दरख्त के शामियाने में जिन्दगी का सुकूँ ढूँढे

छाँवों से हटकर दरख्त न जाने क्या-क्या चीजें हमें प्रदान करते हैं लेकिन हमने इनकी अहमियत कभी नहीं समझी और जिस काम के लिए कुदरत इन्हें बनाई है हमारे लिए हम ठहरे लालची, उल्टे इन्हें दिन-रात काट रहे हैं, इनके साथ ये कितनी नाइंसाफ़ी है।

ये बेचारे, चिलचिलाती धूप,घनघोर कुहरे, लू -लुआर से बचाकर हमें अपनी दुवाओं से नवाजते हैं। माना कि हमारी धरती इनकी जड़ों को पोषकतत्व मुहैया कराती है लेकिन हमारे हिस्से से इनका भू-क्षेत्र अधिक है।

ठंडी हवा के अलावा ये जड़ी-बूटी,लकड़ी,फल-फूल और शुद्ध ऑक्सीजन देते ही देते हैं लेकिन समझनेवाली बात यहाँ ये है कि बदले में हमसे क्या लेते हैं? हम दुनियावालों को इनका इस्तक़बाल करना चाहिए और कुदरत का शुक्रिया अदा करना चाहिए।

हमें अपने ख्वाबों को बचाने के लिए इनकी रखवाली करनी चाहिए। हक़ीकत से हटकर जिन्दगी जी रहे लोग आए दिन वृक्षों के साथ छल कर रहे हैं। इनकी लकड़ी का बना दरवाजा हमारे घरों की रखवाली कर रहा है और हम इनकी जिन्दगी में जहर घोल रहे हैं। यहाँ ये सोचनीय बात है।

आमतौर पर ये देखने में आता है कि जब हम कड़ी धूप का सामना कर रहे होते हैं तो हमारी नजरें वृक्षों के शामियाने ढूँढती हैं कि हम सुकूँ से अपने गंतव्य तक पहुँच जाएँ लेकिन तस्वीर यहाँ अब बदल चुकी है हमने पेड़ों का सौदा कर डाला। धरती उजाड़ डाली।

उजाड़ते वक़्त यह ध्यान में नहीं आया कि बदले में कुछ नई पौध भी रोपी जाए। ऐ! दुनियावालों, पेड़ कोई एक दिन में जवान नहीं होते। इन्हें बड़ा होने में वक़्त लगता है।

किस तरह से हम धरती की कोख बाँझ करते जा रहे हैं। हमारे पास अब क्या ताकत बची कि आसमान से बरस रही आग का शमन कर दें? कोई चहुआ काम नहीं कर रहा। अगर गरमी का जबड़ा फाड़ना है तो वनिकीकरण का काम करना ही पड़ेगा। जीने के लिए कोई उधार साँस आपको देनेवाला नहीं।

सादगी और सलीके से जीना ही नई उम्मीद का किरन बनेगा। हमें पेड़ों की नींद में खलल नहीं पैदा करना चाहिए बल्कि संजीदगी से यहाँ काम लेना चाहिए। हमें उनके हौसले की होली नहीं जलानी चाहिए।

अगर हमारे वृक्ष नदी, तालाब, ताल-तलइया, पोखरा-पोखरी में अपनी तस्वीर देखने के के लिए झाँक रहे हों और उन पर सितारे आराम फरमा रहे हों, तो पत्थर और ढेले नहीं चलाना चाहिए। सुकूँ से जीने का हक़ सभी को है। किसी की आजादी छीनना गैरवाजिब बात होगी।

बड़ी मजेदार बात एक ये है कि जब कोई लकड़हारा किसी वृक्ष को काट रहा होता है, तो काटते-काटते उसे थकान और गरमी महसूस होती है तब वह कुछ समय के लिए किसी बगल के पेड़ के नीचे छहाने आ जाता है लेकिन उसके दिमाग़ में ये बात कभी नहीं आती कि जिस वृक्ष को वो काट रहा है, वह उसका रिश्ते में भाई है और इसके दिल पर क्या गुजरती होगी।

किस कदर हमारी संवेदनशीलता मरती जा रही है और एकदिन हमें कहीं का न छोड़ेगी। दूसरी तरफ वृक्ष हमारी सलामती के लिए बादलों को आकर्षित करते हैं वो बेचारे बादल घनघोर बारिश करते हैं।

बादलों को हमने कुछ दिया नहीं, पेड़ों को पूरी उम्र जिन्दा रहने नहीं दिया फिर भी उनकी दरियादिली को मेरा सल्यूट है। हम मंगल, चाँद, सूरज तथा अन्य ग्रहों पर अपना भविष्य तलाश रहे हैं, इस जमीं का क्या होगा?

आग बरसती गर्मी, सूखते तालाब, मरी नदियाँ, बाँझ होती वसुंधरा, इस रूप में सृष्टि, इन सब चीजों को हमें नहीं सौंपी थी। वो दी थी हरे-भरे जंगल,बड़ी-बड़ी नदियाँ, लाखों किस्म के मूक प्राणी। फूलों से भरा संसार।

हमने इसका बंटाधार कर डाला। गगन की ऊंचाइयों को अपने परों से नापने वाले परिन्दे आज अपने दुर्दिन पर आँसू बहा रहे हैं। पेड़ के बजाय इस तरह के मूक प्राणी धरती पर रहने के लिए विवश हो रहे हैं।

बूँद-बूँद पानी के लिए तरस रहे हैं। एक जमाना था जब लोग पेड़ो का चेहरा देखने के लिए बागों की तरफ दौड़ते थे। फलदार वृक्ष फल तो देते थे, साथ ही उन बागों की सुगंध से लोग मद-मस्त हो जाते थे।

उस तरह के वृक्षों के सुर्ख होंठों से हमारे लिए दुआएँ फूटती थीं। क्या लोग थे, क्या वो सोच थी, लोगों के अंदर किसी भी शजर के प्रति दीवानगी होती थी। वो वृक्षों का स्वर्ण युग था।

आज भी सरकारें इस पर काम कर रही हैं लेकिन लोगों का साथ जैसा चाहिए वैसा नहीं मिल पा रहा है। कितने दलाल सिर्फ़ वृक्षों की कटाई में अपनी जिन्दगी नाप रहे हैं। न तो उन्हें देश की फ़िक्र है और न ही अपनी अगली पीढ़ी की।

वृक्ष धरती का श्रृंगार हैं और ये किसी वरदान से कम नहीं। सृष्टि की सर्वोत्कृष्ट रचना में से दरख्त भी एक बेशकीमती थाती हैं। ये हमारी सांसों को नित्य बढ़ाने का काम करते हैं। गर्मी का पारा जिस ढंग से दिनोंदिन बढ़ रहा है, वक़्त रहते लोग वृक्षारोपण नहीं किए तो भीषण गरमी से मरने के लिए भी तैयार रहें।

अगली साल गरमी का रेसियो और बढ़ सकता है। जिस तरह खबरें समाचार पत्रों में आई हैं कितनी एसी जलीं,चलते -चलते कारें जलीं, चलते -चलते मोटर साइकलें जलीं, ये दिल दहला देनेवाली घटनाएँ हैं तो इंतजार किस बात का? इस साल की बारिश में वानिकीकरण का काम बड़े पैमाने पर होना चाहिए।

मित्रों! लू -लुआर को कहीं क़ैद नहीं किया जा सकता बल्कि इससे बचने के आसान और कठिन विकल्प ढूँढने होंगे। ग्लोबलवार्मिंग के बढ़ते प्रभाव को कम करना होगा। विकास के पैमाने बदलने होंगे।

चल रही जीवन शैली में आमूलचूल परिवर्तन करने होंगे नहीं, तो एक दौर ऐसा भी आएगा कि एक राही दूसरे राही से ये पूछेगा अच्छा बताओ आपने आखिरी बार वृक्ष कहाँ देखा था?

उसी दौर की हवाएँ भी कुछ इस तरह से आपस में गुफ़्तगू करेंगी कि रेगिस्तानों से गुजरते-गुजरते हम थक चुके हैं कहीं बाग-बगीचे बताओ जिसके नीचे थोड़ा सुस्ताया जाए।

ध्यान देने योग्य बात ये है कि हमारी -आपकी तरह ये हवाएँ बोलतीं तो,हम दुनियावालों के खिलाफ धरना प्रदर्शन करतीं, भूख-हड़ताल-अनशन आदि करतीं लेकिन बेचारी हम सभी को जीवन देनेवाली ये हवाएँ और ये बाग-बगीचे हमारी करतूत से ठगे-से रह जा रहे हैं लेकिन हम सभी को इनकी चिंताओं का सम्मान करना चाहिए।

Ramakesh

रामकेश एम यादव (कवि, साहित्यकार)
( मुंबई )

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