डा० रविन्द्र गासो के साथ कुछ लम्हे

मैं गासो जी से जनवरी में हरियाणा सृजन उत्सव के दौरान पहली बार मिला था। वो सब के साथ मिलनसार और दूसरे को आपको दिल में बैठाने वाले व्यक्ति थे।

मैं यह कहकर शुरुआत करना चाहता हूँ कि आपकी हानि का के लिए मुझे बहुत खेद है। आप इस संसार मैं होते तो शायद आज भी मैं आप के साथ हंसी खुशी के पल बिताता।

मैं जानता हूँ कि आप सबके कितने प्रियजन थे कितने खास थे और आपके साथ रिश्ते कितने मायने रखते थे वो आप बखूबी समझते थे और सब का आदर सम्मान करने का तरीका भी आपका लाजवाब था।

मेरी दूसरी बार आपसे मुलाकात कुरुक्षेत्र के डा ओमप्रकाश ग्रेवाल अध्ययन संस्थान में जनवादी लेखक संघ की काव्य गोष्ठी में हुई । वो काव्य गोष्ठी मार्च/अप्रैल 2022की थी। जिसमें स्थानिय कवि/ कवयित्रियों ने बेखुबी हिस्सेदारी की थी।

इस गोष्ठी का मंच संचालन कपिल भारद्वाज द्वारा किया गया था। अध्यता के रूप में डा गासो, डा कुरुणेश व हरपाल जी ने भूमिका निभाई थी उस दिन से मैं एक साहित्यिक दोस्त व बाप-बेटे की तरह रिश्ते मानना शुरू कर दिया।

समय-2 पर मेरी उनकी मुलाकात होती रही। वरिष्ठ साहित्यकार गासो जी से मैं साहित्यिक लेखन की भूमिकाओ के बारे मे गुफ्तगू करता रहता था।

जिस तरह बेटा अपने पिता से अगला कदम रखने से पहले पूछता है कि उसी तरह मैं’ मेरी रचनाएं लिखने से पहले उनसे सलाह मशवरा करता था। जिन्होने मुझे आज यहाँ सबके बराबर खड़ा कर दिया।

मुझे डा गासो जी ने सरर फतेहपुरी साहब की कुछ उर्दू में लिखी किताब दी जिनका लिप्यान्तर करके मैने उन्हे वापिस लौटाई उन्होंने एक आलेख उनकी नज़्मों पर लिखा।जिन्होंने हरिगंधा पत्रिका हरियाणा साहित्य अकादमी ने प्रकाशित भी किया था। मैं धन्य है कि उन्होने मेरे द्वारा अनुवाद की हुई नज्मों को जोड़कर सरर फतेहपुरी साहब पर एक आलेख लिखा।

‌डा गासो जी इस सांसारिक दुनिया से रुखसत हो गए है लेकिन उनकी साहित्यिक रचनाओं के संसार में उनका जो नाम है उनके जो विचार है उनको कभी भी नहीं मिटाया जा सकता। वो अपने आप में एक दुनिया थे। वो सबको साथ लेकर चलने वाले व्यक्ति थे।

कभी भी मैने उस व्यक्ति के साथ किसी का मनमटाव होते हुए नहीं दिखाई दिया हमेशा उनके चेहरे पर मुस्कुराहट होती थी। सबको गले लगाते थे। सबसे प्यार करते थे।

उनके अन्दर प्रेम की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी। कुछ दिन बाद हरपाल जी की एक किताब का विमोचन व समीक्षा गोष्ठी हुई जिसकी समीक्षा डा गासो के अध्यक्षता में डा कृष्ण कुमार ने की थी और उसी दिन सभी की समीक्षाओं को एक समीक्षक के रूप में सब को समेटते हुए डा गासो जी ने उनकी किताब के कुछ अंशों को सांझा करते हुए हरपाल की किताब की समीक्षा की।

मैं अपने साहित्यिक मित्र को खोने का बड़ा ग़म महसूस कर रहा हूँ। मेरे कुछ मित्रों ने और मैंने दिवाली से ठीक दो दिन पहले चले जाना एक मर्म है। उनकी याद में दीपावली के मौके घर सब ने अपने घर मे चिराग़ जलाये ताकि उनके द्वारा फैलाया गया प्रकाश चाहे वह साहित्यिक, बौद्धिक, गुरुनानक, संतों ,या प्रगतिशील विचारों का हो। वह प्रकाश फीका ना पड़े इसलिए हमे उनके द्वारा फैलाये गए प्रकाश को ज्यों का त्यों रखने का प्रयास किया है।

मेरे साथ जो उन‌की बीती हुई यादें है उनको व्यवस्थित करुगा ताकि उनकी यादें आसानी से परिवर्तित हो सके। एक दूसरे के साथ स्थानांतरित की जा सके ताकि एक-दूसरे की याद मिल सके और सबको पता लगे। सबके साथ एक ही तरह से रहते थे ।उनकी यादों को सकारात्मक रूप में ले आगे बढ़ते रहे और उनके किए हुए कार्यों की प्रेरणा लें। अपने जीवन में उतारने की कोशिश करें।

डा गासो जी अब पिछले कुछ सालो से डा ग्रेवाल अध्ययन संस्थान में निःशुल्क पुस्तकालय चला रहे थे और आम आदमी भी उनका सहयोग कर रहा था। पुस्तकालय पूरे दिन भी खुली रहती थी।

निर्धन असहाय व पढ़ने के इच्छुक कोई भी विद्यार्थी या पाठक, वहाँ से पुस्तक लेकर पढ़ लेता था। इस काम को करना बहुत कठिन है। शायद डा गासो जी की जगह कोई मुश्किल से ले पायेगा। बिना किसी की परवाह किये बच्चो को पुस्तकालय में पढ़ने का मौका दिया आज के वक्त में यह बहुत बड़ा काम है।

डा गासो आप हमेशा ही मेरे जीवन में कुछ नया करते रहेगें आप की याद से मैं अपना हर कदम एक नई कामयाबी की तरफ बढ़ाऊंगा । आपने मेरे हृदय में बसी संवेदनाए दोबारा उज्ज्वलित कर दी। मै बड़ा हतोत्साहत हूँ किज्ञमैं कुछ नहीं कह सकता हूं आपकी याद हमेशा बनी रहेगी।

आप नये जीवन जीने की कला सिखाते थे। आप अगला कदम रखने से पहले बताते थे कि क्या करना है ? आप ने कालेज टीचर्स एशोशियन में बहुत बड़ा योगदान दिया, हरियाणा ज्ञान विज्ञान समिति, प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ में भी आपका बहुत योगदान रहा है। आपके अन्दर ये सब रचा बसा हुआ था।

मैने एक दोस्त नहीं बल्कि मित्र, भाई और पिता तुल्य व्यक्ति को मेरी जिन्दगी से खोया है। तुम्हारी कमी मुझे हमेशा हमेशा बनी रहेगी। आप मेरे साथ यादों में, सपनों में, ख्यालात में हमेशा रहेंगे। आप एक नेक इंसान थे। आप दुनिया से चले गए मुझे आज भी यकीन नहीं हो रहा आप हमेशा जिन्दा रहेंगे, लोगो के सपनों में, पुस्तकों में।

आपके बिना मेरा साहित्यिक जीवन कैसे चलेगा कल्पना भी नहीं कर पा रहा हूं। आप कई संगठनो की नींव थी। जो आज मुझे ढहती हुई नजर आ रही है। आप ने अनेक पौधे लगाये हैं। लेकिन उनका फल चखने ने से पहले आप चले गए। भूले से भी नहीं भूला जाता।

रोज़ उजाला होता ना जी पाता

आप जैसी रोशनी कौन देगा ज़मीन को

कितने कामयाब बनाए इस जहां में

आप रवि है प्रकाश आपका रवि से ज्यादा

दु:ख-दर्दी को गले लगाया किया सब आधा

आप वो रवि हो जो हम खोना नहीं चाहते

कुदरत के हाथ डोर है छूट गई तो छूट गई।

 

Manjit Singh

मनजीत सिंह
सहायक प्राध्यापक उर्दू
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय ( कुरुक्षेत्र )

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