Dr. Pallavi Singh 'Anumeha' Poetry

डॉ पल्लवी सिंह ‘अनुमेहा’ की कविताएं | Dr. Pallavi Singh ‘Anumeha’ Poetry

सच्चा प्रतिवाद

तुम्हारे बेतरतीब बरताव से
मैं अभिप्रहत हुई…
किन्तु रोई नही
न ही मैं चिल्लाई
और न ही मैंने तुम्हें पुकारा
न कोई आरोप लगाया ….
बस शनै:-शनै: तुम्हारी जिंदगी से
पृथक कर लिया
निर्वाक रुखसत हो ली।
तुमने कदाचित,
सोचा कि फतह
हासिल कर ली मुझसे…..
लेकिन कालांतर में
ये मौन
तुम्हारी अंतरात्मा के ड्योढ़ी पर
आहट देगा
तुम बचना भी चाहो इससे
लेकिन यह मौन रुकेगा नही…
क्योंकि सच्चा प्रतिवाद
कभी शोर नही करता
यह मौन के साथ बहता है–
तब तक,
जब तक तुम्हारे मन में
पछतावे की
तपिश न उठे !!

अजल ढूंढ रही हूँ मैं !

है तमस प्रचुर
पर चल रही हूँ मैं !
अजनबी रास्तों पर
अपना घर ढूंढ रही हूं मैं !
अब ठोकरों की फिक्र नहीं मुझे
फिर भी
गुमनाम मंजिलों को
ढूंढ रही हूँ मै !
किसी को हाथ
थामने न दिया
फिर क्यूँ कंधा
ढूंढ रही हूँ मैं !
थम न सकी
कभी किसी के लिए भी
और स्वयं आसरा
ढूंढ रही हूँ मैं !
इन नन्हें कदमों को
कभी गति न दी
और सफर ढूंढ रही हूँ मैं !
अपना ही साया
साथ नही
हमसफ़र ढूंढ रही हूँ मैं !
स्वयं ही नही जानती
जाने क्या ढूंढ रही हूँ मै !
चार दिन की
नन्हीं-सी जिंदगी है ‘मेहा’
और स्वयं के लिए
अजल ढूंढ रही हूँ मैं !!

काव्य-समीक्षा : डॉ. यल. कोमुरा रेड्डी


काव्य लेखन : कवयित्री डॉ. पल्लवी सिंह ‘अनुमेहा’

‘अजल ढूंढ रही हूँ मैं’ शीर्षक की यह कविता कवयित्री के गहन आत्म-संघर्ष और अस्तित्व के सवालों को बयां करती है। यह कविता दिखाती है कि मनुष्य अपनी जिंदगी में क्या-क्या ढूंढता है।

आशा और निराशा का द्वंद्व:
कविता की शुरुआत आशा के साथ होती है, “है तमस प्रचुर पर चल रही हूँ मैं”, जो कवयित्री के संघर्षशील स्वभाव को दर्शाती है। फिर, वे कई विरोधाभासी बातें कहती हैं, जैसे कि “किसी को हाथ थामने न दिया फिर क्यूँ कंधा ढूंढ रही हूँ मैं”, जो उनके मन के भीतर के द्वंद्व को दिखाता है।

अस्तित्व की खोज:
इस कविता की मुख्य बात यह है कि कवयित्री अपनी पहचान और अपनी मंजिल को ढूंढने की कोशिश कर रही हैं। वे अपनी ही परछाई के साथ नहीं हैं, फिर भी एक साथी की तलाश में हैं।

दार्शनिक गहराई: कविता में दार्शनिक भाव भी है, जब वे कहती हैं “स्वयं ही नही जानती जाने क्या ढूंढ रही हूँ मै”। यह मनुष्य के जीवन की अनिश्चितता और उसके अंतहीन खोज को दिखाता है।

कविता में “चार दिन की नन्हीं-सी ज़िन्दगी है ‘मेहा’ और स्वयं के लिए अजल ढूंढ रही हूँ मैं” यह पंक्ति जीवन की नश्वरता को दर्शाती है। “अजल” का अर्थ है वह जो कभी खत्म न हो, यानी अमरता। कवयित्री यह जानती हैं कि जीवन छोटा है, फिर भी वे कुछ ऐसा ढूंढ रही हैं जो हमेशा के लिए हो।

यह कविता, एक गहरे भावनात्मक और दार्शनिक अनुभव को प्रस्तुत करती है।

एक ही परिप्रेक्ष्य

    हमेशा अनुरक्ति को,

    एक ही परिप्रेक्ष्य में,

    क्यूँ नापा जाता है।

      जबकि अनुरक्ति,

     प्रत्येक आत्मीयता में,

     विद्यमान होती है,

     प्रत्येक लगाव में,

     प्रत्येक अहसास से,

     सहचर तक,

       विहंगों से लेकर,

       विधाता तक,

       मंजरियों से लेकर,

       मधुप तक,

       निस्यंद से लेकर,

       सुवास तक,

    प्रत्येक पुष्पमाला से लेकर,

    विधाता के प्रति आस्था तक,

    गेह में गूँजती,

   हर्षध्वनि तक,

   माँ के आँचल से लेकर,

   पिता की फटकार तक,

      और तो और-

      रेशमी धागे की

      पतली-सी गांठ तक,

      किसी की स्मृत करने भर से

      नयनों में झलक आने वाली

      उन आँसुओं की बूंदों तक

      यह तो प्रत्येक जगह

      व्याप्त है।

        अनुरक्ति का कोई छोर

         ही नही रहता,

         वो तो हर इंसान के

         अंतर्मन में है,

         और ये अनुरक्ति किसी की

          मोहताज नहीं है।

      उस अनुरक्ति के अंदर

      समाई पूरी कायनात है,

      ऐसा कुछ नही,

      जहाँ इसकी संभावना न हो,

      इंसान ने स्वयं की गलतियों

      के कारण

      अनुरक्ति के प्रति गलत

      धारणाएं बनाई है,

      सत्य धारणाऐं है…

      अनुरक्ति नहीं…..।।

एक बूंद

     अस्तित्व बूंद का

     बनता है तभी

     जब विराट सत्ता से

     पाती है पृथक

     स्वयं की एक इकाई में

     कर लेती है स्थिर।

         बूंद स्वाति की

         बन जाती है मोती

         कपूर बन जाता है

         कंदली वन में

         वंशलोचन बांस के कुंजों में

         प्रकृति जल उठती है

         ग्रीष्म की तपन में

         तो–

         पहली बूंद आसाढ़ की

         बन जाती है सौंधी-सी गंध।

     ढुलक जाती है एक बूंद

     कपोलों पर तब

     प्रेम का सागर बन जाती है

     इस तरह

    आवृत्ति में

    ‘स’ वर्ण की

    शक्ति, शील, सौंदर्य को पा

    धन्य समझता है-‘अहंकार मन’

    फिर भी नहीं ‘शांति’

        क्योंकि सिमट गई है—-

        विराट में ‘एक बूंद’ !!

ख्वाबों की पोटली

    सुनो…….

    दिल ने कई बार चाहा

    तुमसे मिलने का

    मन भी बार-बार होता है

    बात करने का

    पर दिल तो दिल है ना

    चाहता रहता है

    लेकिन–

    मैं अब इस दिल को

    काबू कर लेना जानती हूँ

    स्वयं के गुने सपनों में

    मिल लेती हूँ तुमसे

    बातें भी कर लेती हूँ

    धीरे से तुम्हारे ललाट को

    सहलाकर–

    चुम्बन भी ले लेती हूँ

    उन्हीं गुंथे हुए अपने

    सपनों के मध्य

    पूछ लेती हूँ तुमसे

    कैसे हो तुम ?

    अनेकों बार उसका

    उत्तर सहज मिल जाता है

     मगर कई बार तो नही भी

    हो सकता है–

         शायद,

         मेरी उस स्तर तक

         प्रेम की साधना है जो

         नहीं पहुँच पाती हो

         जहाँ से तुमको आवाज दे सकूं

         अपने नयनों को बंद करते ही

          मिल सकूं तुमसे मैं।

       हाँ, मैं चाहती हूँ

       कि एक हल्का-सा हवा का

       झौंका आये

       और तुम्हारे कानों में

        कह जाये मेरी सारी बातें

        कि-मैं तुमसे और सिर्फ

        तुमसे प्यार करती हूँ

        तुम्हारे माथे में पर ये

         टपकती जल की जो बूंदों है

         चूमना चाहती हूँ

         तुम्हारे आँखों पर रख देना

          चाहती हूँ

           अपने ‘ख्वाबों की पोटली’

           हो जाना चाहती हूँ

           तुमसे एकाकार

         सुनो….

         मैं अपने इस प्यार को

         उस अवस्था तक ले जाना चाहती हूँ

          तुम्हारा एहसास हो

          जीवन के अंतिम पड़ाव तक।।

पिता स्मृतियों में

एक नदी,

एक पहाड़.

एक घाटी,

एक सपना,

एक कोई अपना

जगह-जगह घूमकर

लौट आतें है पंछी

नीड़ पर….

फिर आप क्यूँ नहीं आते

कहीं तो

पहुचेंगी अजाने

कोई तो घर होगा

इत्मीनान का

वहीं से तो आते है

सब…

फिर आप क्यूँ नहीं आते

आप सदा साथ थे मेरे

और साथ रहोगे

मेरी स्मृतियों में।।

एक मैं

मेरी वेदनाएँ बहुत बड़ी है -तुम्हारे से,

अपनी तीखीं नोकों से चुभोती रहती हैं,

मेरे कलेवर को, मेरे मन को-

हैं तो तुम्हारे पास भी

मुझसे अधिक घनी किन्तु स्निग्ध।

मैं स्वयं को उनके बीच से

ऐसे ही ले जाना चाहती हूँ,

जैसे सांप जाता है कटीली झाड़ियों में

अपनी केंचुली उतारने के लिये।

आँख खुले और साफ देख सकूं,

मैं अपनी जिंदगी को।

मगर तुमने उनसे भी सहकारिता दाखिल कर ली है,

मैं सो जाती हूँ गहरी नींद

खुरदुरे बिस्तर पर भी

मगर तुमको नहीं आती है नींद

मखमली गद्दों पर में

इसलिए तुम रात में बैचेन, और मैं दिन में।

हर रोज सैकड़ों मंदिरों से गुजरती हूँ,

मगर तुमने इन्हें भी अपना जीवन समझ लिया है।

अहसान वेदना का तुम्हें कम है,

क्योंकि-आँखों पर अहमन्यता की

मोटी-सी केंचुली चढ़ी है।

मुझे छोटी-सी भी छोड़ जाती है-

कसक, वेदना, टीस।

मैं यह सब खुली आँखों से देख रही हूँ,

तुम जो फैसले करते हो और

समझते हो उसे अपना जीवन,

किन्तु मेरी विडम्बना है कि-

मैं उनके पर्याय ढूंढ लेती हूँ,

क्योंकि मेरे अन्तरतम में

बिखर गया है सब।।

करूँगी बातें तुमसे

      तुमसे–

      किसी दिन खाली समय में

      करूँगी बातें….

      जब पश्चिमांचल का सूर्य

      अपनी लोहित अरुणिमा से

      गोधूलि बेला के कपोलों को

      नहलायेगा…..

      जब मिलाप की बेला के

      कोने-कोने…..

      हमारे प्रेमरंग से भींग जायेंगे

      तब मैं खाली समय में

      करूँगी बातें…..

           जब मेरे अक्षर शब्द भाव

           तुम्हारी कल्पनाओं में आ

           जायेंगे….

           जब मेरा नारीत्व

           तुम्हारे पौरुषत्व में समा

         जायेगा….

          तब किसी दिन खाली समय में

         करूँगी बातें…

     अभी न थोड़ी-सी प्रतीक्षा बाकी है,

     अभी न तुम्हारे अंदर अभिमान की

     पैनी धार बाकी है…..

     इसलिए

     फिर किसी दिन खाली समय में

    करूँगी बातें…

         जब न तुम्हारे चिंतन में नारीत्व के

         उस निरूपण का सृजन हो,

         जिसमें मैं रहूँ, मेरे अस्तित्व की

         शैली रहे….

         जिसमें न मेरा मूल्यांकन हो

         सीता के नारीत्व की तरह

         न विरोध हो तुम्हें, मेरे विरोध से

         जिसमें न किसी तरह की आपत्ति हो

         तुम्हें …..

         मेरे ख्वाबों के विस्तार से

         उस दिन खाली समय में

         करूँगी बातें तुमसे…..!!

नामकम्वल आरजुयें

            फिर किसी दिन

        मैं खाली वक्त में लिखूंगी

       वो सारे सुनहरे लम्हें

      जिनको मैंने सोचा तो जरूर था

      लेकिन उनको मैं जी नही पाई।

        वो सारी खिलखिलाती सुबहें

        जो मेरी खिड़कियों से झांकती तो थी

        मैंने उन्हें देखा भी था

        लेकिन उनको अपने आगोश में

        भर नही पाई।

     वे शाम की जलती दीवा-बाती

     जो मेरे आँगन तुलसी बिरवा

    उतर आती थी

    जिसने किया था घर मेरा रौशन

    लेकिन स्वयं को उनमें खो नही पाई।

      वे बारिश की बूंदें

      जिन्हें मैं अपनी हथेलियों में

      थाम लिया करती थी

      उनको महसूस तो खूब किया था मैंने

      लेकिन उनमें भीग नही पाई।

   वे नगमें जो मेरे होठों पर आये थे कभी

   जिन्हें फिर कभी मैं गुनगुना न सकी

   वही सपनें बन मेरी पलकों में जले

   लेकिन मेरी रश्मिप्रभा न बन सके।

       शायद

       जिस दिन मैं इस दुनियां से परे

       स्वयं से रूबरू हो जाऊँगी

       तब उन सारी नामकम्वल आरजूओं के

       मुक्कवल गीत लिख जाऊँगी !!

दो अवरक्त रेखायें

     दो अवरक्त रेखाओं से हम…

     चलते जा रहे है सहचर….

       या दूरवर्ती… फासिले पर….

          या फिर आस-पासी….

        इस परिकल्पना के साथ…..

      कि कहीं दूर–

        गगन के उस पार….

      अभ्र के ऊपर कहीं….

    कहीं तो मिल जायेंगी ये रेखाएं…

            या

     मेरी तृप्ति के निमित्त कहीं…..

          कि

     ना भी मिलो तो भी

         मेरे साथ हो….

      अनवरत प्रयास–

        तुम्हारा मेरे साथ होने का

        मगरूर करता है मुझे

     तुम्हारा-मेरे साथ

          होने मात्र को…

      ये अनुभूति अतुलनीय है मेरी…

          जानती हूं…

      दो अवरक्त रेखाएं

        कभी नहीं मिलती….

       भले ही उन्हें कितना भी

       बढ़ाया जाए…

    कभी दिशा बदलने के

     लिए ही सही…

   फिर भी मुझे लगता है कि-

       मिलती जरूर हैं….

      मिलेंगी भी जरूर.. !!

      इसी अपेक्षा में

            कि-

    शायद हम दोनों भी

    मिलेंगे जरूर रेखाओं के

     एकाकार होने पर

      उन गैर प्रतिच्छेद रेखाओं

         की तरह…..!!!

गुलमोहर के नीचे

    गुलमोहर के नीचे

          एकाकी मौन मूर्ति

          चिंता से भूकंप से कंपित

          शांत बैठी

          शून्य में ताकती

          कुछ खोजती

          निर्मला-सी

    पत्थर की अनघड़

    हिममयूख….

           समतल-सी किरच

           सिहर उठी

     अंगूठी का जंगल

     नग का फिसलन

     जड़कर……

           उघड़ रहा

           व्यथा अंगूठी की

           अनकही रही….

     विरह का वैधव्य-सा कोटर

     हँसता रहा

     सूनी मांग-सा

     अनजान डगर

     तकता रहा

     फिर,

           पुनः गुलमोहर के नीचे

            कुछ बतियाकर झलता रहा

            संबोधन का घाव

            टीस……

     अंगूठी का कंपन-सा सालता

     त्रिकम्पित मन

     बंद नयन से

         उन्हें देखता रहा

         उनके अंतर्मन की प्रतिध्वनि सुनता रहा।।

   1-अनघड़-बेढंगा, बेडौल

   2-हिममयूख-बर्फ की किरण

   3-वैधव्य-विधवापन लिए हुए

   4-कोटर-पेड़ का खोखला भाग

   5-किरच-नुकीला, छोटी बरछी।

एक ठहराव

    उन न बांची गई

        व्याख्याओं का

      तो मुझे पता नही

               किन्तु

      मेरे दृष्टिकोण से

          अनुराग

             अर्थात

       जिससे कुछ कहने पर

         किसी प्रकार का

         संकोच का भाव

           उत्पन्न न हो,

      कुछ विचारना ही न पड़े

            बल्कि–

        उसके विषय मे

       उसकी पसंद-नापसंद

              को

       बेझिझक कहा जा सके…

       उल्लास और रज को

        जिसे सबसे पहले

          बांटने का मन करे….

       अपनी हर विजय,

           हर पराजय में

     जो प्रथमतः याद आये,

             उन्हें-

       उसके साथ बांटने  का

         दिल करे

     छोटी-बड़ी तकरार हो

        भी जाये,

         तो वह कभी

          नीचा न दिखाये

      और तो और

       दिनभर की

         सारी उलझनों के

           उपरांत

      वह एक ठहराव

          बन जाये… !!

गीत अनुगूंज

    जानती हूँ मैं

           कि

    मेरे गीत अनुगूंज है,

        इन हवाओं के

            पंखों पर

       कभी निश्चित ही

             उड़ें होंगे !!

       मेरे ये गीत

         मेरी ही धरोहर हैं….

        सबके लबों पर

              शायद

           ये गूंजे होंगे…..

       मेरे ये जो शब्द है

               न

         मेरे पेशानी में

         मेरी सांसों में है..

        लेने दो इन्हें भी…

      निकलने दो इन्हें भी…..

           ऐसे ही

             बाहर….

       नही तो मैं

          बिन मरे ही

            मर जाऊंगी…..

      सच कहती हूँ–

        सहज ही इन गीतों को

       यूँ ही बुनने दो मुझे…. 

       यूँ ही  बहने दो इन्हें…..!!!

शब्द भी शून्य हो जायेंगे

      जहाँ पर,

         सारे शब्द भी शून्य

          हो जायेंगे…

       तब भी मैं

         तुम्हें पढ़ लूंगी,

      जहाँ तक,

        इस इला से सारी

          आवाजें, सारे स्वर

           नभमय हो जायेंगे…

       उस वक्त भी मैं

         सुन लूंगी तुम्हें,

     जहाँ पर,

       नदियों के सारे सुर-ताल,

         गुम हो जायेंगे…

       उस समय भी मैं

         गुनगुना लूंगी तुम्हें,

     जब तक,

        मेरी समस्त ज्ञानेन्द्रियाँ

        शिथिल नही हो जाती,

         तब तक मैं,

          छू सकती हूँ तुम्हें,

      तुम तब तक,

         बिसरने वाले नही,

         जब तक मैं

          मृत्यु-शैय्या को

          प्राप्त नही कर लेती।

    एक बात और–

       शायद उसके उपरांत भी

       मैं इतना सामर्थ्य

        रख पाऊँ कि-

       मेरी आवाजें

        उन सात सुरों को

         अपनी ग्रीवा में

           समायें हुए हो !

    सान्ध्य बेला के समय

    उतर आई लालिमा भी

     मेरे कपोलों को

     सिंदूरी रंग लिए

       सुबह तक जागी रहें….

    तुम न जान पाये..

          और-

     न ही जान पाओगे…

      इस मिलन की दीप्ति को,

        देखा है तुमने

         इस निसर्ग के श्रंगार को…

       रंग चढ़ा है

           तुम्हारा ऐसा कि

         मेरी हथेली ही क्या,

       इस पूरी कायनात का

         रंग ही रंगहीन

             हो गया है !

      मुझे न उस मधुमास

       की चाह नहीं

        मैं तो खिज़ा के

      प्रेम में

        डूबी हूँ इतना

     कि जिसकी समस्त

       सूख चुकी डालियों में

         जो स्मृतियां लटकी

          हुई है न

      शायद मैं

         उन्हें भी चुन लुंगी…

      देखा तुमने मुझे–

       मैं आज भी

         उसी प्रतीक्षा में..

      सितारों की मध्यम

                रोशनी में

       एक दिवा जलायें

              हुए बैठी हूँ..

     कि कहीं कोई एक तारा ही

      तुम्हारे आने की

          खबर दे दे…

     तुम ये क्या

         बिल्कुल भी नहीं

            जानते हो कि-

       अप्रीति की गर्द के

        फलस्वरूप भी

         कहीं कोई कोमल

        अनुभूतियां है…

     जो दर्द को, व्यथा को

        सुन भी लें….

     और

        पढ़ भी लें

      देखा तुमने–

       मौन उस वक्त भी

        चीत्कार नही करता।

        तुम शायद यह भी

          नही जानते हो

       कि—–

     प्रत्याशा के बिना

            प्रेम

       अपना सौंदर्य तक

               खो देता है..

       और पवित्रता खो

               देती है

          अपना शून्य !!!

ऐसे समेट लेना मुझको

       तुम जब भी मिलो

             मुझसे

       मुझे ऐसे समेट लेना

    जैसे कि हम प्रथम बार

           मिले हों…

     समेट लेना ऐसे

           कि–

        मेरा सारा दर्द

           निथर जाए

      और—-

      मेरी सारी व्यथाएँ

           दम तोड़ दें

             मेरे अंदर ही..

      धराशायी हो जाये

        मेरी सारी उदासियों की

         असंख्य मंजिलें…

    जब मिलो न मुझसे

       तो ऐसे समेट लेना

       जैसे एक टूटते मकां को

        समेटा जाता है,,,

      उस मकां को टूटता देख

          रो पड़ता है,

    उसका एक-एक कोना…..

     ऐसे ही तुम समेट लेना

     कि मैं बिलखकर रो पडूं

      अपने मकां को

         बचाने के लिए….

    और–

       मेरे आँसूं बहा ले

     जाये मेरे एकाकीपन को….

      रह जाये उसमें केवल

      तुम्हारा प्रेम….

    ऐसे समेट लेना

       तुम मुझको…….!!

प्रतिध्वनि

यकीनन कभी-कभी न,
सह्रदय,
भावमय हो,
स्नेह से,
बाहों में भर लेना,
कितना ठहराव-सा
दे जाता है,
मेरे अंतर्मन को।
जिससे मुझे आत्मिक प्रेम है,
उसके हिय से लगकर,
विस्मृत हो जाती है,
मेरी हर पीड़ा।
चारों तरफ का परिवेश,
निष्कलंक मालूम होता है,
हिय के स्पन्दन में,
उठ रहीं आवाजें
किसी देवालय की घण्टियों-से,
आ रही प्रतिध्वनि-सी
प्रतीत होती है,
अन्तःकरण सुवासित हो,
अलक्षित-सा
नाच उठता है।।

ये सारे सतरंगी रंग

        खुशी में डूबे रंग खिलखिला रहे है,

        इतने सारे सतरंगी रंग,

        कि पुष्प भी चुरा रहे है रंग,

        तितलियों के लिये,

           जब कोई मिलता है अपना,

           एक रंग, दूसरे रंग से,

           तब परिवर्तित हो जाता,

           है उसका रंग पहले से।

      कितने सारे रंग है जीवन में,

      जब तुम क्या फर्क कर सकते हो,

      गुलाल में, रक्त की लालिमा में,

      निकल आये है लोग घरों से बाहर,

      आसमान भी होता जा रहा है लाल,

          फेंकता है कोई रंग का गुब्बारा,

          भींग जाता है इंसान उस रंग से,

          देखो-रंगों की बारिश हो रही है,

          जो रंग रहा है रंग,

          मेरी आत्मा को अंदर से,

      हवा में गूंज रहा है,

      सिर्फ एक शब्द बार-बार,

     प्रेम ही है वो रंग,

     जो छिपा रहा अपने रंगे हुये मन को।।

मैं हूँ ना

    मैं तुमसे बेज़ार नही हो सकती हूँ,

    मैंने प्रयत्न बहुत किये,

    लेकिन मुसलसल तुमसे तकराकर,

    चली जाती हूँ परे,

    परे हो जाने के उपरांत भी,

    इत्मीनान नही मिलता,

    और प्रत्यागत,

    पलट आती हूँ तुम्हारे पास,

    लेकिन क्यूं ??

          सुनो……

          पलटती हूँ भी इसलिए,

          क्योंकि–

          मेरे रूह में प्रेम समाया हुआ है,

           ये जीवित रहेगा मेरे मरणोपरांत भी,

           मैं कितना ही बेज़ार होती हूँ तुमसे,

           किन्तु–

           नाउम्मीद कभी नही होती,

            मेरी नाख़ुशी, झुंझलाहट में,

             वफ़ादारी है, अपनायत है,

            आत्माभिमान है–इसलिए खुशामद के बिना भी,

             पलट आती हूँ तुम तक,

             मेरे राग में प्रथम किरण की,

             प्रियता समाहित है,

              जिसके छूने मात्र से ओस की,

              बूंदे भी अपने,

               राजसी  दुशाला को ले चमकने

               लगती हैं।

       मैं इसलिए भी पलट आती हूँ तुम तक,

       क्योंकि तुम्हारी अहमियत..  

       मेरी हयात है !!

       मैं वापस आती हूँ–

       कि तुम्हें सुना सकूं,

        ह्रदय की गुनगुनाहट,

        न जाने कितने बार खुद के,

       अन्तःकरण और वेदना को,

       बयांकर रो सकूं तुम्हारे समक्ष,

       कई दफ़ा तुम्हारी फिसलन से,

       परेशां होती हूँ मैं,

       मेरे लिए नियति रखती है,

       कि–

       मुझे बोधकर,

       मुझे ह्रदयंगम कर,

       तुम अपने राग में अनुरागित कर,

       हौले-से कह देना,

       रोना नही….

       ऐसा अब और कभी-भी नही होगा,

      सब न्यायमुक्त होगा…..

       मैं जो हूँ ना..

       तुम्हारे साथ….!!

एक स्त्री के प्रश्न

     एक बात पूछना है तुमसे-

      क्या तुम जानते हो,

      एक पुरूष से विलग,

      एक स्त्री का एकांत,

      एक स्त्री का अकेलापन,

     उसका सूनापन,

     उसकी पीड़ा, कसक, तड़प ?

     घर, प्रेम और जाति की

     परिभाषा से विलग

     उसके अस्तित्व को ?

     उसकी अपनी जमीन,

     उसके अंदर चल रहे

     अहसास को,

     क्या बतला सकते हो तुम ?

        दिखा सकते हो कई जन्मों,

        सदियों से उठ रहे झंझावतों को,

        अपने घर को तलाशती,

        ठिकाना ढूंढती…  

        उस स्त्री को

        उसके घर का पता

         बतला सकते हो ?

         क्या उसकी कल्पनाओं में

         उड़ान भरते उसके

         अस्तित्व के मायने को ?

     स्वयं को तराशती,

     अपने स्वातंत्र्य को ढूंढती….

     एक पल में-

     न जाने कब उसे स्थापित

     कर दिया गया हो और

     न जाने कब निर्वासित…..

         ख्वाबों में दौड़ लगाती

         उस स्त्री का पीछा

         कभी किया है तुमने ?

         क्या कभी उसे रिश्तों,

         घर की मर्यादा से विमुख

        उस कुरुक्षेत्र में,

        खुद से लड़ते देखा है

         तुमने ?

     अपने शरीर के ढांचे से परे

     उस स्त्री के मन की अंदर

     पड़ी गांठों को खोलकर

    पढ़ने का प्रयास किया है

    तुमने ?  

    उसके अंदर उबलते, उमड़ते

     अभिलेखों, इतिवृत्त, पूर्ववृत्त को–

       कभी समझने का प्रयत्न किया है

      तुमने ?

       उसके अंदर उठ रहे ज्वार-भाटे को,

       जिसे उसने

       अपने चेहरे की दहलीज

       पर शब्दों की राह तकते,

       चरमराते रख रखा है—

        उसके अंदर घर बना बैठी

        उन बातों को

        कभी अनुभूत किया है

        तुमने ?

           जो उसके अंदर कैक्टस जैसे

           फैले हुए है

           देखा है तुमने ?

       तुम बता सकते हो–

       उस स्त्री के सारे रिश्तों के समीकरण?

      क्या उसकी स्वयं की दृष्टि में

      उसके स्त्रीत्व की परिभाषा को

      पढ़ा है तुमने ?

    अगर ये सब नही देखा और पढ़ा है,

     तो तुम समझते क्या हो,

     उसे ——

     घर की चौखट के

     अंदर रसोई

     और बिछावन के

     गणित से अलग

     उसका कोई अस्तित्व

     ही नहीं रहें—-

     बस सिर्फ इतना ही

     समझते हो तुम

      मुझे या मेरे

      स्त्रीत्व से

      अलग कुछ है

       या नही…..!!

एक आकृति

    मैं उकेरना चाहती हूं

         एक आकृति…

        अपने कोरे कागज पर,

         भेजना चाहती हूं

         उसे एक खत में…..

         इन चल रही बयार के साथ,

         और भेजना चाहती हूं

       उसे तुम तक…

       जिसमें मेरे सारे एहसास…

       सारे जज्बात समायें है,

        सुनो….

      क्या मेरी तरह तुम भी,

         समझ सकोगे उस आकृति की

         भाषा को…?

      क्या उसमें दिखाई देगा

        तुम्हें अक्स मेरा…?

      क्या सुन सकोगे

         उसमें मेरी आवाज को….?

          जो कभी गूंजती थी तुम्हारे

          आसपास सदैव ही,

        क्या शाम की शीतल पुरवा

             बयारें…..

         मेरे होने का एहसास

         करायेंगी तुम्हें…?

         क्या वह आकृति,

         तुम्हारी बैचेनी को बढ़ा देगी….?

        उसे देख– 

       क्या मेरी तरह तुम्हारी

       धड़कने भी थम-सी जायेंगी. .. ?

       याद आयेगा मेरा चेहरा तुम्हें,

       बताओ क्या मेरी तरह,

       तुम्हारी पलकें भी गीली,

        हो जायेंगी…..?

          मेरे घर के दरीचे…

          मेरे घर की चौखट….

          आज भी खुले है वैसे ही,

          तुम्हारी राह तकते….

       एक बात और बता दो तुम–

       क्या तुम्हें भी मेरे लिए

        मर मिटने की चाह होती है…?

        मैं जानना चाहती हूं तुमसे,

        क्या तुम्हें भी एहसास होता है,

        वो सब मेरी तरह ….

         जो मैं करती हूं तुम्हारे लिए… 

       समझ सको मेरी आकृति को,

       प्रति उत्तर अवश्य देना….

        प्रतीक्षा रहेगी….  ।।

उत्छाह

मेरा तुमसे उत्छाह,
कभी इस बात पर मुनहजर न होगा,
कि तुम मुझसे कितनी मोहब्बत करते हो,
करते हो भी या नही,
तुम स्वतंत्र हो,
अख्तयार नहीं तुम पर मेरा,
तुमने जितनी ठाम दी,
मैं और मेरे क़दम वहीं रुके रह गये।
जानती हूँ,
मैं वो नही,
जो तुम्हारे ख्वाबों को उड़ान दे,
जिसके साथ तुम दूर, बहुत दूर तक
चलना चाहो,
मेरे से पहले भी कई लोग हैं,
तुम्हारे हयात में, जो बहुत ख़ास है
तुम्हारे लिए,
तुम्हारा मौसिम भी उनका है,
फिर—
तुम्हें मोहब्बत करने वाले भी
बहुत हैं,
तो, उनमें मेरी जगह ही कहाँ है,
वो जब भी तुम्हारे नज़दीक आये,
मैं दूर, बहुत दूर होती चली गई,
ये जानते हुए भी कि-
मेरे लिए सिर्फ तुम हो,
हाँ, ताउम्र ये रंज रहेगा
कि…..
तुम मुझे न देख पाये,
और न ही समझ पाये,
मेरे हयात में मुलाजमल,
अभी भी तुम बहुत उलझे हुये हो,
कुछ भ्रम में, कुछ सच्चाई में।
जैसे-जैसे घाम खिलेगी,
गर्द अपने आप छटती चली जायेगी,
तब किसी दिन शायद,
तुम महसूस कर पाओ,
मेरे उत्छाह को, मेरी बातों को,
समझ सकोगे, मेरी उन सारी,
ज़हमत को, जिसे मैं अंदर लिए हुए,
तुम्हारी जिंदगी से इतनी दूर
चली जाऊँगी,
कि अगर तुमने सदा भी दी तो,
शायद तब तक इतनी देर हो चुकी होगी
कि…..
मुझ तक तुम कभी पहुँच ही न पाओगे।।

1- उत्छाह – चाहना
2– मुनहजर – निर्भर करना
3- अख्तयार – हक
4- मौसिम – वक्त
5- मुलाजमल- जगह

अनसुलझी बातें

कभी-कभी अत्यधिक स्थूलता,

     भरा अन्तःकरण,

     न कुछ समझना चाहता है,

     न कुछ सुनना,

    और न ही कुछ बोलना चाहता है।

      नीरवता में लिप्त हो जाना चाहता है,

     कभी चीखना चाहता है,

     या फिर

     फूट-फूटकर सिसकना,

     जी भरकर….

     अन्तःकरण में उपजी गर्द के

     रिक्त होने तक,

     किन्तु–

     समझ भी नहीं पाता कि

     उसे पीड़ा किस बात की है,

     क्यूं टीस-सी उठती रहती है

     बार-बार,

     प्रत्येक बातें घूम-फिरकर

     आघात करती हैं,

     दस्तक-सी देती है बारम्बार,

     कई बातें सुई-सी चुभोति मालूम

      होती हैं,

     ऐसा लगता है कि–

     मेरा होना व्यर्थ ही हुआ,

     आईने से भी होती है नफरत-सी,

     वह भी यही कहलवाना चाहता है।

       इसलिए,

       अपने अस्तित्व में लगता है,

       कुछ भारीपन,

       आंखें न जाने क्यूं इतनी,

       भारी-भारी-सी लगतीं हैं,

       जैसे एक पारावार वहाँ ठहर गया हो,

       खैर……

       ये सब अन्तःकरण की

       अनसुलझी बातें हैं,

       बस……..।।

      कभी-कभी अत्यधिक स्थूलता

     भरा अन्तःकरण

     न कुछ समझना चाहता है,

     न कुछ सुनना,

    और न ही कुछ बोलना चाहता है।

      नीरवता में लिप्त हो जाना चाहता है,

     कभी चीखना चाहता है,

     या फिर

     फूट-फूटकर सिसकना,

     जी भरकर….

     अन्तःकरण में उपजी गर्द के

     रिक्त होने तक,

     किन्तु–

     समझ भी नहीं पाता कि

     उसे पीड़ा किस बात की है,

     क्यूं टीस-सी उठती रहती है

     बार-बार,

     प्रत्येक बातें घूम-फिरकर

     आघात करती हैं,

     दस्तक-सी देती है बारम्बार,

     कई बातें सुई-सी चुभोति मालूम

      होती हैं,

     ऐसा लगता है कि–

     मेरा होना व्यर्थ ही हुआ,

     आईने से भी होती है नफरत-सी,

     वह भी यही कहलवाना चाहता है।

       इसलिए,

       अपने अस्तित्व में लगता है,

       कुछ भारीपन,

       आंखें न जाने क्यूं इतनी,

       भारी-भारी-सी लगतीं हैं,

       जैसे एक पारावार वहाँ ठहर गया हो,

       खैर……

       ये सब अन्तःकरण की

       अनसुलझी बातें हैं,

       बस……..।।

डॉ पल्लवी सिंह ‘अनुमेहा’

लेखिका एवं कवयित्री

बैतूल ( मप्र )

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