकों की सही पहचान हेतु ये अभियान,
जो विश्वास एवं अखंडता को बल करता प्रदान।
आमतौर पर नाम-पता और जन्मतिथि है सुमार,
अवैध-गतिविधि रोककर मिले सही प्रोत्साहन।।

महत्त्वपूर्ण यह प्रक्रिया है इससे ना होना परेशान,
दस्तावेज सत्यापन हेतु हितकारक हरेक इंसान।
जानकारियां जुटाकर करता यह तुरंत ही निदान,
ऑनलाइन और ऑफलाइन है यह सारे जहान।।

इसमें सरकार के द्वारा जारी दस्तावेज है शामिल,
जैसे पेन कार्ड आधार कार्ड व बिजली का बिल‌।
पासपोर्ट मतदाता पहचान पत्र ड्राइविंग लाइसेंस,
निवास प्रमाण पत्र व राशनकार्ड भी है शामिल।।

हस्ताक्षरों से भी होती है सही ग्राहक की पहचान,
बायोमेट्रिकडेटा भी है एक विश्वसनीय समाधान।
फिंगरप्रिंट, चेहरा आईरिस व हाथों की ज्यामिति,
लेकिन आधारलिंक ओ टी पी है बहुत आसान।।

रोग से घृणा कर रोगी से नही

रोग चाहें कोई सा भी हो वो कर देता है हैरान,
समय से ईलाज न लिया तो कर देता परेशान।
लाखों लोग ले रहें आज बिमारियों का ईलाज,
देखा, सुना है मैनें इससे गई लाखों की जान।।

करना है सब मौसमी बिमारियों से ख़ुद बचाव,
जन-जन तक बात पहुॅंचाना है मेरा ये सुझाव।
पी-लेना काढ़ा बनाकर लगा लेना मरहम घाव,
मक्खी मच्छर से बचना वो शहर हो या गाॅंव।।

रोग से घृणा कर पर रोगी का करना देखभाल,
एक रोज़ मिट्टी हो जाएंगा हाड़-माॅंस व खाल।
अपना हो चाहें हो पराया बोलों यह मीठे बोल,
न आता ये किसे बोलकर जीवन है अनमोल।।

भूखें नंगे व कंगाल आज भी है अनेंक इन्सान,
एक रोटी के लिए अपना खोए हुएं है सम्मान।
दुःख अपना किसे ना सुनाते बन जाते अंजान,
झुग्गी-झोपड़ी में रहकर भी समझते है शान।।

कभी देख लो इनको मुड़कर बाबू जी धनवान,
खनकते सिक्कों से ख़ुश होकर करते बखान।
ज़िंदगी केवल जीना जानते सब-कुछ वर्तमान,
परिवार को सार्थक मानते चाहें न हो मकान।।

भाई दूज का त्योंहार

आओं मनाएं भाई-दूज का त्योंहार,
बहन को दे एक अच्छा सा उपहार।
भाई बहन का ये पवित्र ऐसा रिश्ता,
माॅं जैसा प्यार इस बहन से मिलता।।

इसी दिन का बहनें करती इन्तजार,
वर्ष में एकबार आएं पावन त्योंहार।
चेहरे पर आएं मीठी-मीठी मुस्कान,
घर-ऑंगन जाएं खुशियों की बहार।।

सजाकर लाए बहनें पूजा का थाल,
ऑंगन की शोभा बरसाएं वो प्यार।
मस्तक पे चंदन तिलक वो लगाती,
उतारकर आरती करती है सत्कार।।

एक मात्र धागे का अटूट यह बंधन,
यही संस्कृति रक्षा सूत्र अभिनन्दन।
ये हाथ सदा सुरक्षा कवच बना रहें,
लंबी उम्र पाएं भाई करती ये वंदन।।

अपार दुआएं भैया बहन से पाकर,
मिठाइयां बहन के हाथ से खाकर‌।
देता है अनमोल बहनों को उपहार,
ऐसा है यह भाई बहन का त्यौहार।।

सारा सच लिखा मैंने इस रचना में,
महत्त्व रखता है ये भी इन पर्वो में।
कई पौराणिक कथा है इसके पीछे,
जो आएं कार्तिकशुक्ल द्वितीय में।।

संघर्ष से मिलती सफलता

सफ़लता पाने के लिए करना-पड़ता है प्रयास,
सांसारिक बातें है परिवर्तन क्यों होता निराश।
आचरण, संस्कार संस्कृति से होता है विकास,
जीवन में एक लक्ष्य रखो ज़रुर होगा प्रकाश।।

सबके जीवन में आता है सुख दुःख का संघर्ष,
आत्मबल जगाओ अपना होगा तुमको सहर्ष।
चले-चलो और बढ़तें रहो बनों तुम भी आदर्श,
असफलता का सामना कर बनों तुम उत्कर्ष।।

सरल विनम्र व्यक्तित्व रखो सादा जीवन तरल,
भविष्य अपना बनानें खातिर पी जाओ गरल।
गौरव-गाथा लिखी हुई है रचा कई ने इतिहास,
चलों उठो पंख पसारो चाहें राह ना हो सरल।।

करो संकल्प हृदय अपरिमित अज्ञान दूर भगा,
हरगिज़ ना रख पीछे क़दम बोलें चाहें ये सगा।
महकादे सबकी रोम-रोम अब ऐसा कर दिखा,
चरण रज लो शारदे का दौड़ ऐसी फिर लगा।।

सही निर्णय लेकर समय से कौशल यह दिखा,
भूल जा कुछ दिनों के लिए सहपाठी व सखा।
जौहर कर अपनें ख़ून का क्या हूॅं मैं यह दिखा,
भविष्य बना अपना बेटा अन्धेरे में क्या रखा।।

मुझको जिंदा रखेंगी ये रचनाएं

मुझको जिंदा रखेंगी मेरी लिखी हुई ये‌ रचनाएं,
सरल और सीधी है जिसमें मेरी यह भावनाएं।
अल्लाह जीसस वाहेगुरु राम जिसमें है समाएं,
अन्तर्मन के है सारथी मुझे सफ़ल यह बनाएं।।

सुनो साथियों बात हमारी खज़ाना यही है मेरा,
कष्टों का बादल गिरा क़दम डगमगाया न मेरा।
दुविधा-भरे मन को समझाकर देता रहा पहरा,
कभी मुरझाया कभी मुस्कराया ये चेहरा मेरा।।

सोच समझकर लिखता रहा कविताएं में प्यारी,
सरल, सहज हिन्दी-भाषा लगी मुझको प्यारी।
सकारात्मक-बल मिला इससे बदन को हमारी,
मान-बढ़ाती गई लेखनी ये है प्राणों से प्यारी।।‌

इस लेखनी से ही बनी है आज हमारी पहचान,
लेखन करके निखरा एवं बढ़ाया मान सम्मान।
मन-मस्तिष्क, बुद्धि-विवेक से छूआ आसमान,
अस्त्र शस्त्र यही है मेरा इसी ने बनाया महान।।

इस साहित्य ने मुझको यारों कर दिया दिवाना,
देश-सेवा के संग सीखा ये काव्य-पाठ करना।
जीवन में बहुत दी परीक्षाएं किया आना जाना,
अब तो इस लेखनी संग मुझको जीना मरना।।

उधार देना सोच समझकर

निकल गई है कई दिवाली,
पर निकला नही उसका दिवाला।
जब भी जाता हूॅं पैसे माॅंगने,
घर लगा हुआ मिलता यह ताला।

क्या करूॅं मैं और क्या नही,
ऐसी पाल रखी है आज में बला।
अब दर्शन ही दुर्लभ हो गया,
पकड़ ली आज उसने यह कला।

पहले अच्छा रिश्ता था हमारा,
अब बन गया विश्वासघात वाला।
बहाने, झूठ का ले रहा सहारा,
मैं घूम रहा आज पैसे-देने वाला।

क्यों दिया पैसे उधार हे रामा,
मैं हो गया बिलकुल ही अकेला।
चक्कर पे चक्कर दे रहा मुझे,
खेल खेला वह नहले पर दहला।

न देना यारों उधार किसी को,
वह कर देगा पागल पैदल चला।
भिकारी समान वह बना देगा,
तारीख पे तारीख वो देने वाला।

गोवर्धन गिरधारी

आज पूज रहा है आपको सारा-संसार,
मौज और मस्ती संग मना रहा त्यौहार।
कभी बनकर आऍं थे आप राम-श्याम,
कई देत्य-दुष्टों का आपने किया संहार।।

रघुकुल नन्दन आप ही गिरधर गोपाल,
घर घर में सजावट गोबर गोवर्धन द्वार।
जीवन में भर दो हमारे खुशियां अपार,
पहना रहें है हम आपको फूलों के हार।।

धरा पर पधारों आप फिर से घनश्याम,
बिगड़ रहीं है धीरे-धीरे समय की चाल।
हम सब को गोपाल करों आप निहाल,
इन गायों का देखों हो रहा है बुरा हाल।।

घमण्डियों का घमण्ड किया चकनाचूर,
शरणार्थी की रक्षा आपनें की है ज़रूर।
उॅंगली पर धारण किया गोवर्धन पहाड़,
बखान आपकें पढ़ें और सुनें है भरपूर।।

अत्याचार‌ व भ्रष्टाचार हो रहा सब और,
इन पापियों के पाप से बढ़ रहा है शोर।
संकट हरो मुरलीधर जगत पालन-हार,
जिंदगी ‌को दें जाओ खुशियों की भोर।।

रचनाकार : गणपत लाल उदय

अजमेर ( राजस्थान )

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