Vinod Kashyap Sharma poetry

विनोद कश्यप शर्मा की ग़ज़लें | Vinod Kashyap Sharma Poetry

सावन तेरी बाहों में

प्यारे सावन
तूने दी है दस्तक
अपनी प्यारी -प्यारी
बादलों की बूंदों से
तेरी ठण्डी-ठण्डी हवाएं, काली घटाएं
दे रही हैं मस्ती
दिखती है तेरी अद्भुत माया
आ जाता है मौसम में यौवन
दिल लेता है हिल्लौरें
बादलों की गरज की मीठी-मीठी आवाज़ें
हर लेती है मुझ जैसे प्रेमी का दिल
मुस्कुराती है हरियाली।
फूटतीं हैं वृक्षों पर कोंपलें, खिलखिलाते हैं कुसुम,
गर्मी में आ जाती है ठण्डक
आकाश में पक्षियों की उड़ान दिखती है मनभावन
पनघट की छोरियां सजाती हैं घर का ऑंगन
गाती हैं पिया मिलन के गीत
किसी की ऑंखों में बरसता है सावन
किसी के विरह के गीत,
कहीं टपकते हैं ऑंसू,

कहीं होता है मिलन का प्यार
सावन तेरी बाहों में।

मिट्टी हुई लावा

मिट्टी हुई है लावा, दहका हुआ फ़लक है।
ठिठुरे हुए दिलों में तफ़रीह की ललक है।

जो धूप सितमगर थी इस बाम‌ पर नहीं थी,
हॉं शाम सुहानी है, हाँ रात्रि की रौनक है।

राहें न बनी तो क्या, बाहें न बढ़ीं तो क्या
चाहो तो चले आओ आवाज़ भी सड़क है।

सोने पे मुझे शक था क्या दूर किया तुमने,
ऐ आग, सच कहूँ अब तुझ पर ही मुझे शक है।

तहज़ीब किसे कहिए, कहिए किसे तमद्दुन,
जब तय नहीं हुआ है जीने का किसे हक़ है।

तकलीफ़ नहीं घटती, यह रात नहीं कटती-
कुछ नींद ज़ख़्म जैसी, कुछ ख्वाब में नमक है।

हैं चॉंद सितारे चुप,’विनोद’ ख़ामोश हैं हवाएँ,
कोई नहीं बताता यह रात कहाँ तलक है।

साथ महबूब के

साथ महबूब के खिल , खिलाते रहे।
सपने जीवन में हम ही , सजाते रहे।

हमने दिया दिल जिसे विष कन्या थी वो,
साक़ी बने‌ पर जाम विष के , पिलाते रहे।

ज़ोर दिल पर किसी का भी चलता नहीं,
बेवफ़ा को भी दिल से , निभाते रहे।

यह तो पता था वो हो गए हैं निन्दक मेरे ,
हम दुश्मनों को गले से , लगाते रहे।

बेवफ़ा से वफ़ा की ये अपराध था ,
अपराधी बनकर सजा , हम पाते रहे।

उनको कुछ ना कहो ज़िन्दगी है मेरी,
उनकी ख़ुशियों पर हम मुस्कराते रहे।

जीतने का रहा शौक़ उनको सदा,
हम जीत कर भी खुद को , हराते रहे।

तुमने नफ़रत की दीवार की है खड़ी,
हम प्रेम के गीत गा कर , गिराते रहे।

‘विनोद’ तेरा दिल ग़मों का समुन्दर बना,
खेल शह और मात का हम खाते रहे।

पर्यावरण

पर्यावरण से प्राकृतिक संचार चल रहा है।
पर्यावरण के दम से ये संसार चल रहा है।

पर्यावरण बचाना है वृक्षा रोपण कर के,
धरती को वृक्षो का इंतजार चल रहा है।

पर्यावरण से जीव जंतु जीवित है पशु पक्षी,
वन्य प्राणियों का वन वन शिकार चल रहा है।

एक पेड़ लगाओ धरती को खबर कर दो,
वृक्षो से धरती माता का श्रृंगार चल रहा है।

फूल फल शुद्ध वातावरण है लाजमी ,
पर्यावरण का मॉं जैसा व्यवहार चल रहा है।

पर्यावरण नहीं तो यह संसार मरुस्थल,
बन जाएगा मरुस्थल ये आसार चल रहा है।

आओ स्वस्थ जीवन की हवाएँ वृक्षों से पाएं,
वृक्षों का मानव जाति पर उद्दार चल रहा है।

धरा ही तो सहती तूफानों का बाहुबल ,
इससे ही शुद्ध हवा का संचार चल रहा है।

पर्यावरण से दिन, पर्यावरण से रातें,
पर्यावरण का ही उपकार चल रहा है।

पर्यावरण से मौसम ऋतुओं का आना जाना,
पर्यावरण से ऋतुओं का आधार चल रहा है।

‘विनोद’ भूकंप व बीमारियां जानलेवा बनीं हैं,
सब जान के अमल नहीं विचार चल रहा है।

रास आई है फ़िज़ा

रास आई है फ़िज़ा जबसे इबादतगाह की।
राज बंदों का रहे, मर्ज़ी हुई अल्लाह की।

सलवटें ईमान की दिखती नहीं ऐलान में,
धुंध में लिपटी हुई आवाज़ आलीज़ाह की।

हरम के हिजड़े होते तभी तो जानते,
किस गटर में गल रही है दाल शहंशाह की।

आइना अक़बर का औरंगजेब ने खुरचा उसे,
देखता कैसे ज़फ़र सूरत बहादुर शाह की।

यह तरक्की है कि है तनहाइयों की इक गुफ़ा,
यह अंधेरा है कि है काली दुआ हमराह की।

एक जैसे हैं सभी उस बर्फ़ से इस आग तक,
ख़ाल है ज़म्हूरियत की रूह तानाशाह की।

बात करिये ‘विनोद’ से पढ़िए पूर्णिकाओं की किताब,
ज़ख़्म हों दिल में अगर चलती नहीं ज़र्राह की।

मुझसे मिलन

मुझसे मिलने कभी तो आओ तुम।।
हाल अपना है क्या सुनाओ तुम।

प्यार तुमको अगर है मुझसे तो।
प्यार अपना भी तो जताओ तुम।।

राज़ दिल में छुपा के रक्खा है।
खुल के मुझसे ज़रा बताओ तुम।।

इस आग़ोश में रहो तो सही।
कोई शाम तो संग बिताओ तुम।।

रंग चेहरे पे शोख भर देना।
मेरी तस्वीर जब बनाओ तुम।

लिख के रक्खी है पूर्णिका जो तुमने।
मेरी ख़ातिर वो गुनगुनाओ तुम।।

भूला न देना यूँ ‘विनोद’ को कभी।
मेरी यादों में भी खो जाओ तुम।।

छूकर आसमान

छूकर भी आसमां को धरती पर अपना ध्यान रखना।
दुश्मन ही गले लगाए बस ऐसी ज़ुबान रखना।

घर आसमां पर हरगिज़ बनता नहीं है कोई,
दिल की ज़मीन पर ही अपना मकान रखना।

मेहनतकशी के दम पर मंज़िल मिलेगी तुझको,
मत हौसलों में हरगिज़ अपने थकान रखना।

घबराना नहीं है तुम्हें राहों की मुश्किलों से,
चलते ही रहना हरदम पैरों में जान रखना।

बढ़ते कदमों को ‘विनोद’ ज़माना पीछे खींच लेता,
करना न परवाह किसी की मंज़िल पे ध्यान रखना।

हाथ पे हाथ बुरी बात हटा ले कोई

हाथ पे हाथ बुरी बात हटा ले कोई।
वक़्त ने हाथ बढ़ाया है मिला ले कोई।

ओस के धोखे में सूरज न क़त्ल कर दे तुझे
अश्क की बूंद है पलकों पे ही सजा ले कोई।

फ़स्ले दीवार का मौसम है मुल्क में यारो,
मतलबी आकर दुश्मन को ही‌ न पटा ले कोई।

तिलिस्म में तब्दील हुए जाते के बाद एक घर,
मौकापरस्त और मसलों में न उलझा ले कोई।

अपने ऊपर कोई मुसीबत आने से पहले,
नया टिकाऊ तौर तरीका ही अपना ले कोई।

उसने खुलेआम दी‌ ललकार तुझे जलाने की,
शांति वक्त‌ नहीं,कदम जल्द कारगर उठा ले‌ कोई।

तमाम रात रेशमी दमकते महलों में सोकर
बेच लेता है सुबह पॉंव के छाले कोई।

अब इसे ढाल न पाएंगी कभी टकसालें
दिल चवन्नी है हिफ़ाज़त से संभाले कोई।

सोच ऑंचों में गले पर न ढले सॉंचों में,
सोच को दी राहें कहीं साफ़ा न बना ले कोई।

जिस तरह आग मरे मुॅंह पे रखी जाती है,
यूँ मुफ़्त राशन नाम पे खजाने न हड़प ले कोई।

कैसे बच्चों के सवाल कर देते अनसुना
कैसे ख़ुद को करे माज़ी के हवाले कोई।

क्यों सिंदूर के सवालों पर लगी चुटकी,
क्या कभी ऐसे गुल से फूल निकलेगा कोई।

दुश्मन की ललकार पे वार कर रहे पे तोहमत
औछे बोल कहे जो उसे ‘विनोद’ हटा ले कोई।

परिंदों का ब्यान

मैं नदी का शोर हूँ मैं हूँ परिंदों का बयान,
काट सकते हो अगर तो काट लो मेरी ज़ुबान।

मैं अगर मिट्टी महज़ होता दफ़न आसान था,
मैं हवा हूँ, रोशनी हूँ छेंक लूंगा आसमान ।

बिक रहे हैं ख़ुशनुमा नक़्शे खुले बाज़ार में,
खेत में उगता नहीँ हंसता हुआ हिंदुस्तान।

बह गया ऐय्याश सूरज रात के सैलाब में,
रोशनी के नाम पर हैं शेष कुछ जलते मकान।

खा गया गर वक़्त वहशी फूल की नस्लें तमाम,
जो किताबों में दबे हैं फूल खोलेंगे ज़ुबान।

फ़िक्र बाढ़ों में शहर के डूबने की कब उसे
वह बचाना चाहता बेदाग़ ख़तरों के निशान।

बढ़ गईं नज़दीकियां पर दूरियाँ घटतीं नहीं,
कांच की दीवार है शायद हमारे दरम्यान।

पंख की ख़ातिर गंवा बैठे हैं अपने पांव हम,
छोड़ना चाहते हैं अपने बेदाग क़दमों के निशान।

बेचता हूँ हौसला, हिम्मत, हंसी, हातिमपना,
चाहता ‘ विनोद’ अब लोग आकर लूट लें मेरी दुकान।।

हो माँ

एक बालक की पुकार
हो माँ! हो माँ! तुम कहाँ छुपी हो माँ।
मैंने तो‌ ढूँढा लिया पूरा ही यह जहाँ।
मेरी माँ बेटे की अब तो सुनो पुकार।
तार तार तेरे बच्चे हो जाएंगे बीमार।

क्या देखी किसीने कहाँ पे है माँ।
मैंने तो पहले यहाँ देखी थी माँ।
उसने पहले वहाँ देखी थी माँ।
इसने यहाँ देखी थी अर्सा पहले माँ।

अपने बच्चों को देखो प्यारी माँ।
सब रोते पड़ते बिलख रहे हैं माँ।
देखो कैसे सिसक रहे हैं हम माँ।
अपने तो हैं होश उड़ते जाते माँ।

हो माँ! हो माँ! तुम कहाँ छुपी हो माँ।
मैंने तो‌ ढूँढा है पूरा ही यह जहाँ।

मेरी माँ कब तक आप आओगी माँ
इस दिल के फूल खिला दो मेरी माँ।

माथा पटक रहा कब से मेरी माँ।
सुड़ सुड़ सुबक रहा हूँ प्यारी माँ।
करती सब की रखवाली मेरी माँ।
सारी शिक्षा की जननी‌ है मेरी‌ माँ।

हो माँ! हो माँ! तुम कहाँ छुपी हो माँ।
मैंने तो‌ ढूँढा है पूरा ही यह जहाँ।

मेरी माँ बेटे की अब सुनो पुकार।
क्या देखी किसीने कहाँ पे है माँ।

टूट गया हूँ मेरी माँ, रूठ जाऊँगा मेरी माँ।
हम तो सब ही, आज तड़प रहे हैं माँ।
पुकार सुनो मेरी माँ, जल्दी आजा मेरी माँ।
क्यों रुलाती हो, मेरी माँ हूँ भूखे प्यासे माँ।

हो माँ! हो माँ! तुम कहाँ छुपी हो माँ।
मैंने तो‌ ढूँढा है पूरा ही यह जहाँ।

घर में मच हुई चीख़ पुकार,
कबके निकल रहे मेरे प्राण।
खेलो क्या छुपम छुपाई माँ।
पहले बच्चों की तो सुन लो माँ।

हो माँ! हो माँ! तुम कहाँ छुपी हो माँ।
मैंने तो‌ ढूँढा है पूरा ही यह जहाँ।

मगर सच बोल गया

बातें कही हज़ार मगर सच बोल गया।
समझाया सौ बार मगर सच बोल गया।

शीशमहल का मलवा पैरों के नीचे
सर पे थी तलवार आखिर सच बोल गया।

सिर माथे पर संगीनों से हमला बोला
आगे थी दीवार मगर सच बोल गया।

तपिश से पिंघले पत्थर पीस दिए हिन्द ने
घर में पड़ी दरा मगर सच बोल गया।

पिटे अपनी ही धरती पर फिर से
दहशत ही बेकार सच बोल गया।

फंसा लिया था अपना ही आधार
टूटे घर बार आखिर सच बोल गया।

घेर रहा पालनहार पड़ी सच में मार
अब नहीं बचे हथियार सच बोल गया।

डाल दिए हथियार मानी अपनी हार
सीजफायर टूटा पार सच बोल गया।

तड़पते बोला कोई खेलूंगा मैं भी चाल
मरे-कटे उठे हैं, ‘विनोद’ सच बोल गया।

रौद्र ललकार

( पूर्णिका )

आतंक मचाने वालों को भारत ने ललकार दिया
रात अंधेरी में हमने भी छह अड्डों भयंकर पर प्रहार किया है।

घाटी में घुसने वालों पे ‘ऑपरेशन सिंदूर’ चलाया,
पहलगाम का था बदला दर्जनों को यमलोक पहुँचाया है।

छीन लिया है हमने दुश्मन के नापाक इरादों को,
उनके घर में घुसकर ऐसा हमने आखिर घात लगाया है।

सुहागिन को बेवा बनाने वाले तुम ऐसा नाच नचाया
अनगिनत मिसाइलें दागीं कितनों का होश उड़ाया है।

महजबी जहर उगलने वालो गर्द ए कुदरत कहाँ गई,
दहशत का कभी नाम नहीं लोगे बर्छी- तीर चलाया है।

सब वतन परस्तों के लबों पर मुस्कान बिखेरी
मुल्क के दुश्मन जड़ से हिला दिए ऐसा सबक सिखाया है।

रणबांकुरों ने सीमा पर आ कर तेरा खून पिया,
खाक करें मंसूबे दुश्मन ‘विनोद’ ने रणभेरी बिगुल बजाया है।

ललकार

आतंक मचाने वालों को भारत ने ललकार दिया
रात अंधेरी में हमने भी छह अड्डों भयंकर पर प्रहार किया।

घाटी में घुसने वालों पे ‘ऑपरेशन सिंदूर’ चला,
पहलगाम का था बदला दर्जनों को यमलोक पहुँचाया है।

छीन लिया है हमने दुश्मन के नापाक इरादों को,
उनके घर में घुसकर ऐसा हमने आखिर घात लगाया है।

सुहागिन को बेवा बनाने वाले तुम ऐसा नाच नचाया
अनगिनत मिसाइलें दागीं कितनों का होश उड़ाया है।

महजबी जहर उगलने वालो गर्द ए कुदरत कहाँ गई,
दहशत का कभी नाम नहीं लोगे बर्छी- तीर चलाया है।

सब वतन परस्तों के लबों पर मुस्कान बिखेरी
मुल्क के दुश्मन जड़ से हिला दिए ऐसा सबक सिखाया है।

रणबांकुरों ने सीमा पर आ कर तेरा खून पिया,
खाक करें मंसूबे दुश्मन ‘विनोद’ ने रणभेरी बिगुल बजाया है।

खुशियों की बरसात

‌मौसम का रंग है खुशियों का मायना
उत्तर से दक्षिण, पूर्व से पश्चिम
चारों तरफ़ दिखता है उल्लास भरा उत्सव
कहीं कहीं लाल गुलाल, कहीं हरा कहीं पीला
बहार ही बहार।
यह पर्व है बहारों का रंग एक प्यार ही प्यार।
हरियाली की हर बरकत
पेड़- पौधे बिखेर देते हैं
खुशियों के सुहाने रंग।
होली देती है प्यार का संदेश
गंगा जल की तरह हृदय को पवित्र कर देती है
जिंदगी लेती है हिल्लौरें
रंगों में डूबी नजर आती है,
उलझे रिश्ते, संकरे रास्ते
बन जाते हैं घर का ऑंगन,
रंग देखता है रंग को
जिंदगी करती है स्वीकार।
खिल उठते हैं- रंग- बिरंगे चेहरे
प्रेम प्यार छू लेते हैं आसमां
यादों की मस्ती, यादों की होली के
फूटते हैं गुब्बारे दोस्तों के संगीत के संग
जैसे अनेक पक्षी करते हैं कलरव
मनभावन होली फागुन का त्यौहार
देता है खुशियों की बरसात।

नारी शक्ति


मत ललकारो नारी शक्ति को
मौन की प्रबल अभिव्यक्ति को।
अत्याचारी के लिए तलवार बनी
सदियों से ही प्यार की धार बनी।
घृणा , ईष्या के तोड़ सभी बंधन
स्नेह- वीणा की है मधुर तार बनी।

उठी है, बढ़ी है, नहीं डरी है
रुकी नहीं कभी चलती रही है।
अपने लक्ष्य को है पहचाना
इसमें छिपी असीमित शक्तियां।
छिपी नहीं,आत्म- बल को जाना
जागी नारी और नित्य जाग रही
अपनी शक्ति को है पहचान रही।

कोमल देह की स्वामिनी है
भावनाओं से भरी हिरणी है।
मस्तिष्क की तेज़ खिलाड़ी है
कौशल की जबर पिटारी है।
कर्तव्यों का पालन करती है
स्वयं से न मुख न मोड़ती है।
नहीं कभी किसी को तोड़ती है
एक- दूसरे को सदा जोड़ती है।

नारी का जन – जन मान करते
नारी का सदा सब पूजन करते।।

जो नज़र आते हैं लोग

वो नहीं देखने में जो नज़र आते हैं लोग,
इतने बदले की पहचाने नहीं‌ जाते हैं लोग।

आईने को रूबरू पा कर सहम जाते हैं लोग
अपने साथ से भी जैसे अब शर्माते हैं लोग।

दिल की तसल्ली के लिए क्या क्या करते हैं फरेब
जब हकीकत सामने आती है शरमाते हैं लोग।

हम दहल जाते हैं! चेहरे पर उदासी देखकर
कौन से दिल से किसी को दिल से ठुकराते हैं लोग।

एक मुहब्बत के भी यारो क्या अजब दस्तूर हैं
भूलना चाहते हैं जिनको वो भी याद आते हैं लोग।

या इलाही इस जहाँ में कौन सा ग़म खा गया
मानिये शम्मा – ए सहरी क्यूँ बुझे जाते हैं लोग।

जिनसे होती है तमन्ना उम्र भर के साथ की
वक़्त पड़ जाने पे अक्सर वो ही कतराते हैं लोग।

यूँ ही दिल की पुरसिरा के लिए आते हैं अश्क
ग़म बहाने की जगह पर ग़म बढ़ा जाते हैं लोग।

विनोद कश्यप

विनोद कश्यप

चण्डीगढ़

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