डॉ. सुनीता सिंह ‘सुधा’ की रचनाएँ | Dr. Sunita Singh Sudha Poetry
गणेश पूजन है!
श्री गणेशाय नमः
छंद-मनहरण घनाक्षरी
शिव शक्ति के हैं प्यारे, जगत भर में न्यारे,
गजानन गणेश को,
हमारा नमन है !
गणपति सुखकर्ता, भव बाधा सब हर्ता,
एकदंत चरणों में,
सदैव वंदन है !
रिद्धि सिद्धि के है पति, देते सबको सन्मति,
बुद्धि यश प्रदाता वो,
पार्वती नंदन है !
प्रतिदिन सेवा करूँ , वियानक का ध्यान धरुँ,
कामिनी करती नित,
गणेश पूजन है!
डा. सुनीता सिंह ‘सुधा
गणपति स्वागत है
द्वार- द्वार वंदनवार सजे ,
सिद्ध शुभागत है।
धन्य भाग्य जो घर पर आये ,
गणपति स्वागत है ।।
भाद्र चतुर्थी आप पधारे ,
मन प्रमुदित अपना ।
लड्डू तुमको भोग लगाऊँ ,
तृप्त हुए नयना ।।
पंचामृत से करूँ आचमन ,
रूप नवागत है ।
धन्य भाग जो घर पर आये ,
गणपति स्वागत है ।।
लाल मखमली चौक विराजो ,
शिवनंदन वदना ।
वक्रतुंड शुभ मंगल दाता ,
अभिनन्दन रचना ।।
श्रध्दा सुमन देव स्वीकारो ,
शुचिता आगत है ।
धन्य भाग जो घर पर आये ,
गणपति स्वागत है ।।
सहस नाम का गाऊँ मंगल
शुभ कारज करिए ।
धूप दीप अरु भोग चढ़ाऊँ ,
विघ्न सकल हरिए ।।
तेरी कृपा दृष्टि से पाऊँ ,
यहाँ तथागत है ।
धन्य भाग जो घर पर आये ,
गणपति स्वागत है ।।
डा. सुनीता सिंह ‘सुधा
माँ की ममता में मिले
माँ की ममता में मिले, धरती पर भगवान ।
सत्य सनातन माँ करे, बच्चों का उत्थान ।।
ईश्वर का प्रतिरूप माँ ,माँ ही सच्ची मीत ।
माँ की वाणी में घुला, ममता का नवनीत ।।
बच्चों की मुस्कान पर,माँ जाए कुर्बान।
दुख देना माँ को नहीं,किंचित् भी नादान।।
माँ से यह जीवन मिला ,मिला जगत में मान ।
धन दौलत सब कुछ मिली, भले बुरे का ज्ञान।।
माँ बच्चे को पालती,सह कर कष्ट अपार।
हँसी खुशी अपनी सभी,दे बच्चों पर वार।।
जीवन में बहुमूल्य माँ,ईश्वर का वरदान।
गाता है सारा जगत,माता का गुणगान।।6
चरण शरण माँ की गहो ,मंदिर मस्जिद भूल।
मिट जाएँगे राह के, सारे शूल समूल ।।7
देती जीवन दान माँ, देती जग का ज्ञान।।
माँ के शुभ आशीष से,हों मुश्किल आसान।
माँ है जग की श्रेष्ठ कृति ,माँ में लय संसार ।
भरे विश्व को अंक में ,देती मधुरिम प्यार ।।9
जग में अनुपम ज्ञान का, माँ ही है आधार।
धैर्य मना धारण करे,कर्तव्यों का भार ।।10
माँ के आँचल में भरा ,प्रीति सुधा -रस -धार ।
बच्चे का संसार में,देती भाग्य निखार।।11
डा. सुनीता सिंह ‘सुधा
अब कहूं कैसे जी रहा हूं मैं
अब कहूं कैसे जी रहा हूं मैं
जह्र पे जह्र पी रहा हूं मैं
हैं फटे रिश्ते जो उन्हीं को अब
पक्के धागे से सी रहा हूं मैं
वे मरेंगे रही नहीं अब जां
सुन कभी से यही रहा हूं मैं
वे जुदाई पे रो दिए जिनके
जिंदगी में कभी रहा हूं मैं
सैकड़ों ग़म हैं साथ में मेरे
फिर भी कर आशिक़ी रहा हूं मैं
भूल हमको गए हमारे जो
वक्त पे साथी रहा हूं मैं
बोल तीखे लगे उन्हें मेरे
हां खरा आदमी रहा हूं मैं
डा. सुनीता सिंह ‘सुधा
इतने दीवाने हैं
उनकी उल्फ़त में इतने दीवाने हैं
दुनिया ने लिख डाले यूँ अफ़साने हैं
पीते हैं हम जामे – मुहब्बत भर भरकर
शेर ग़ज़ल के इस खातिर मस्ताने हैं
लम्बी हैं राहें मंजिल भी दूर यहां
उस पर मिलते नफ़रत के नज़राने हैं
वे मानें ना मानें उनकी वो जानें।
हम तो उनकी चाहत में दीवानें हैं।।
मदहोशी का सामां हैं उनकी आँखें।
ख़ामोशी से छलकाती पैमाने हैं।।
उनके दुश्मन लगते हैं उनको अपने।
हम अपना दिल खोकर भी बेगाने हैं।।
धौंस किसे देती है दुनिया पैसे की।
इसमें डूबे कितने राजघराने हैं
डा. सुनीता सिंह ‘सुधा
लड़े तो डूब जायेंगी
न लो भारत से कोई पंगा सोचो सिर्फ असुवन की
लड़े तो डूब जायेंगी सभी आशाएँ जीवन की
न कर यूँ बात ऊँची तू न पींगे हाक भाषन की
निगहबानी उसे करनी है खुद अपने गुलशन की
तिरंगा जान से प्यारा उसे रखना हिफाजत से
उठा हाथों लिया तलवार क्या परवाह चितवन की
घरों में घूस कर प्राणों को ले लेगा भारतवासी
बचा कर रख सभी अरमां सभी साँसें तू जीवन की
अगर घुसने की सरहद पार से कोशिश करे कोई
कलाई तोड़ कर रख देगा ये उस वक़्त दुश्मन की
क़सम खा कर ये कहता है यहाँ का बच्चा -बच्चा अब
हमें अब लाज रखनी है सुधा भारत के दामन की
डा. सुनीता सिंह ‘सुधा
घाटी में जो जल रही ( कुण्डलिया )
घाटी में जो जल रही, भरो हृदय में आग ।
घुस आए कश्मीर में,कुछ जहरीले नाग ।।
कुछ जहरीले नाग, क्रोध की आंधी फैली ।
करते अत्याचार, दृष्टि है जिनकी मैली ।।
हुआ धर्म का खून,रक्त रंजित है माटी।
करो शत्रु को खाक, सुरक्षित हो अब घाटी।।
डा. सुनीता सिंह ‘सुधा
है बड़ी ही बेवफ़ा तू जिंदगी
है बड़ी ही बेवफ़ा तू जिंदगी
पल में कर जाती ख़ता तू जिंदगी
क्या पता किस मोङ पर ला कर रखे
है बला से भी बला तू ज़िदगी
खोजते हैं सब यहाँ दर ब दर तुझे
कब मिली किसको बता तू जिंदगी
छोङती हर वक्त के पद चिह्न को
लगती मुझको काफ़िला तू जिंदगी
दर्द आँसू इश्क़ शबनम को ढो रही
है ग़ज़ल में काफ़िया तू जिंदगी
सच दिखा देती उठा के पर्दे को
सच में है इक आइना तू जिंदगी
क्यों मुहब्बत में भटकता है बशर
दे रही कैसा सिला तू जिंदगी
मौन सी चुप हर घङी हो सामने
अपनी भी तो कुछ सुना तू जिंदगी
हो रहा है बेहया क्यों आदमी
पाठ इसको भी पढ़ा तू जिंदगी
डा. सुनीता सिंह ‘सुधा
हौसला आप मेरा यूँ हीं बढ़ाते रहिए
आप हर रोज मेरी बज़्म में आते रहिए
हौसला आप मेरा यूँ हीं बढ़ाते रहिए
हुस्ने मतला
दर्द को सहना मुझे आप सिखाते रहिए
गुदगुदा कर यूँ सनम रोज़ हँसाते रहिए
मुझको इस बात से हर चंद ख़ुशी ही होगी
हो के बेताब गली अपनी बुलाते रहिए
आप मेरे हैं पता मुझको भी चल जायेगा
मेरी कमियों को ज़रा मुझको गिनाते रहिए
मुझको हालात से जैसे ही मिलेगी फ़ुर्सत
लौट के आऊँगी यह ख्वाब सजाते रहिए
इस तरह से मेरे ज़ख़्मों को सुकूँ मिलता है
है सजी बज़्म कोई नज़्म सुनाते रहिए
होगा लम्हों में नशा आप को भी उल्फ़त का
आप नज़रों से ऩजर मेरी मिलाते रहिए
डा. सुनीता सिंह ‘सुधा
सारा आलम उदास है अब
सारा आलम उदास है अब
ओढा दर्द-ए लिबास है अब
वक्त के साथ चाँद-सा रुख
बदलेगा बस कयास है अब
है फ़ज़ा में घुला हुआ विष
जिंदगी इक तलाश है अब
भागता जा रहा कहीं वो
पैर भी बदहवास है अब
सोचते ज्यादा जीने को पर
मौत तो आस-पास है अब
छूटता जा रहा बदन क्यों
जबकि ख्वाहिश-ए- दास है अब
शहर में हैं रईस कितने
मुफ़लिसों की तलाश है अब
प्यास पर प्यास को धरे युँ
आदमी बदहवास है अब
डा. सुनीता सिंह ‘सुधा
फूँक देगी सभी ये घर नफ़रत
फूँक देगी सभी ये घर नफ़रत
दूर दिल से न की अगर नफ़रत
मजहबी ज़ह्र है फ़ज़ाओं में
ढो रहा आज हर बसर नफ़रत
भाषणों से परोस दी तुमने
दूर से आ रही नज़र नफ़रत
एक-दूजे से डर रहे हैं सब
छल रही है डगर-डगर नफ़रत
दीप उल्फ़त के अब जला भी लें
डालती है बुरा असर नफ़रत
भाग कर जाएँ भी कहाँ अब हम
फैल रही है इधर- उधर नफ़रत
देखकर इसको नाक-मुँह बनते
सच में होती बुरी ख़बर नफ़रत
डा. सुनीता सिंह ‘सुधा
मन तो मितवा रे! यायावर,
मन तो मितवा रे! यायावर,
सरिस एक बंजारा है ।
भाग रहा है दूर-देश नित
लगता कितना प्यारा है ।।
हो जाता वाचाल कभी तो,
कभी मौन में घिर जाता ।
तोड़ कभी संबंधों को खुद,
रख लेता गहरा नाता ।।
औरौ को कर शीतल छाया,
ढोता उर अंगारा है ।
मन तो मितवा रे! यायावर,
सरिस एक बंजारा है ।।
हँसता जाता नित्य अकेला,
दर्द छुपा कर आँखों में ।
गिर के अंबर से फिर सँभले
रखे हौसला पाँखों में ।।
शब्द वाण अभ्यंतर भेदे,
कभी नहीं यह हारा है ।
मन तो मितवा रे! यायावर,
सरिस एक बंजारा है ।।
प्रेम-सुधा की प्यास लिए है
भाग रहा देखो संकुल ।
धूप-छाँव, सुख-दुख में पलता
एक निराला यह अंशुल ।।
क्षण भर ठहरे आगे बढ़ता,
राहों पर आवारा है ।
मन तो मितवा रे! यायावर,
सरिस एक बंजारा है ।।
डा. सुनीता सिंह ‘सुधा
अंतर्जाल यात्रा
मिली छूट अभिव्यक्ति की ,फैला अंतर्जाल ।
गाँव नगर अब नाच के ,खूब बटोरो माल ।।1
वृद्ध युवा बच्चे सभी ,नाचें सब परिवार ।
नई बहुरिया नाचती ,खोले आँगन द्वार ।।2
साधे कोई सुर मधुर ,गाएँ नव रस गीत ।
राग बेसुरा छेड़ के , कोई ले जग जीत ।।3
करता कविता पाठ कवि ,बहती रस की धार ।
दिखे आन लाइन सभी ,जगत बाँटते प्यार ।।4
कवियों की इस बाढ़ में ,आए उतर हजार ।
पार हुए कितने बहुत ,डूब गए मझधार ।।5
कपड़ा कोई बेचता ,कोई गृह सामान ।
गूगल पेटीएम से ,होता है भुगतान ।।6
दिखा रहे इस्टंट सब ,देख सभी हैं दंग ।
टेक्नोलॉजी से मिला ,नव रस नव ही रंग ।।7
लुभा रहा हर वर्ग को ,अर्थ समय का खर्च ।
भाव भूमि की कल्पना ,करते मिलकर सर्च ।।8
ग्लोबल दुनिया गाँव में ,मिले ज्ञान भंडार ।
चित्र वीडियो से सजा ,नेट जाल व्यापार ।।9
संदेशों का ढेर है ,मिटा जाति का भेद ।
देते नित शुभकामना ,दुख पर करते खेद ।।10
तनहाई अब खत्म है ,गायब द्वाराचार ।
गुपचुप ही संसार में ,बढ़ता यह व्यापार ।।11
वेबसाइटें फेसबुक ,ट्यूटर इंस्टाग्राम ।
नेटवर्क यूट्यूब का ,बड़ा हुआ अब नाम ।।12
डेस्कटॉप दुनिया दिखे ,लैपटॉप भी साथ ।
टेबलेट में ब्राउजर , एंड्रॉयड है हाथ ।।13
डा. सुनीता सिंह ‘सुधा
कोई ख़ुद आप से भागा पङा है
कोई ख़ुद आप से भागा पङा है
कोई हालात का मारा पङा है
वफा कर तो वफा तुझको मिलेगी
तू इतनी बात क्यों भूला पङा है
सितम की दास्तां उसकी कहूँ क्या
बदन अब तक मिरा नीला पङा है
मुहब्बत थी उसी से हाँ कसम से
मगर वो राज़ यह दावा पङा है
सफ़र में सब गए आगे निकल तू
ख़यालों में ही बस उल्झा पङा है
गुज़रना चाहती थी जिस से बचकर
उसी से वास्ता मेरा पङा है
सुना है ग़म उसे उसका सताता
नहीं उठ पा रहा टूटा पङा है
सतायी याद जब उसकी मुझे तब
भरी बरसात में आना पङा है
नहीं सोया कभी वह नींद भर भी
उसी की याद में जागा पङा है
सुधा लगता नहीं उसके बिना मन
अकेला छोङ घर भागा पङा है
डा. सुनीता सिंह ‘सुधा
नयी बहुरिया घर आयी
नई बहू से कर रहा,चित्त उल्लसित प्रीति ।
ब्याह लिया बेटा-वधू ,संस्कृति की शुभ रीति ।।1
प्रीति भोज अनुपम हुआ ,छक के खाए भोज ।
धवल चंद्रिका-सी वधू , उसके नयन सरोज ।।2
सुख की झिलमिल चाँदनी ,तनी दिखी थी रात ।
मधुर मनोहर थी सुबह ,खत्म न होती बात ।।3
विदा हुए सारे अतिथि ,सूना आँगन आज ।
खोज रही थी माँ वधू ,जिस पर उसको नाज ।।4
माँ चौखट को देखती ,वधू बुलाती पास ।
बैठी घर में खिन्न माँ ,टूट गई जब आस ।।5
नये जमाने की वधू , इतनी हुई समर्थ ।
मान किसी का वह न कर , समझे सब कुछ व्यर्थ।।6
बैकवर्ड सबको कहे ,सबसे ही कतराय ।
उल्टे-सीधी ड्रेस में ,बाहर-भीतर जाय ।।7
तरस गई माँ ठूँठ-सी, सुनने को दो बोल ।
वधू कभी समझी नहीं ,नव कुटुंब का मोल ।।8
धीरे-धीरे झर गये ,खुशियों के सब पात ।
मुस्कानें तो खो गईं ,घिरी अँधेरी रात ।।9
डा. सुनीता सिंह ‘सुधा
दशरथ नंदन राम
जन-जनके नायक हुए ,दशरथ नंदन राम ।
समदर्शी व्यवहार से ,किए कोटि सत काम ।।1
धन्य-धन्य श्रीराम प्रभु ,धन्य अयोध्या- धाम ।
धन्य धरा बहती जहाँ ,सरयू सरि अविराम ।।2
कोटि सूर्य-सा आभ मुख ,कमल नयन तन श्याम ।
लिए मधुर मुस्कान अधर, दशरथ नंदन राम ।।3
सागर सा संयम लिए ,करुणा नीति निधान ।
त्याग समर्पण मूर्ति के ,धर्म पराक्रम खान ।।4
कण-कण बसते राम हैं ,धर्म सनातन राम ।
सर्वश्रेष्ठ मानव धरा ,मानव रक्षा काम ।।5
चाह मिलन की मन लिए ,युद्ध किए श्री राम ।
रण अधर्म पर धर्म का ,विजय हुआ श्री नाम ।।6
दुखियों के प्रभु दुख हरे ,चखते शबरी बेर ।
सत्य मार्ग पर नित चले , किए निशाचर ढेर ।।7
सत्य वृत्तियाँ राम हैं ,राम एक ही नाम ।
राम शील गुण धर्म से ,बना अयोध्या- धाम ।।8
राम-राम सत्कार है ,राम-राम दुख बोध ।
राम-राम जीवंत पल , राम-राम भव शोध ।।9
चाह रखो यदि जीत की ,लड़ो नित्य ही युद्ध ।
रौंद अहित जीवन सदा ,विजय वरण कर शुद्ध ।।10
विजया दशमी पर्व है ,अमर विजय का कथ्य ।
संयम बल पुरुषार्थ से , राम प्रशस्त सुपथ्य ।।11
डा. सुनीता सिंह ‘सुधा
तुम साँसों में बसते हो
दूर बहुत होकर भी तुम
मुझे पास में लगते हो ।
कैसे तुमको हम भूले
तुम साँसों में बसते हो ।
हर घड़ी ख्याल तेरा ही
मुझको तो बस रहता है ।
तू ही तो सच्चा अपना
दिल मेरा यह कहता है ।
सुबह शाम इस तन-मन में
दीपक- सा तुम जलते हो ।
दूर बहुत होकर भी तुम
मुझे पास में लगते हो ।
कह लेती सारी बातें
चुपचाप भला सुनते हो ।
लेकर हृदय बीच तुम ही
इन बातों को गुनते हो ।
मैं खुश रहूँ सोच कर यह
हर पीड़ा को सहते हो ।
दूर बहुत होकर भी तुम
मुझे पास में लगते हो ।
खिलखिला रहा अंबर है
हवा सरसराहट करती ।
अब तो बस तेरी मुझको
पल-पल आहट लगती ।
जाने कब से छुप करके
अंतरमन में हँसते हो ।
दूर बहुत होकर भी तुम
मुझे पास में लगते हो ।।
डा. सुनीता सिंह ‘सुधा
खा अभी क़सम
खा अभी क़सम
दूर हो भरम
छोड़ दूँ सभी
दैर-ए-हरम
प्यार में मिला
दर्द-ए-अलम
खो गई कहीं
लफ्ज़-ए-क़लम
और मत करो
दर्द-ए-सितम
यूँ बहक रहे
रोक लो क़दम
आज भी हूँ मैं
अब्र-ए-क़रम
दैर-ए-हरम=मधुशाला
दर्द-ए-अलम= पीर,विरह
लफ्ज़ -ए-कलम=शब्दों की जादूगरी
अब्र-ए-करम=बादल जैसा मेहरबान
डा. सुनीता सिंह ‘सुधा
विचारवान बेटियाँ
विचारवान बेटियाँ निराश हो पुकारतीं ।
विरुद्ध भाव देख आज कष्ट से निहारतीं ।।
दरिंदगी विकार की भला शिकार क्यों हुईं ।
बढ़ी हुई यहाँ प्रमाद की कतार क्यों हुईं ।।
सवाल देश में घना बनी विषाक्त जिन्दगी ।
हुई दुखी धरा अशांति की मलीन गंदगी ।।
पराजिता बनी सनेह हीन श्वास हारतीं ।
विचारवान बेटियाँ निराश हो पुकारतीं ।
प्रवीन रूप में यहाँ मराल मान लूटता ।
बिछा रखा समग्र जाल आज क्यों न छूटता।।
अजीत ये बनी रहें सदा समाज पूजिता ।
रखे विनम्रता सवाल मौन क्यों बता पिता।।
निरीह ये विमुक्त पंथ आज क्यों गुहारतीं ।
विचारवान बेटियाँ निराश हो पुकारतीं ।।
सभी प्रकार के प्रवाह की मलीन धार है।
कठोर दंड का यहाँ खरा-खरा विचार है ।।
विशाल देश बेटियाँ रहे विशुद्ध भावना ।
नवीन भाव भामिनी बनी अनूप कामना ।।
विपत्ति में पड़ी यहाँ सभीत अश्रु धारतीं ।
विचारवान बेटियाँ निराश हो पुकारतीं ।।
डा. सुनीता सिंह ‘सुधा
हो सके तो सहर शाम आते र
हो सके तो सहर शाम आते रहो
हाल सबका सभी को बताते रहो
घुट रही साँस मौसम विषैला बहुत
आँख में नूर भरकर हँसाते रहो
यूँ न दो छोड़ अब तुम किसी मोड़ पर
दिल से दिल की लगन को निभाते रहो
इल्तिज़ा कर रही है वफ़ा प्यार की
बस नज़र से नज़र तुम मिलाते रहो
चाहतों का सजाकर कभी थाल तुम
प्रेम से बस हमें घर बुलाते रहो
डूब जाऊँ मैं इश़्के हकीकी में अब
सूफियाने तराने सुना ते रहो
आजमाते रहो हर बुलंदी सुधा
दर्द ए जंग को बस हराते रहो
डा. सुनीता सिंह ‘सुधा
फिर भी मुस्कुराना है
वफ़ा मिले न मिले फिर भी मुस्कुराना है
यहाँ सभी से मुझे प्यार अब निभाना है
प्रतीक शांति के हैं जो सफेद हारिल उन
कबूतरों को फलक पर हमें उड़ाना है
मिले उन्हें भी तो पढ़ने को घर के आँगन में
जो ज्ञान हीन हैं आगे उन्हें बढ़ाना है
मचा रहे है यहाँ लोग अब भी शोर-ओ-गुल
ये जिन्दगी का अजब सा हुआ फ़साना है
न बोझ दिल पे रहे आँख में नमी न रहे
मिले हैं ज़ख्म जो उनको यहीं भुलाना है
तलाशते हैं दिनों रात अब जमीं अपनी
रहें मिसालों में कुछ ऐसा कर दिखाना है
ये बात कहती हूँ अपने सभी बुज़ुर्गों से
चलें सँभाल के बदला हुआ ज़माना है
जो देखे इसको वही वाह वाह कह उठ्ठे
हमें बसाना सुधा ऐसा आशियाना है
डा. सुनीता सिंह ‘सुधा
और समीर सुगंधित है
वृंत-वृंत पर फूल खिले हैं
और समीर सुगंधित है ।
नयनों में मादकता भरके
कलिका भी उत्कंठित है ।।
चंचल चित्त डोलते मधुकर
तुहिन बिंदु तन चूम रहे
रस रंगों से भरी धरित्री
तृप्त पपीहा घूम रहे।।
प्रीति-पवन घट-घट संचारित
पात-पात अभिमंत्रित है ।
वृंत-वृंत पर फूल………..।।
देख सौरभी की चितवन अब
प्रेमिल हिय अलि व्याकुलता ।
अपने मन की अँगनाई में
ओढ़े परिमल मंजुलता ।।
रति अनंग के प्रतिवेदन से
शोभित तन-मन सिंचित है ।
वृंत-वृंत पर फूल………….।।
ऋतु बसंत में अंबर भी अब
गाते हैं नवगीत मधुर
हृदय वाटिका मुस्काती है
अधरों पर मनमीत मधुर।।
मन के हर पल्लव में ही अब
प्रीति रीति अवगुंठित है ।
वृंत-वृंत पर फूल………….।।
डा. सुनीता सिंह ‘सुधा
जीवन इक मधुशाला है
उर मदिरा का प्याला है
जीवन इक मधुशाला है
जिस दिल में नित प्रेम बसे
वह दिल एक शिवाला है
पाया जिसने प्रेम सुधा
जग में वह मतवाला है
जिसने इसको जान लिया
वह तो यार निराला है
जश़्न-ए- मौसम की खातिर
इश़्क ने डेरा डाला है
चाहत की हर चौखट पर
संघर्षों की माला है
तनहाई अंतर् छलती
पाँव भरे नित छाला है
हाला-हाला करते जो
प्यार ने उनको पाला है
डा. सुनीता सिंह ‘सुधा
कोई ख़ुद आप से भागा पङा है
कोई ख़ुद आप से भागा पङा है
कोई हालात का मारा पङा है
वफा कर तो वफा तुझको मिलेगी
तू इतनी बात क्यों भूला पङा है
सितम की दास्तां उसकी कहूँ क्या
बदन अब तक मिरा नीला पङा है
मुहब्बत थी उसी से हाँ कसम से
मगर वो राज़ यह दावा पङा है
सफ़र में सब गए आगे निकल तू
ख़यालों में ही बस उल्झा पङा है
गुज़रना चाहती थी जिस से बचकर
उसी से वास्ता मेरा पङा है
सुना है ग़म उसे उसका सताता
नहीं उठ पा रहा टूटा पङा है
सतायी याद जब उसकी मुझे तब
भरी बरसात में आना पङा है
नहीं सोया कभी वह नींद भर भी
उसी की याद में जागा पङा है
सुधा लगता नहीं उसके बिना मन
अकेला छोङ घर भागा पङा है
डा. सुनीता सिंह ‘सुधा
तुम बिन साजन
( प्रदीप छंद , विरह गीत )
तुम बिन साजन दिवस नुकीले
सुई चुभन-सी रात है ।
यादों की करवट में निशिदिन
आँखों की बरसात है ।।
सपनों के पनघट से पावन
भर लाई सुधि-घट सुखद ।
पलकों को नहला कर नैनों
करती हैं बतियाँ विशद ।।
सुलग रहा अंतर्मन पंछी
चुप होंठों पर बात है ।
तुम बिन साजन दिवस नुकीले
सुई चुभन-सी रात है ।।
कंठों तक अब सागर उफने
रोती है रुक-रुक लहर ।
मन की एक विरहणी कहती
हाथों से पी लो जहर ।।
बहुत दिनों सोई पीड़ा
और नहीं कुछ ज्ञात है ।
तुम बिन साजन दिवस नुकीले
सुई चुभन-सी रात है
धड़कन तक तेरा आ जाना
दबे पाँव फिर लौटना ।
जैसे अंबर तारा टूटे
छलती जीवन वंचना ।।
प्रिय सुन लो अब इस जीवन में
लगी साँस पर घात है ।
तुम बिन साजन दिवस नुकीले
सुई चुभन-सी रात है ।।
डा. सुनीता सिंह ‘सुधा
—0—
भावानुवाद: विधा दोहा
भगवान शिव और पार्वती के मध्य हुए रोचक वार्तालाप का भावानुवाद प्रस्तुत है ! कवि का वक्रोक्ति-चमत्कार द्रष्टव्य है। मूल श्लोक इस प्रकार है —
कस्त्वं शूली मृगय भिषजं नीलकण्ठ: प्रियेSहम्
केकामेकां कुरु पशुपति: नैव दृष्टे विषाणे।
स्थाणुर्मुग्धे ! न वदति तरु: जीवितेश: शिवाया:
गच्छाटव्यामिति हतवचा पातु वश्चन्द्रचूड़ ।।
शिव -गौरा संवाद
द्वार बंद शिव देख कर ,द्वार खोल प्रिय काम ।
आया उत्तर शीध्र ही ,आप कौन क्या नाम ।।1
शूली सब कहते मुझे ,शूल ग्रस्त हो देव ।
जाओ खोजो वैद्य गृह ,यथा शीध्र स्वयमेव ।।2
नीलकंठ हूँ मैं प्रिये ,कहा रुद्र दे जोर ।
नीलकंठ तात्पर्य शिखि ,फिर कर केका शोर ।।3
मैं पशुपति हूँ प्रियतमे ,लगे बहुत प्रिय बैल ।
किन्तु दृष्टिगोचर नहीं ,सींग शीर्ष शिव शैल ।।4
मुग्ध स्थाणु हूँ ओह तो ,सोचो अपने आप ।
स्थाणु ? ठूँठ कब बोलते ,जीवन में चुपचाप ।।5
देवि ,शिवापति हूँ सुनों भटकाओ मत और ।
हो शृगाल जाओ न वन ,बोली गिरिजा गौर ।।6
बात-बात में शिव गये ,गौरी जी से हार ।
चंद्रचूड़ शिव कष्ट सब ,दूर करें संसार ।।7
डा. सुनीता सिंह ‘सुधा
हिरनी-सी उसकी आँखों में काजल होगा
हिरनी-सी उसकी आँखों में काजल होगा
अंतर्मन भरा हुआ शुचि गंगाजल होगा
हूँ अपनों से दूर यहाँ परदेशी बनकर
घर के दरवाजे पर साँकल का छल होगा।
सर्द मौसमी चादर से लिपटे तन-मन में
त्यौहारों का रंग-बिरंगा मंगल होगा
माँ नित ही यादों में सिमटी रोती होगी
कैसे कह दूँ हृदय पिता न अविकल होगा
घर की चौखट पर ही छूट गया मन व्याकुल
संदेशा देता पावस का बादल होगा
डा. सुनीता सिंह ‘सुधा
औरों से जो चलता हट कर
औरों से जो चलता हट कर ,
नाम अमरता लिखता पथ पर ।
दृढ़ संकल्प शक्ति से ऊर्जित ,
नित मशाल-सा जलता पथ पर ।।
झंझाएँ विपरीत धार की
हिम्मत की पतवार मोड़ती ।
मंत्र एकता फूँक-फूँक कर ,
व्यवहारों में नित्य उतरती ।।
अंगारों पर पाँव जला कर ,
फूलों-सा नित हँसता पथ पर ।
औरों से जो चलता हट कर ,
नाम अमरता लिखता पथ पर ।।
दंश विरोधी प्रति पल सहकर ,
मौन समर्पण जग को देता ।
सत्य अहिंसा का रोपण कर ,
वह सद्भाव वरण कर लेता ।।
चक्रवात तूफान उठा कर ,
अंतर पीड़ा सहता पथ पर ।
औरों से जो चलता हटकर ,
नाम अमरता लिखता पथ पर ।।
भरकर प्रीति हृदय औरों के ,
नीलकंठ-सा वो विष पीता ।
मनुज-मनुज का मेल करा कर ,
भोर- किरण-सा सुस्मित खिलता ।।
जाग स्वयं स्वर्णिम विहान में ,
विजय ध्वजा फहराता पथ पर ।
औरों से जो चलता हट कर ,
नाम अमरता लिखता पथ पर ।।
डा. सुनीता सिंह ‘सुधा
ऋतु बसंत शुभ आयो रे
मोहक पीत वसन तन ओढ़े ,
ऋतु बसंत शुभ आयो रे ।
वसुधा पर बिखरे सप्त रंग ,
तन-मन सब हर्षायो रे ।
लाल सुर्ख पत्ती इढलाई ,
पुलकित तन है डाल-डाल ।
कलियाँ सौरभ श्रृगांर करें ,
भौरों का है मस्त भाल ।
गा रही प्रकृति कुछ गुनगुन-सा ,
मादक पौ तो भरमायो रे ।
मोहक पीत वसन तन ओढ़े ,
ऋतु बसंत शुभ आयो रे ।
चंचल चकोर बने हैँ नेत्र ,
मुख अलक पर रहे डोले ।
वेणी फूलों की नित गूंथे ,
हृदय -भाव रह-रह खोले ।
सूक्ष्म रूप जी में पैठे ,
जन चेतन बहुत भायो रे ।
मोहक पीत वसन ओढ़े ,
ऋतु बसंत शुभ आयो रे ।
प्रेम -रीति है बहुत निराली ,
अवनी औ अंबर हर्षाये ।
अंक में धानी चुनर शोभित
पुष्प -सुगंधा बर्षाये ।
कहे सखी साजन मैं तुमको
भीतर -भीतर पायो रे ।
मोहक पीत वसन तन ओढ़े,
ऋतु बसंत शुभ आयो रे ।
डा. सुनीता सिंह ‘सुधा
आदमी अब हो गया
नफ़रतों की बीन को किसने बिखेरा है
आदमी अब हो गया सचमुच सपेरा है
रोशनी से जगमगा कोठी रही फिर भी
ढो रहा दिल में घना वह तो अँधेरा है
शोर पैदा शब्दों में कर ले सुनेंगे सब
मत कहे कोई ये शब्दों का लुटेरा है
जोड़ता ही जा रहा अब वक्त को वो यूँ
लाद गठरी पीठ पर जैसे ठठेरा है
दर्द अब दिल का नहीं सबको दिखा सकता
चित्र में ही (सुधा) दर्द अपना वह उकेरा है
डा. सुनीता सिंह ‘सुधा
धर्म सनातन
ज्योति सनातन नित जले, व्यापक है आधार ।
हिंदू सामंजस्य का ,धर्म रूप में सार ।।1
सत्य सनातन धर्म है, सत्य प्रेम की रीति ।
समरसता सद्भाव में, राम नाम-सी प्रीति ।।2
धर्म सनातन पथ बना, नित्य चिरंतन साध ।
भारत के इतिहास में, संयम धैर्य अगाध ।।3
सत्य शिवम नित सुंदरम, बना सनातन धर्म ।
धर्म सनातन ईश है, आत्म मोक्ष का मर्म ।।4
ध्यान मौन तप यम-नियम, दिव्य गुणों से पूर्ण ।
हिंदू हिंदुस्तान में, रीति- नीति के तूर्ण ।।5
धर्म सनातन के हुए, संस्थापक जो भूप ।
स्वायंभुव मनु ही हुए , सत्य धर्म के रूप ।।6
भाग सनातन धर्म का, सिक्ख बौद्ध अरु जैन ।
सनातनी कह बुद्ध नित, रखे ध्यान में नैन ।।7
धर्म सनातन मूलतः, भारत का है धर्म ।
विश्व व्याप्त इस धर्म में,धर्म कर्म का मर्म ।।8
धर्म सनातन अर्थ है, शाश्वत हिंदू धर्म। ।
दुनिया में प्राचीनतम, करे श्रेष्ठतम कर्म ।।9
डा. सुनीता सिंह ‘सुधा
मधुमास
थी अभिलाषा रिक्त मन,बढ़ी नित्य ही प्यास।
भोर कली मुस्का उठी,पात दिखा मधुमास।।1
मादक-मादक मन हुआ,गंधिल हर इक श्वास।
नयन-नयन में चातुरी,लिख दिया मधुमास।।2
कंचन किसलय डाल पर,भरती प्रकृति सुवास।
हाथों में अनुराग ले,द्वार खड़ा मधुमास।।3
यौवन सरसों फूल-सा,खिलता मन उल्लास।
भोला अंतर है हरित,लहराता मधुमास ।।4
नव आशाओं को मिला,बासंती उपहार।
आया यह मधुमास जब, किया सुखद संसार ।।5
फागुन की आहट लिए,आया है मधुमास।
हाथ गुलालों से भरे,उतरा मन आकाश ।।6
मधुर-मधुर बहती हवा,छेड़ रही संवाद।
फैल रही मोहक छटा,बासंती घननाद ।।7
डा. सुनीता सिंह ‘सुधा
दोहा गजल
बहुत दिनों के बाद भूल न पाया प्यार ।
नित्य महकता ही रहा,प्रेम-रतन घनसार ।।
प्रेम धुनि उर में रमी,बनाया बहुत प्रवीण ।
निशिदिन बढता ही रहा,अंतर में व्यवहार ।।
भावो का अंजन किया ,दृग से दृग संधान ।
प्रीति रंग गाढ़ी रँगी ,उतरी नहीं खुमार ।।
भाग कहाँ जाता पिया,दिया तुने अब डाल ।
अंतर्मन की प्रीति यह,बन बैठी सूबेदार ।।
यादों को उर में लिए,गुँथता माला हाथ।
पावन प्रियता नित्य ही,करती मन संस्कार ।।
पा अनुपम इस रीति को,पायी मन की प्रीति ।
लगा विचारों का रहा,अंतर में दरबार ।।
मान हृदय अपना उसे,किया प्रेम संभ्रांत ।
निश्चय ही पाता रहा,अपना मैं विस्तार ।।
डा. सुनीता सिंह ‘सुधा
मैं हूँ या फिर मेरी पागल पीड़ा की परछाई है ( गीत )
मैं हूँ या फिर मेरी पागल पीड़ा की परछाई है ।
मेरे चारों ओर रात-दिन, पसरी यों तनहाई है ।।
दीवारों से बातें करता,सूना मन आहें भरता ।
लिखा तुम्हारा नाम मिटाता,दृग-कोरों में दिन ढलता।।
विरह व्यथा की कानों में नित,गूँज रही शहनाई है।
मैं हूँ या फिर मेरी पागल, पीड़ा की परछाई है ।।
तज कर सपने अपने मैंने, तुमको निज से मुक्त किया ।
झरती पुरवा-सी यादों को,अभ्यंतर से युक्त किया ।।
बाँध न पाया अंतर् ढाढ़स, ऐसी प्रीति पराई है ।
मैं हूँ या फिर मेरी पागल, पीड़ा की परछाई है ।।
अनमन-अनमन देखो आकर, संध्या बैठी आँगन में।
टूटे सारे सपने कुंठित, बरस रहे ज्यों सावन में।।
युग बदला फिर भी आँखों से,छलक रही रुसवाई है।
मैं हूँ या फिर मेरी पागल,पीड़ा की परछाई है ।।
घेर रहे यादों के बादल,फैलाकर बाँहें मंडित ।
सोती है सीने पर पीड़ा,शोणित लथपथ-सी कंपित।।
देखी नहीं कभी दुनिया ने,बढ़ी व्यथा-गहराई है।
मैं हूँ या फिर मेरी पागल, पीड़ा की परछाई है।।
डा. सुनीता सिंह ‘सुधा
आया है सज-धजकर
( गीत )
आया है सज-धजकर , द्वारे ऋतुराज
मधुकर मदमत्त हुए , सौरभ-संचार ।
अंग-अंग में अनंग , धड़के चुपचाप
मधुकरियाँ झूम-झूम , करतीं गुंजार ।।
कोयलिया कूक रही ,तरुवर की डार
मुस्काती मंजरियाँ ,घन कज्जल आँज ।
बासंती मलयानिल ,नव विकसित फूल
मधुकर नव रस मातल ,मुखरित मन साज ।।
मधुमासी छवियों से , प्रेम उर विभोर
किसलय केसर पराग ,करते बौछार ।
आया है सज-धजकर द्विरे ऋतुराज ।।
अठखेली पवन करे , भरता आनंद
नव पल्लव सेज बिछी ,मौलश्री भार ।
ध्वनि तरंग -रंग-संग,स्वागत ऋतुराज
कुसुम-कुसुम शृंगारित ,पहने निज हार ।।
कनक प्रीति उर में भर ,बौराने चित्त
नित-नव शोभित तरुवर ,शोभा संचार ।
आया है……….।।
नाचे मन का मयूर , प्रियतम की चाह
पुष्पित उर उपवन में ,किरणों का भास ।
रास करे मन चकवा ,सजे नयन स्वप्न
नर- नारी रागायित ,उल्लासित मास।।
पद्मिनियों सी लगती,नवयुवती नार
विविध भाँति नित नव-नव, करती शृंगार ।
आया है……..।।
डा. सुनीता सिंह ‘सुधा
हरेक ख्वाब में बस आप झिलमिलाते हैं
हरेक ख्वाब में बस आप झिलमिलाते हैं
जगा के जादू सा नींदे मिरी चुराते हैं ।
तलाश जिसकी गली दर गली मैं करती हूँ
वो मेरे दिल की गुफाओं में जगमगाते हैं
है रात चाँदनी औ’र दूर वो खड़े तकते
लगा के आग मुहब्बत की अब जलाते हैं ।
चुराया दिल को कभी मेरे बातों बातों में
जहान भर में हमें बस वही तो भाते हैं ।
ये माना मिलते हैं मुद्दत के बाद वो हमसे
मगर वो साथ लिये कायनात आते हैं ।
फ़िदा हूँ उनकी इसी बात पर दिल-ओ-जाँ से
मैं रूठ जाऊँ तो शिद्द्त से वो मनाते हैं ।
उन्ही के साथ में मौसम का लुत्फ़ आता है
वो मेरे गीत मिरे साथ गुनगुनाते हैं ।
तू खुशनसीब है जीवन में मिला जो प्यार तुझे
वरना लोग तो नफरत के गुल खिलाते हैं ।
डा. सुनीता सिंह ‘सुधा
सरस्वती वंदना
हे शारदे ,वंदन नमन
विनती करो , स्वीकार माँ ।
शुचिता सदा ,उर में भरो
प्रज्ञा सुफल , शृंगार माँ ।।
श्वेतांबरा ,कर मति विमल
अंतर बहे ,धारा तरल ।
दे लक्ष्य अब ,पावन सकल
भर शक्ति रस ,हर भव गरल ।।
हो स्नेह की ,भाषा नयन
उर में भरो ,संस्कार माँ ।
हे शारदे ,वंदन नमन
विनती करो ,स्वीकार माँ ।।
अभिनव भरो ,चिंतन सदा
स्वर लय भरो ,पावन हृदय ।
सत्यम् शिवम ,शुचि सुंदरम
संपन्न कर अंतर् सदय।।
भर निरझरी ,संगीत की
वीणा करो ,झंकार माँ ।
हे शारदे ,वंदन नमन
विनती करो ,स्वीकार माँ ।।
हो लेखनी ,धर्मार्थ अब
बन सारथी , तू ज्ञान रथ
नित नव सृजन अनुदित करूँ
भागीरथी , दे नित्य पथ ।।
मन में सदा ,आलोक भर
कर शुभ्रता , संचार माँ ।
हे शारदे ,वंदन नमन
विनती करो ,स्वीकार माँ ।।








