डॉ. प्रीतम कुमार झा की कविताएं | Dr. Pritam Kumar Jha Poetry
नज़र
नज़र ढूंढती है मेरी उस नज़र को,
बनाया है जिसने सभी को दीवाना,
सभी काम गड़बड़ हुए कुछ हैं ऐसे,
कि दिल सबके गाते उन्हीं का तराना.
ये उल्फत, ये चाहत, शरारत, नज़ाकत,
सभी हैं भरे कूट कर उनमें ऐसे,
ये शोखी, ये आदत, शिकायत, मोहब्बत,
समझ में न आये कहूँ किसको कैसे.
के जख़्मी हुए हैं ह्रदय सबके ऐसे,
बने हैं सभी प्रीत में हीं निशाना,
हम भी तो मानव हैं आखिर ये यारों,
बनाया है उनके हीं दिल में ठिकाना.
मेरे रब ने शायद निकाला हो फुर्सत,
तभी तो अनोखा उन्हें है बनाया,
मुझे लग रहा है के दूजा उन्हीं सा,
शायद अभी तक न दुनियाँ में आया.
पुराने सभी अब नये लग रहे हैं,
नये सारे लगते मुझे है पुराना,
बची जिंदगी अब तो पहलू में गुजरे,
उनको तो केवल मेरा हीं बनाना.
जय राधे-कृष्णा

आ गया अब द्वार तेरे, तुझसे नाता जोड़ के,
फेंक डाला हर किसी ने,मुझसे बंधन तोड़ के।
हे मुरारी! हे कन्हैया! हे रचैया रास के,
बन पवन अब आ भी जाओ,जिंदगी में भोर के।
हर कदम पर साथ तेरा,जीत से है कम नहीं,
राह तेरी तब मिला जब,बंद थे सब ओर के।
सत्यता के आप पोषक, हर कला में हैं निपुण,
मुश्किलों से हो निकाले, बिन किए कोई शोर के।
जीतकर वापस मिलूंगा,जंग सच की है बड़ी,
मार्गदर्शन हो तेरा बस,रूठ ना मुंह मोड़ के।
“जय मां शारदे”
हे ज्ञान की देवी तेरा-2
वरदान जो मिल जाये
मन की बगिया के सारे-2
अरमान ये खिल जाये।
हे ज्ञान की देवी तेरा…!!
तूं हीं दया का भंडार हो मां
देती हो सबको सहारा ।
तेरी शरण मां जो भी है आता
मिलता है उसको किनारा।
नजर अब तो कर दो
सद्भाव भर दो
ये जीवन संवर जाये…!!
हे ज्ञान की देवी तेरा-2
वरदान जो मिल जाये।
मन …. हे ज्ञान….!!
वीणापाणि,विद्यादानी
नाम सभी हैं तुम्हारे।
लेकर तुझसे ज्ञान ओ मैया
जीवन को क्यूं ना सुधारे।
तेरे गुण मैं गाऊं
मैं सर को झुकाऊं।
ऐसे निखर जायें…!
हे ज्ञान की देवी तेरा
वरदान जो मिल जाये।
मन की बगिया के सारे-2
अरमान ये खिल जाये।
हे ज्ञान की देवी तेरा…!!
बर्बाद हैं तो क्या हुआ?
( व्यंग्य रचना )
ऐ वतन के लोग हम,आजाद हैं तो क्या हुआ,
जात -धर्म में बंट -बंट कर, बर्बाद हैं तो क्या हुआ?
रोजी -रोटी, इल्म और तालीम, जाए चूल्हे -भाड़ में,
जिन्न -परी से वोट बैंक, आबाद है तो क्या हुआ?
न देश की है, न अवाम की, रुत है कौमी शान की,
जात -धर्म पर मर मिटने का, उन्माद है तो क्या हुआ?
मंत्री, मुलाजिम, वजीरे आला, हर शै हो अपनी जात की,
अपने हीं अपनों को लूटकर, जिन्दाबाद है तो क्या हुआ?
सर ठोक रहा है ‘झा ‘अपना, इक उंगली में दम कितना,
अपने हीं वतन में अपना दिल, नाशाद है तो क्या हुआ?

कवि : प्रीतम कुमार झा,
महुआ, वैशाली, बिहार
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