डिग्रीवाद | Degreebaad

सुभाष एक विद्यालय में शिक्षक हैं। एक दिन प्रबंधक ने उन्हें बुलाकर कहा ,-“इस बार विद्यालय का रिजल्ट शत प्रतिशत होना चाहिए। यदि हम ऐसा कर देते हैं तो हमारे विद्यालय का नाम बहुत बढ़ जाएगा। इसी के साथ एडमिशन की संख्या भी बढ़ जाएगी।”

आगे प्रबंधक ने अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए कहा,-” देखो पढ़ाई हो या ना हो लेकिन बच्चों का रिजल्ट शत-प्रतिशत होना आवश्यक है।। इसके लिए हमें बच्चों को दिल खोल करके नंबर को लूटना होगा।”
सुभाष ने कहा,-“सर! जो बच्चे फिसड्डी हैं जिन्हें कुछ नहीं आता जाता उनका क्या करेंगे।”

” क्या करेंगें मतलब! हम जो कह रहे हैं उसे ध्यानपूर्वक सुनो। जो बच्चे गोबर गणेश हैं उन्हें भी फर्स्ट पास करना है। हमें अपने विद्यालय का नाम खराब नहीं करना है।” प्रबंधक ने कहा।

प्रबंधक के कहे अनुसार अध्यापक ने नंबरों की बरसात कर दी। कोई भी बच्चा फेल नहीं हुआ। इसका परिणाम यह हुआ कि उनके यहां एडमिशन की भीड़ लग गई।

वर्तमान समय में देखा जाए तो शिक्षित बेरोजगारों की देश में एक बहुत बड़ी टीम तैयार हो चुकी है। ऐसे बच्चे ना शिक्षा जगत में कुछ कर पाते हैं,ना ही कोई छोटा-मोटा कारोबार करते हैं। बस ऐसे डिग्री धारी इधर-उधर इंटरव्यू देते फिरते रहते हैं। कोई काम तो कर नहीं सकते। क्योंकि उन्होंने जो डिग्रियों का अहंकार अपने सिर पर लाद लिया है।

आजकल देखा जाए तो विद्यालय में शिक्षा कम, नंबर ज्यादा बट रहे हैं। कोई बच्चा फेल हुआ है ऐसा कम सुनाई पड़ता है।
ऐसे ही अयोग्य बच्चों के कारण देश में कोई श्रेष्ठ कार्य नहीं हो पाता है।

वर्तमान समय में विद्यालय नंबर बांटने की दुकान बन गये हैं। अधिकांश इंग्लिश मीडियम बच्चों का रिजल्ट शत-प्रतिशत रहता है।
शुरू शुरू में अभिभावक बहुत खुश होते हैं लेकिन वही बच्चे जब किसी भी दिशा में सफल नहीं होते हैं तो उन्हें बहुत निराशा होती है।

सरकारी नीतियां भी इसमें बहुत बड़ी जिम्मेदार है।वह भी चाहते हैं कि देश में शिक्षित बेरोजगारों की एक बहुत बड़ी टीम तैयार हो जिसे हम समय-समय पर उपयोग कर सके।

ऐसी स्थिति में देश का युवा व्यवस्था की कठपुतली बनकर रह जाता है। डिग्री लेने के बाद ऐसे ही युवा देश के लिए एक बोझ बनकर के रह जाते हैं।

यही कारण है के एक-एक सीटों पर हजारों की संख्या में लोग इंटरव्यू देते हैं। यदि सीट 10 है और लोग 1000 हैं तो ऐसे में 990 युवा अपने को हताश निराश पाते हैं। यही 990 युवा कार्य नहीं मिलने पर अराजकता फैलाते हैं।

देखा जाए तो इसमें दोष युवाओं का नहीं है बल्कि व्यवस्था का है। ऐसी व्यवस्था ही बनी है की 990 लोगों को बेरोजगार रहना ही है। युवा चाह कर भी उन्हें काम नहीं मिल सकता।

मान लीजिए किसी गाड़ी की क्षमता बैठने की 10 है तो उसमें 1000 लोगों को क्या बैठाया जा सकता है?ऐसी ही स्थिति देश के युवाओं के साथ पैदा कर दी गई है।

ऐसे ही हुआ जब चारों तरफ से निराश हताश हो जाते हैं तो अंतिम मार्ग आत्महत्या का चुनते हैं। जो कि उसके परिवार, समाज एवं राष्ट्र सबके लिए घातक सिद्ध होता है।

इसका एक बहुत बड़ा कारण यह भी है कि शिक्षा आज पूजी पति एवं शासक वर्ग के कब्जे में हो चुके हैं।जिसमें अध्यापक चाह कर भी कुछ नहीं कर पाता है। उसे वहीं शिक्षा देनी पड़ती है जैसा पूंजीपति एवं शासक वर्ग चाहता है।

 

योगाचार्य धर्मचंद्र जी
नरई फूलपुर ( प्रयागराज )

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